शेर जंगल का राजा था और उसे इस बात का ऐलान करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। सुबह उसकी दहाड़ से जंगल जागता था। यह बरसों से चला आ रहा था और किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया। फिर गाँव के किनारे वाले खेत पर एक मुर्गा आया, और उसने सुबह-सुबह बाँग देनी शुरू कर दी। पहली बार शेर की नींद उसकी अपनी आवाज़ से नहीं खुली।

शेर की दहाड़ का कोई मक़सद नहीं था, कम से कम कोई ऐसा मक़सद जो वह बता सके। वह सुबह उठता, गुफा के मुँह पर आता, और दहाड़ता। इसके बाद जंगल हिलता। चिड़ियाँ उड़तीं, हिरन थोड़ा पीछे हटते, बंदर ऊपर वाली डाल पर चले जाते। यही उसका दिन शुरू होने का तरीक़ा था और यह उसे अच्छा लगता था। अब मुर्गा उससे पहले बोल देता था।

पहले दो दिन शेर ने इसे संयोग समझा। तीसरे दिन उसने जल्दी उठकर दहाड़ने की कोशिश की, और मुर्गा तब भी पहले बोल चुका था। चौथे दिन वह और जल्दी उठा। पाँचवें दिन वह अँधेरे में ही गुफा के मुँह पर आकर बैठ गया और इंतज़ार करता रहा। मुर्गे ने ठीक उसी वक़्त बाँग दी जिस वक़्त वह रोज़ देता था। शेर उससे पहले दहाड़ चुका था। फिर भी जंगल तब जागा जब मुर्गा बोला।

जंगल ने यह बदलाव शेर से पहले पकड़ लिया। हिरन अब भोर में उठते ही चरने निकल जाते थे, क्योंकि उन्हें पता चल जाता था कि दिन शुरू हो गया है और शेर अभी गुफा में है। पहले वे दहाड़ सुनकर उठते थे और तब तक शेर शिकार कर चुका होता था। बंदरों ने भी यह देख लिया। दो हफ़्ते में शेर के हिस्से का सबसे आसान वक़्त उससे निकल गया, और यह किसी की चाल नहीं थी। सिर्फ़ वक़्त बदल गया था।

इसके बाद शेर की रातें छोटी होने लगीं। वह रात में शिकार करता और भोर से पहले लौटकर बैठ जाता, इस डर से कि कहीं फिर पिछड़ न जाए। नींद पूरी नहीं होती थी। दो हफ़्ते में उसका शिकार गिर गया। जो हिरन वह पहले पचास क़दम में पकड़ लेता था, अब वह उसके पीछे दो सौ क़दम दौड़ता और ख़ाली लौटता। तीन दिन कुछ नहीं मिला। पसलियाँ दिखने लगीं। जंगल में इस पर बात होने लगी। धीरे-धीरे, और उससे काफ़ी दूर रहकर।

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आख़िर एक रात शेर खेत की तरफ़ गया। यह उसने पहले कभी नहीं किया था, क्योंकि वहाँ आदमी थे और आदमियों के कुत्ते थे। वह बाड़ के पास पेट के बल लेटकर देखता रहा। मुर्गा एक टूटी टोकरी के नीचे बैठा था। वह बूढ़ा था। एक आँख सफ़ेद पड़ चुकी थी और एक पंजे में टेढ़ापन था। शेर उसे एक ही पंजे में उठा सकता था, और इसके लिए उसे बाड़ तोड़ने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती।

पर शेर वहीं लेटा रहा। मुर्गे ने रात में दो बार करवट बदली और एक बार गरदन खुजाई। उसे यह मालूम नहीं था कि बाड़ के उस तरफ़ कोई है। उसे यह भी मालूम नहीं था कि जंगल में शेर नाम का कोई जानवर रहता है। वह बाँग इसलिए नहीं देता था कि किसी को जगाए। वह इसलिए देता था कि मुर्गे यही करते हैं। शेर उस रात बिना कुछ किए लौट आया।

मुर्गे का दिन उजाले से पहले शुरू होता है और उसमें कुछ भी बड़ा नहीं होता। बाँग, फिर दाना, फिर धूप में बैठना, फिर दोपहर में छाँव, और शाम को टोकरी। उस खेत पर उसका काम अंडे देने वाली मुर्गियों के साथ रहना है। जगाना उसके काम में कहीं नहीं आता। वह जगाता नहीं है। वह सिर्फ़ बोलता है। बाक़ी जो होता है, वह जंगल का अपना हिसाब है, और उसमें मुर्गे की कोई राय नहीं है।

लौटकर शेर ने उस रात कुछ तय नहीं किया। वह गुफा के मुँह पर बैठा रहा और आसमान का रंग बदलते देखता रहा। दूर खेत की तरफ़ से बाँग आई, ठीक उसी वक़्त, जब पूरब में सिर्फ़ एक पतली लकीर थी। जंगल जाग गया। शेर ने इस बार दहाड़ नहीं लगाई। हार उसने मानी नहीं थी। उस पल उसे बस यह बात बेमतलब लगी। वह अंदर जाकर लेट गया और बहुत दिनों बाद पूरी नींद सोया।

उस पूरे दिन जंगल में एक अजीब सी सुस्ती छाई रही। हिरन झाड़ी से बाहर नहीं निकले। बंदर नीचे नहीं उतरे। दोपहर तक किसी ने इस पर कुछ कहा नहीं, पर सब एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे और कोई खुले में नहीं जा रहा था। शाम को एक कौआ, जो बरसों से उसी पेड़ की डाल पर बैठता था, उड़कर गुफा के मुँह पर आ बैठा। उसने बताया कि आज दिन भर कोई पानी पीने नहीं गया, क्योंकि किसी को पक्का नहीं था कि आसपास कौन है और कहाँ है।

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अगली सुबह मुर्गे ने हमेशा की तरह पहले बाँग दी, और जंगल हमेशा की तरह जागा। शेर देर तक सोता रहा और धूप निकलने के बाद उठा। फिर उसने दहाड़ लगाई, बिना किसी जल्दी के। चिड़ियाँ नहीं उड़ीं, क्योंकि वे कब की उड़ चुकी थीं। पर हिरन ने सिर उठाया और फिर घास चरने लगा, और बंदर अपनी डाल पर बैठे रहे। तब से यही चलता आ रहा है। मुर्गा जंगल को जगाता है, और शेर उसे बताता है कि वह अब भी वहीं है।