एक ही पेड़ की जड़ों में दो बिल थे, आमने-सामने। एक में साँप रहता था। दूसरे में चुहिया। यह किसी योजना का नतीजा नहीं था। दोनों वहाँ अलग-अलग वक़्त पर आए थे और दोनों को दूसरा हटाने का कोई तरीक़ा नहीं मिला। इसलिए बरसों से एक अजीब सा समझौता चल रहा था। चुहिया दिन में निकलती। साँप रात में। दोनों कभी आमने-सामने नहीं पड़े थे, और दोनों ने इस बात का ध्यान रखा था। चुहिया को पता था कि एक ग़लत वक़्त पर बाहर निकलना काफ़ी होगा। साँप को पता था कि चुहिया को यह पता है। इसी जानकारी पर उनका पूरा पड़ोस टिका हुआ था। बरसों में एक बार भी यह संतुलन नहीं बिगड़ा, और दोनों में से कोई इसका श्रेय नहीं लेता था।
उस साल बारिश नहीं हुई। पहले तालाब का किनारा सूखा, फिर बीच। कीचड़ फटकर चौकोर टुकड़ों में बँट गया और उन टुकड़ों के किनारे ऊपर की तरफ़ मुड़ गए। घास में बीज नहीं आया, और जो आया वह भूसे जैसा खोखला था। पेड़ की जड़ें ऊपर से नंगी हो गईं, इतनी कि दोनों बिलों के मुँह पहले से बड़े दिखने लगे। चींटियाँ पेड़ छोड़कर चली गईं। चुहिया को यही बात सबसे बुरी लगी, क्योंकि चींटियाँ सबसे आख़िर में जाती हैं।
दिन में अब खेत में कुछ नहीं बचता था। सूखे ने सबको बाहर निकाल दिया था: गिलहरियाँ, तीतर, दो बकरियाँ जो पता नहीं किसकी थीं। जो दाना गिरता, वह गिरते ही उठा लिया जाता। चुहिया सुबह से शाम तक घूमती और शाम को उतनी ही ख़ाली लौटती। चार दिन में उसकी पसलियाँ गिनी जाने लगीं।
पाँचवें दिन उसने वह चीज़ देखी जो पहले भी वहीं थी। पेड़ के आगे सड़क थी, और सड़क पर रात को बैलगाड़ियाँ जाती थीं। सूखे में गाड़ीवान दिन में नहीं चलते, क्योंकि दोपहर में बैल बैठ जाते हैं और फिर उठते नहीं। इसलिए वे सूरज ढलने के बाद निकलते और भोर से पहले पहुँच जाते। बोरियाँ पुरानी थीं और सिलाई कमज़ोर। पहिए जहाँ गड्ढे में उतरते, वहाँ झटका लगता और हर रात थोड़ा अनाज बिखर जाता। सुबह होते-होते चिड़ियाँ उसे साफ़ कर देती थीं। दिन में वहाँ देखने लायक़ कुछ रह ही नहीं जाता था, और इसीलिए चुहिया को यह कभी दिखा नहीं।
अनाज रात में गिरता था। रात साँप की थी। चुहिया तीन रात बिल के मुँह पर बैठी रही और बाहर नहीं निकली। तीसरी रात उसे यह भी सुनाई दिया कि साँप अपने बिल से निकला और देर तक लौटा नहीं। भूख उसे भी लगी थी। मेंढक पानी के साथ चले गए थे, और सूखी ज़मीन के बिलों से कुछ नहीं निकलता।
चौथी रात उसने यह सोचना शुरू किया कि इतने बरस यह चला कैसे। दोनों के बीच कोई वादा नहीं हुआ था। कोई किसी का एहसानमंद नहीं था। बात बस इतनी थी कि साँप को हमेशा पता रहता था कि वह कहाँ है और कब है, और जो पता हो उस पर झपटने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ख़तरा जानकारी में नहीं था। ख़तरा उसके ग़ायब हो जाने में था।
उस रात निकलने से पहले उसने जड़ कुतरी। वही जड़ जो उसके बिल के मुँह पर थी, सख़्त और सूखी। उसने धीरे-धीरे कुतरा, बहुत देर तक, इतनी देर कि आवाज़ दूसरे बिल तक ज़रूर पहुँची होगी। फिर वह रुकी। फिर बाहर निकली। सड़क तक जाने में उसे रोज़ से दुगुना वक़्त लगा, क्योंकि वह एक बार भी नहीं दौड़ी।
साँप उस रात अपने बिल के मुँह तक आया और वहीं रुक गया। आवाज़ उसने सुनी थी। न पीछा, न वार। वह वहीं पड़ा रहा जब तक चुहिया लौट नहीं आई, और उसके लौटने की आहट सुनकर अंदर सरक गया। अगली रात फिर वही हुआ। उससे अगली रात भी। चुहिया हर बार पहले जड़ कुतरती, फिर रुकती, फिर निकलती, और रास्ते भर एक बार भी नहीं दौड़ती। यह सिलसिला उन्नीस रात चला।
बीसवीं रात चुहिया देर से निकली, क्योंकि जड़ पर एक साही बैठा था और हटने का नाम नहीं ले रहा था। जब वह आख़िरकार सड़क पर पहुँची, साँप पहले से बाहर था, गड्ढे के उसी किनारे पर। दोनों एक-दूसरे को देख चुके थे। चुहिया भागी नहीं। वह वहीं बैठ गई और पास पड़ी एक सूखी टहनी दाँतों से कुतरने लगी। वही आवाज़, खुले में, साँप के सामने। साँप कुछ देर बिना हिले पड़ा रहा। फिर वह मुड़ा और सड़क के दूसरी तरफ़ उतर गया।
बारिश उस साल कार्तिक में आई, देर से पर पूरी। दो दिन में तालाब भर गया। घास में बीज आया, मेंढक लौट आए, और गाड़ियाँ फिर दिन में चलने लगीं। चुहिया दिन में लौट आई, साँप रात में। दोनों के बीच इस पर कोई बात नहीं हुई, क्योंकि कभी कोई बात हुई ही नहीं थी। अब भी, बाहर निकलने से पहले, वह जड़ को थोड़ी देर कुतरती है। दिन में इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। दूसरे बिल में साँप वह आवाज़ सुनता है और सोता रहता है।