साधू बाबा का आश्रम जंगल के किनारे था और उसकी कोई दीवार नहीं थी। बाबा दिन में एक बार खाते थे और बाकी वक़्त बैठे रहते थे। जंगल के जानवर उनके आसपास बेधड़क घूमते थे, क्योंकि बाबा से किसी को ख़तरा नहीं था। यह बात जानवरों ने सीखी नहीं थी। उन्हें बस पता थी, जैसे जानवरों को कई बातें बिना सीखे पता होती हैं।
बाबा के पास कुछ नहीं था। एक कमंडल, एक कंबल, और एक चटाई। गाँव से कोई सात-आठ दिन में आटा दे जाता था और बाबा उसी की रोटी बनाते थे, एक वक़्त की। न वे किसी को बुलाते थे, न किसी को हटाते थे। आश्रम कहने को आश्रम था। असल में वह चार खंभों पर टिकी एक छत थी और उसके नीचे ज़मीन।
आश्रम के पास आना जानवरों के लिए आराम की बात थी। खरगोश वहाँ दोपहर में सोते थे। तीतर धूल में नहाते थे। हिरन इतने पास तक आ जाते थे कि बाबा चाहें तो हाथ लगा दें, हालाँकि उन्होंने कभी नहीं लगाया।
आराम में एक चीज़ ढीली पड़ जाती है, और वह कान है। जो जानवर सुरक्षित जगह पर बैठा हो, वह हर आहट पर सिर नहीं उठाता। यह उसकी ग़लती नहीं है। सुरक्षित जगह का मतलब ही यही है।
यह बात जंगल में और कहीं लागू नहीं होती। पानी पर जानवर पीते हुए भी सिर उठाता रहता है। घास चरते हुए हिरन हर चौथे मुँह पर रुकता है। सिर्फ़ आश्रम के पास यह रुकना बंद हो जाता था, और वहाँ आने की वजह भी यही थी।
सियार ने यह देखा।
सियार उस इलाक़े में नया नहीं था, पर उसका हाल ठीक नहीं था। उसकी उम्र हो चली थी और पिछली बरसात में उसका एक दाँत टूट गया था। सियार वैसे भी बड़ा शिकार नहीं करता; वह छोटा शिकार करता है और बहुत करता है। दाँत टूटने के बाद उसका बहुत करना बंद हो गया था।
वह पहले किनारे से देखता रहा, कई दिन। फिर वह भी आश्रम के पास बैठने लगा, दूर, चुपचाप, और किसी को उससे कोई दिक़्क़त नहीं हुई। बाबा से किसी को ख़तरा नहीं था, और सियार बाबा के पास बैठा था।
पहला तीतर उसने तीसरे हफ़्ते में लिया, और आश्रम से पचास क़दम दूर लिया, ताकि वहाँ न लगे।
उस तीतर ने आख़िर तक सिर नहीं उठाया। यह सियार ने ख़ुद नोट किया और उसे इस पर हैरानी हुई। जंगल में तीतर को पकड़ने के लिए बहुत सब्र चाहिए, क्योंकि तीतर हर दो पल में देखता है। यह वाला नहीं देख रहा था।
इसके बाद यह चलता रहा। महीने में तीन-चार। हमेशा दूर जाकर, हमेशा दोपहर में, और हमेशा उन्हीं में से जो आश्रम के पास सो रहे होते थे।
जंगल में यह बात उठी और उसका नतीजा उलटा निकला। जानवरों ने तय किया कि बाहर ख़तरा बढ़ गया है, और वे और ज़्यादा आश्रम के पास रहने लगे।
यानी जितना नुक़सान होता गया, उतने ज़्यादा जानवर उसी जगह जमा होते गए जहाँ नुक़सान हो रहा था। यह किसी की चाल नहीं थी। सियार ने ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था। यह अपने आप हुआ, और अपने आप होने वाली चीज़ें सबसे देर में पकड़ी जाती हैं।
बाबा ने यह सब देखा। उन्होंने सियार से इस बारे में एक शब्द नहीं बोला और जानवरों को कोई चेतावनी नहीं दी।
उन्होंने कैसे देखा, यह भी मामूली बात है। वे दिन भर एक ही जगह बैठते थे और सामने जो होता था वह देखते थे। जो आदमी बरसों एक ही जगह बैठे, उसे वहाँ की गिनती अपने आप याद हो जाती है। तीतर पहले ग्यारह थे। फिर सात। फिर पाँच।
उन्होंने एक काम किया। वे दिन में एक बार खाते थे। उन्होंने अपनी थाली में से थोड़ा अलग रखना शुरू कर दिया और उसे आश्रम के पीछे वाले पत्थर पर रख देते थे।
पहले दिन वह वैसा ही पड़ा रहा। दूसरे दिन भी। तीसरे दिन नहीं मिला।
बाबा ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि कौन उठा रहा है। पत्थर आश्रम के पीछे था। बैठे-बैठे वह दिखता भी नहीं था। यह उन्होंने जान-बूझकर वहीं रखा था। जो चीज़ चुपचाप उठाई जा सके, वही रोज़ उठाई जाती है।
इसके बाद यह रोज़ होने लगा। सियार शाम को आता, पत्थर से उठाता, और चला जाता।
तीतर उसके बाद भी गए, पर कम। महीने में तीन-चार से घटकर एक, फिर उससे भी कम। शिकार मेहनत का काम है और जो चीज़ बिना मेहनत के मिल जाए, उसके सामने मेहनत टिकती नहीं।
यह सौदा था और दोनों में से किसी ने इसे इस नाम से नहीं पुकारा।
सियार शाम को आता रहा और बाबा दोपहर में रखते रहे, और दोनों का सामना कभी नहीं हुआ। एक बार हुआ भी, गर्मियों की एक शाम, जब बाबा देर से उठे। सियार पत्थर के पास खड़ा था और बाबा पीछे से आ गए। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। कोई हिला नहीं। फिर बाबा मुड़कर वापस चले गए और सियार ने उठा लिया।
बाबा ने इसे किसी को नहीं समझाया। समझाने पर जानवरों को यह मालूम हो जाता कि उनके बीच क्या हो रहा था, और उसके बाद वे वहाँ बैठकर सो नहीं पाते।
बाबा को गए बहुत बरस हो गए। आश्रम अब एक चबूतरा है और उस पर छत नहीं है।
जानवर आज भी वहाँ बेधड़क घूमते हैं और खरगोश आज भी वहीं सोते हैं। यह बात उन्हें अब भी बिना सीखे पता है।
पीछे वाला पत्थर भी वहीं है। उस पर अब कोई कुछ नहीं रखता।