बरगद के पेड़ के नीचे दो जीव अक्सर साथ दिखते थे। एक सारस, जो लंबी टाँगों पर एक जगह खड़ा रहता और घंटों नहीं हिलता। दूसरा बकरा, जो एक जगह टिक ही नहीं पाता था। सारस ऊपर देखता था। बकरा नीचे। जंगल में कई लोगों को यह दोस्ती समझ नहीं आती थी, और दोनों में से किसी ने समझाने की कोशिश नहीं की।

तालाब बरगद से बीस क़दम दूर था। जेठ में पानी सिकुड़कर बीच में आ जाता और किनारे की मिट्टी फटने लगती। सारस पूरब वाले किनारे पर एक चपटे पत्थर पर खड़ा होता था। वही पत्थर। हर सुबह, बरसों से। जंगल में जिसे भी दिन का हिसाब रखना होता, वह सारस को देख लेता था। उस साल जेठ में एक बहेलिया तालाब के उस पार बबूल के झुरमुट में डेरा डालकर बैठ गया। दो दिन उसने कुछ नहीं किया। सिर्फ़ देखता रहा।

बकरा तीसरे दिन उस किनारे पर चरता हुआ पहुँचा। उसकी नाक ज़मीन से चार अंगुल ऊपर चलती थी, इसलिए उसे वह दिखा जो और किसी को नहीं दिखा। सरकंडे एक पट्टी में दबे हुए थे, जैसे कोई भारी चीज़ खींचकर ले जाई गई हो। मिट्टी ताज़ी पलटी हुई थी। और एक गंध थी। गीले सन और सरसों के तेल की, जो तालाब की गंध नहीं होती। बकरा वहीं रुक गया। बकरे के लिए यह बड़ी बात थी।

उसने सारस को बुलाकर दिखाया। सारस ने गरदन घुमाई और कहा कि उसे कुछ नहीं दिख रहा। यह सच था। सारस की आँख आसमान की आदी थी, दूर की चीज़ों की, उड़ती हुई चीज़ों की। अपने पंजों के नीचे की मिट्टी उसने कभी ठीक से देखी ही नहीं थी। बकरे ने दोबारा समझाया। पत्थर के तीन तरफ़ जाल बिछा है, ऊपर पत्ते डाल दिए गए हैं, और उसका सिरा खिंचकर बबूल तक जाता है। सारस ने पत्थर की तरफ़ देखा, फिर बबूल की तरफ़। जाल तालाब के लिए नहीं था। वह पत्थर के लिए था।

रात को दोनों बरगद के नीचे बैठे रहे। सारस का ख़याल सीधा था। वह कल से उस पत्थर पर नहीं जाएगा। बकरे ने सिर हिलाया। एक सुबह सारस न दिखे तो बहेलिया समझ जाएगा कि किसी ने उसे बता दिया है। फिर वह जाल उखाड़कर सरकंडों में लगा देगा, जहाँ शाम को छोटी चिड़ियाँ पानी पीने उतरती हैं। वहाँ एक फेरे में तीस फँसती हैं। सारस ने इस तरफ़ सोचा ही नहीं था। उसने अपना एक पंजा उठाया और फिर रख दिया।

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सुबह सारस पत्थर पर जा खड़ा हुआ। जाल का किनारा उसके पंजे से एक बालिश्त दूर था। उसने वहीं देखा जहाँ वह रोज़ देखता था। आसमान में, उस पार पेड़ों की क़तार पर। नीचे नहीं देखा। एक बार भी नहीं। बबूल के झुरमुट में बहेलिया बैठा है, यह उसे मालूम था, और उसने उस तरफ़ गरदन नहीं मोड़ी। धूप चढ़ी, पानी चमका, बगुले आए और चले गए। सारस वैसे ही खड़ा रहा जैसे बरसों से खड़ा होता आया था।

तीसरे दिन जंगल में बात फैल गई कि सारस सठिया गया है। नीलगाय ने कहा कि जिसे अपने पैरों के नीचे का जाल न दिखे, उसे कौन क्या समझाए। बंदरों ने ऊपर से चिल्लाकर उसे बताने की कोशिश की। दो बार। फिर वे ऊब गए। एक कौआ पत्थर के पास तक उड़कर आया और काँव-काँव करके लौट गया। सारस ने किसी की तरफ़ नहीं देखा। बहेलिया यह सब बबूल के पीछे से देख रहा था और उसे जो दिखा वह उसे पसंद आया। एक बूढ़ा पक्षी, जिसे कुछ पता नहीं है।

बकरे को कोई नहीं देखता। जंगल में यही बकरे की सबसे बड़ी ताक़त है। वह किनारे पर आता, थोड़ी देर घास नोचता, फिर सरकंडों में घुस जाता जहाँ जाल के खूँटे गड़े थे। खूँटे से बँधी रस्सी सन की थी, तिहरी बटी हुई, अँगूठे जितनी मोटी। बकरे ने उसे चबाना शुरू किया। इससे ज़्यादा मामूली दृश्य जंगल में कोई नहीं होता। बकरा कुछ खा रहा है।

रस्सी नमक और तेल में पगी हुई थी ताकि पानी में सड़े नहीं, और उसके रेशे बाल की तरह कड़े थे। पहले ही दिन बकरे के मसूढ़ों से ख़ून आया। तीसरे दिन उसका होंठ अंदर से कट गया और वह पानी भी टेढ़ा मुँह करके पीता था। वह रोज़ थोड़ी सी रस्सी लेता, उससे ज़्यादा नहीं, क्योंकि कटा हुआ हिस्सा पत्तों के नीचे छिपा रहना चाहिए था। यह धीमा काम था। जाल का बीच वाला हिस्सा पानी में पड़ा था। उधर वह जा नहीं सकता। खूँटे ही उसके हिस्से में थे।

चौथी दोपहर बहेलिया नीचे उतर आया। उसने बकरे को सरकंडों में देखा, पत्थर उठाकर मारा, फिर लाठी से उसकी पसली पर एक हाथ जमाया। बकरा लँगड़ाता हुआ भागा। बीस क़दम दूर सारस अपने पत्थर पर खड़ा था। सारस की चोंच लोहे की होती है और वह अच्छी तरह जानता था कि वह क्या कर सकता है। उसने गरदन नहीं मोड़ी। वह अपनी जगह से हिला तक नहीं। उस पूरे जेठ में यही उसका सबसे कठिन काम था।

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पाँचवीं सुबह बहेलिया अँधेरे में आया और जाल खींचा। खूँटे मिट्टी से यूँ निकल आए जैसे किसी ने उन्हें बस रख भर दिया हो। रस्सी उसके हाथ में ही टूट गई। दो जगह से। उसने जाल उलटकर देखा। किनारे कुतरे हुए थे और रेशे बिखरे हुए। उसने गाली दी, चूहों को कोसा, और गीला जाल समेटकर कंधे पर डाल लिया। दोपहर तक उसका डेरा उठ चुका था। बकरे पर उसे शक नहीं हुआ। बकरे पर किसी को शक नहीं होता।

बरसात आई और तालाब फिर किनारों तक भर गया। बकरे का होंठ जुड़ गया, पर सख़्त घास अब भी उसे चुभती थी, इसलिए वह पानी के पास वाली मुलायम घास पर चरने लगा। वह घास पत्थर के पास ही है। सारस सुबह उसी पत्थर पर आ खड़ा होता, ऊपर देखता हुआ, घंटों बिना हिले। नीचे बकरा चरता रहता। जंगल को यह दोस्ती अब भी समझ नहीं आती थी, और दोनों में से किसी ने अब भी समझाने की कोशिश नहीं की।