कुदकू ख़रगोश सबसे छोटा था, और सबसे आगे रहता था। जब जंगल में कोई नई आवाज़ आती, बाकी जानवर पीछे हटते और कुदकू आगे बढ़ जाता। यह बहादुरी थी या नासमझी, इस पर जंगल में दो राय थीं। कुदकू को इससे कोई मतलब नहीं था। उसे लगता था कि जो चीज़ दिख नहीं रही, उससे डरने का कोई फ़ायदा नहीं।

जंगल में नई आवाज़ हफ़्ते में दो-तीन बार आती है। कभी हवा से कोई सूखा पेड़ चरमराता है। कभी ऊपर वाली मेड़ से पत्थर लुढ़कता है। कभी बाहर से कोई जानवर आ जाता है और दो दिन में चला जाता है।

हर बार तरीक़ा एक ही रहता था। आवाज़ आती। सब रुक जाते। फिर सब उसी तरफ़ देखने लगते। फिर कुदकू उठकर उधर चल देता।

वह जाकर देख आता और लौटकर बता देता कि क्या है। ज़्यादातर बार कुछ नहीं होता था। एक बार गिरी हुई डाल थी। एक बार साही थी, जो रास्ता भूल गई थी। एक बार सचमुच तेंदुआ था, और उस दिन कुदकू की एक बात से सब बच गए।

उसका तरीक़ा भी ख़ास नहीं था। वह सीधा आवाज़ की तरफ़ नहीं जाता था। वह घूमकर हवा के उस तरफ़ से जाता, ताकि उसकी अपनी गंध आगे न पहुँचे, और हमेशा ऐसी जगह से जाता जहाँ पास में कोई झाड़ हो। यह उसे किसी ने सिखाया नहीं था।

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तेंदुए वाले दिन उसने तेंदुआ देखा भी नहीं था। उसे झाड़ी के पास ज़मीन पर एक जगह घास दबी हुई मिली, गोल, और उसके बीच में कुछ बाल पड़े थे। वह वहीं से लौट आया और उसने सबको उस तरफ़ जाने से रोक दिया। तेंदुआ उस दिन किसी को नहीं दिखा और अगली सुबह वह चला गया। जंगल में इसकी बात दो दिन चली, फिर बंद हो गई।

इस काम का कोई नाम नहीं था। जंगल में इसे काम भी नहीं माना जाता था। लोग कहते थे कि कुदकू में समझ कम है, इसलिए वह डरता नहीं।

कुदकू ने कभी इस बात का बुरा नहीं माना, क्योंकि उसे भी यही लगता था कि वह जाता है तो शौक़ से जाता है।

उस बरस भादों में एक शाम आवाज़ आई। नाले की तरफ़ से। दो बार, थोड़े-थोड़े अंतर पर।

सब रुक गए और उसी तरफ़ देखने लगे, और फिर उन्होंने कुदकू की तरफ़ देखा।

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कुदकू उस शाम नहीं गया।

वजह बड़ी नहीं थी। दोपहर में वह मेड़ पर से फिसला था और अगला पंजा मुड़ गया था। वह चल सकता था, पर दौड़ नहीं सकता था, और उस तरफ़ जाने का मतलब है कि लौटते वक़्त दौड़ना पड़ सकता है।

पंजे की बात उसने दबा ली। कहने पर कोई और भी नहीं जाता, यह उसे मालूम था। उसे यह भी लगा कि आज कोई और चला जाएगा।

कोई नहीं गया।

यह पहली बार था। जंगल को इसका अंदाज़ा भी नहीं था कि ऐसा हो सकता है, क्योंकि आज तक ऐसा हुआ ही नहीं था।

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सब थोड़ी देर खड़े रहे, फिर एक-एक करके अपने-अपने काम पर लौट गए, और शाम हो गई। रात में जंगल हमेशा की तरह चला।

उस रात कुदकू को नींद नहीं आई, और वजह पंजा नहीं था। वह बार-बार यह सोचता रहा कि अगर वह चला जाता तो कर क्या लेता। मेड़ को गिरने से वह नहीं रोक सकता था। यह उसे मालूम था। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।

अगली सुबह पता चला कि नाले के पास वाली मेड़ का एक हिस्सा बैठ गया था और उसके नीचे दो बिल दब गए थे। आवाज़ उसी की थी, दो बार, इसीलिए दो बार आई थी।

बिलों में से एक ख़ाली था। दूसरा नहीं था।

दबे हुए दो बिलों में एक चूहों का था और उस वक़्त ख़ाली था। दूसरा एक बूढ़ी साही का था। उसे तीसरे दिन निकाला गया और वह ज़िंदा थी, पर उसकी एक टाँग काम नहीं करती थी। इसके बाद वह मेड़ पर नहीं रही। वह नीचे वाली झाड़ी में चली गई और वहीं रह गई।

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कुदकू से इस बारे में कोई नहीं बोला। पर पूरे दिन में तीन जानवरों ने अलग-अलग वक़्त पर यह ज़रूर पूछा कि कल शाम वह गया क्यों नहीं।

तीनों ने यह सवाल ऐसे पूछा जैसे उसका जाना तय था। जैसे वह उसका काम हो। और काम न करने पर सवाल बनता ही है।

कुदकू ने तीनों को एक ही जवाब दिया, कि पंजा मुड़ा हुआ था। तीनों ने सुन लिया और तीनों आगे बढ़ गए। किसी ने यह नहीं पूछा कि पंजा कैसा है।

उस दिन उसे वह बात दिखी जो बरसों से सामने थी। जंगल ने वह काम उसे सौंप रखा था। सौंपने वाली कोई बैठक नहीं हुई थी और ज़बान से कभी कुछ तय नहीं हुआ था। बस हर बार सब उसकी तरफ़ देख लेते थे, और वह चल देता था।

और जिस चीज़ का नाम नहीं होता, उसका शुक्रिया भी नहीं होता।

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साही से कुदकू बहुत बाद में एक बार मिला, नीचे वाली झाड़ी के पास। दोनों ने उस रात की बात नहीं छेड़ी। साही ने सिर्फ़ पंजे के बारे में पूछा। वही एक थी जिसने पूछा।

पंजा दो हफ़्ते में ठीक हो गया। उसके बाद जब भी नई आवाज़ आई, कुदकू फिर उठकर उधर चला।

एक ही चीज़ बदली, और वह इतनी छोटी है कि किसी ने आज तक नोट नहीं की। अब वह जाने से पहले एक बार पीछे मुड़कर देखता है। पहले वह कभी नहीं देखता था।