चिकी मुर्गी और गौरी गाय एक ही आँगन में रहती थीं। चिकी दिन भर इधर-उधर दौड़ती रहती और गौरी एक जगह खड़ी जुगाली करती रहती। दोनों में कुछ भी एक जैसा नहीं था। न कद, न रफ़्तार, न आवाज़। फिर भी शाम को जब आँगन खाली होता, दोनों एक ही कोने में जाकर बैठ जातीं। गाँव में इसे लेकर लोग हँसते थे।
हँसी में कोई बुराई नहीं थी। लोग जो देख रहे थे, वही कह रहे थे। एक बड़ी चीज़ और एक छोटी चीज़ शाम को एक कोने में बैठी हैं, और इसके अलावा उनमें कुछ भी साझा नहीं है।
जो नहीं दिख रहा था, वह हिसाब था।
आँगन खुला था। ऊपर कुछ नहीं था। एक नीम था, पर वह दीवार के उस पार था और उसकी छाँव आँगन में दोपहर बाद ही आती थी।
खुले आँगन में मुर्गी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा ऊपर से आता है। चील ऊपर चक्कर काटती है और नीचे आते वक़्त उसे एक सीधी ढलान चाहिए। उस ढलान में अगर कोई ऊँची चीज़ खड़ी हो, तो वह उस तरफ़ नहीं आती। चील ऊँची चीज़ से डरती नहीं है। बात इतनी है कि उसे मुड़ना पड़ता है, और मुड़ते हुए झपट्टा नहीं मारा जाता।
आँगन में एक ही ऊँची चीज़ थी। गौरी।
चिकी को यह किसी ने नहीं समझाया था। मुर्गी हिसाब नहीं लगाती। वह बस वहाँ रहती है जहाँ रहते हुए उसका डर कम रहता है, और डर कम कहाँ रहता है, यह उसका शरीर उसे बता देता है।
दूसरी तरफ़ का हिसाब भी था और वह और कम दिखता था। गाय की गलकंबल पर, जहाँ खाल मुड़ती है और नमी बैठी रहती है, किलनियाँ लगती हैं। गाय वहाँ अपनी जीभ नहीं पहुँचा पाती और पूँछ भी नहीं पहुँचती। चिकी शाम को उसी के पास बैठती थी और चोंच से वहीं ठुनकती रहती थी। उसे किलनी अच्छी लगती थी। गौरी को यह अच्छा लगता था कि खुजली नहीं होती।
न किसी ने किसी पर एहसान किया था, न किसी ने कुछ माँगा था। दोनों अपना-अपना काम कर रही थीं और वह काम एक ही जगह पर होता था।
उस बरस अगहन में गौरी ब्याने वाली थी।
घर में तय हुआ कि उसे ननिहाल भेज दिया जाए, यानी बहू के मायके, जहाँ पक्का छप्पर है और जहाँ एक आदमी रात को उठकर देख लेता है। यह ठीक फ़ैसला था। ब्याने वाली गाय को खुले आँगन में नहीं रखते।
गौरी अगहन के दूसरे हफ़्ते में चली गई। लौटने में ढाई महीने लगने थे।
तीसरे दिन चिकी का एक चूज़ा गया।
नौवें दिन दूसरा।
घर वालों ने चील को नहीं देखा। किसी ने कुछ गिरते हुए भी नहीं देखा। चूज़े ग़ायब होते हैं और गाँव में इसकी वजहें कई हैं। बिल्ली, नेवला, साँप। घर में यही कहा गया कि नेवला आ गया है।
चिकी ने आँगन में बैठना छोड़ दिया। वह दिन भर बरामदे के नीचे रहने लगी, जहाँ छत है, और वहाँ दाना कम मिलता है।
उसने अंडे देना कम कर दिया। पहले हर दूसरे दिन, फिर हफ़्ते में एक। कम दाना और लगातार डर, दोनों का यही असर होता है।
घर में यह कहा गया कि मुर्गी बेकार हो गई है।
यह कोई निर्दयी बात नहीं थी। मुर्गी अंडा देती है, इसीलिए रखी जाती है, और जो अंडा नहीं देती वह किसी और काम आ जाती है। घर में इस पर बात होने लगी थी।
बिंदो ने बचाया।
बिंदो घर की सबसे छोटी थी और उसका काम आँगन बुहारना और मुर्गी को दाना डालना था। उसे यह अजीब लगा कि मुर्गी बरामदे के नीचे से निकलती ही नहीं। उसने दो दिन उसे उठाकर आँगन के बीच में रखा। दोनों बार वह दौड़कर वापस बरामदे में चली गई।
तीसरे दिन बिंदो बुहारते हुए रुक गई और ऊपर देखा।
आसमान में एक चील थी। वह जा नहीं रही थी। वह चक्कर काट रही थी, धीरे-धीरे, बिना पंख हिलाए, उसी आँगन के ऊपर।
बिंदो ने घर में यह बात कही और उस पर ध्यान नहीं दिया गया, क्योंकि चील आसमान में हमेशा रहती है। तब उसने वह किया जो उस उम्र में करना आता है। उसने ज़िद की।
उसकी ज़िद पर बाँस की चार बल्लियाँ गाड़कर उन पर पुराना जाल डाल दिया गया। आधा आँगन ढँक गया। यह काम आधे दिन का था और किसी ने इसे बड़ा नहीं समझा।
चिकी उसी शाम आँगन में लौट आई। जाल के नीचे। पंद्रह दिन में उसने फिर से रोज़ अंडा देना शुरू कर दिया।
गौरी फागुन में लौटी, बछड़े के साथ। उसकी गलकंबल के नीचे की खाल इस बीच ख़राब हो चुकी थी। वहाँ किलनियाँ जम गई थीं और दो जगह खाल छिल गई थी। ननिहाल में उसे चारा अच्छा मिला, छप्पर मिला, रात को देखने वाला आदमी मिला। जो नहीं मिला, वह किसी को याद ही नहीं था।
लौटने के तीसरे दिन शाम को गौरी उसी कोने में जाकर खड़ी हो गई और चिकी उसके पास आ गई। चार दिन में गलकंबल साफ़ थी।
गाँव में इस पर फिर हँसी हुई। वही हँसी, उन्हीं शब्दों में। इस बीच घर में एक जाल लग चुका था, दो चूज़े जा चुके थे, एक गाय की खाल छिल चुकी थी, और एक मुर्गी को बेकार कहा जा चुका था। हँसने वालों को इनमें से किसी बात का इन दोनों से कोई ताल्लुक़ नहीं दिखा।
वह कोना अब भी वैसा ही है। ज़मीन वहाँ चिकनी हो गई है, बाक़ी आँगन से अलग, एक तरफ़ खुर से और दूसरी तरफ़ पंजों से। बिंदो वहाँ झाड़ू नहीं लगाती। लगाने से कुछ होता नहीं, और वह इसे अब पहचानने लगी है।