चपल लोमड़ी की समझदारी के किस्से जंगल में मशहूर थे, पर वह ख़ुद उन किस्सों में कभी शामिल नहीं होती थी। जब कोई मुश्किल आती, जानवर उसके पास जाते। वह सुनती, थोड़ा सोचती, और एक बात कह देती। ज़्यादातर वह बात काम कर जाती। किसी ने कभी नहीं पूछा कि वह इतना सोचती कब है, क्योंकि दिन भर तो वह भी सबकी तरह ही घूमती दिखती थी। सच यह था कि वह चलते-चलते सोचती थी। खाते हुए, दौड़ते हुए, धूप में लेटे हुए। यही उसकी सबसे बड़ी आदत थी, और सबसे कम दिखने वाली।

उसके पास जो आता था, वह एक सवाल लेकर आता था और एक जवाब लेकर लौटता था। इसमें ज़्यादा वक़्त नहीं लगता था। कई बार तो वह चलते-चलते ही जवाब दे देती थी, बिना रुके।

जंगल में इसे उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी माना जाता था। जो सोच-सोचकर बोले, उस पर भरोसा कम होता है।

उस बरस भादों में एक साही उसके पास आई थी।

उसे बिल बदलना था। पुराना बिल नाले के पास था और नाला उस बरस दो बार चढ़ चुका था। उसने चपल से पूछा कि वह ऊपर वाली मेड़ के नीचे बिल बना ले या नहीं।

📚 यह भी पढ़ें शेर और चालाक लोमड़ी
शेर और चालाक लोमड़ी

चपल उस वक़्त कहीं जा रही थी। उसने रुककर सुना, दो सवाल पूछे, और कहा कि मेड़ के नीचे ठीक रहेगा। मेड़ ऊँची है, ऊपर से पानी नहीं आएगा, और मेड़ की मिट्टी सख़्त है, इसलिए बिल बैठेगा नहीं।

दोनों बातें सही थीं।

साही ने वहीं बिल बनाया और उसी जाड़े में उसके तीन बच्चे हुए।

अगले भादों में मेड़ के उस हिस्से से बैलगाड़ियाँ निकलने लगीं। खेत बँटने के बाद नीचे वाला रास्ता किसी और के हिस्से में चला गया था, इसलिए गाड़ियाँ ऊपर से जाने लगीं। भरी हुई बैलगाड़ी के नीचे मेड़ काँपती है और साही का बिल मेड़ के भीतर था।

बिल बैठ गया। दो बच्चे भीतर थे।

📚 यह भी पढ़ें आलसी खरगोश और हाथी
आलसी खरगोश और हाथी

साही चपल के पास दोबारा नहीं गई।

यह उसने ग़ुस्से में नहीं किया। जिससे आप सलाह लेकर बरबाद हुए हों, उसके पास दोबारा जाना अपने आप बंद हो जाता है, और उसे यह बताना तो और भी नहीं होता। वह दूसरी तरफ़ चली गई और जंगल बड़ा है।

चपल को यह ग्यारह महीने बाद पता चला, और वह भी अपने आप।

वह उस मेड़ के पास से गुज़र रही थी और उसे बिल का मुँह दिखा, आधा दबा हुआ, और उसके ऊपर घास उग आई थी। पुराना बिल था। ख़ाली था।

वह वहीं बैठ गई।

📚 यह भी पढ़ें चतुर बंदर
चतुर बंदर

उसे यह याद आ गया कि उसने क्या कहा था। शब्द भी याद आ गए। मेड़ ऊँची है और मिट्टी सख़्त है। दोनों बातें उस दिन भी सही थीं और आज भी सही थीं।

जो बात उसने नहीं सोची थी, वह यह थी कि मेड़ के ऊपर से कोई निकलेगा।

वह सोच भी नहीं सकती थी। खेत उस बरस बँटे नहीं थे। रास्ता उस बरस नीचे था।

पर बात यह नहीं थी। बात यह थी कि उसे यह ग्यारह महीने तक पता ही नहीं चला।

वह उस शाम अपने बिल पर लौटकर एक चीज़ गिनने बैठी। पिछले दो बरसों में उससे कितने जानवरों ने कुछ पूछा था। उसे बत्तीस याद आए। उनमें से कितने लौटकर आए थे, यह भी उसे याद आया। उन्नीस।

📚 यह भी पढ़ें शेर और चालाक लोमड़ी
शेर और चालाक लोमड़ी

उन्नीसों ने आकर बताया था कि बात काम कर गई।

तेरह कभी नहीं आए।

वह अब तक यह समझती रही थी कि तेरह के पास बताने लायक़ कुछ हुआ नहीं होगा। बताने वे आते हैं जिनका काम बन जाए, और यह सोचना उसे कभी अजीब नहीं लगा था, क्योंकि यही उसके हक़ में जाता था।

असल में यह उल्टा भी हो सकता था और उसे इसकी जाँच का कोई तरीक़ा कभी नहीं मिला था, क्योंकि उसने जाँच की ही नहीं थी।

इसके बाद उसने जो किया, वह जंगल में किसी की नज़र में नहीं आया, क्योंकि उसमें देखने लायक़ कुछ नहीं था।

📚 यह भी पढ़ें आलसी खरगोश और हाथी
आलसी खरगोश और हाथी

वह लौटकर जाने लगी।

जिस जानवर को उसने कुछ कहा होता, वह दो-तीन महीने बाद उस जगह से गुज़रती और देख लेती। बिल बना या नहीं। पेड़ बचा या नहीं। बच्चे निकले या नहीं। इसमें कोई बातचीत नहीं होती थी। ज़्यादातर बार उसे कोई देखता भी नहीं था।

एक जगह उसे यह भी दिखा कि उसकी कही हुई बात काम कर गई थी और जिसने पूछा था वह लौटकर बताने ही नहीं आया। एक नेवला, जिसका बिल उसने बताया था, वहीं बैठा था और उसके बच्चे भी। उसने उसे देखा तक नहीं। इससे चपल को यह भी समझ आया कि उन्नीस वाली गिनती भी पक्की नहीं थी।

तीन बरस में उसने इस तरह ग्यारह चीज़ें देखीं जो उसकी सोची हुई नहीं थीं। एक बार पानी का रुख़, एक बार आदमी का, बाक़ी छोटी-छोटी बातें।

इनमें से एक चीज़ ऐसी थी जो उसे चुभती रही। तीन बरस पहले उसने एक कौवे से कहा था कि पुराने बरगद पर घोंसला बना ले, और बरगद उस बरस काटा नहीं गया था, अगले बरस कटा। कौवा बच गया था। पर वह बात उसने उसी तरह कही थी जिस तरह साही से कही थी, बिना रुके, चलते हुए।

📚 यह भी पढ़ें चतुर बंदर
चतुर बंदर

इसका असर यह हुआ कि वह धीमी हो गई। अब वह चलते-चलते जवाब नहीं देती थी। वह सुनती, और कहती कि दो दिन बाद आना।

जंगल को यह पसंद नहीं आया। दो दिन कोई रुकना नहीं चाहता। कुछ जानवर अब उस नई लोमड़ी के पास जाने लगे हैं जो नाले के उस पार रहती है और जो सुनते ही जवाब दे देती है।

वह जिन्हें जवाब देती है, वे सब ख़ुश लौटते हैं। यह बात जंगल में चल पड़ी है। चपल ने यह सुना और उसे इस पर कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि अब उसे मालूम है कि यह गिनती कैसे बनती है।

चपल का रोज़ का चक्कर अब भूख के हिसाब से नहीं बनता। वह जिन जगहों से होकर गुज़रती है, वे शिकार की जगहें नहीं हैं। वे वे जगहें हैं जहाँ उसने कभी कुछ कहा था।