तालाब के मेंढ़कों को गर्मी से चिढ़ थी। हर साल जेठ आते ही पानी उतरने लगता, किनारे सूखने लगते, और उन्हें बीच की तरफ़ सरकना पड़ता। इस बात के लिए वे सूरज को ज़िम्मेदार मानते थे। शाम को जब हवा ठंडी होती, तालाब में इसी पर बहस चलती। कोई कहता कि सूरज को समझाना चाहिए। कोई कहता कि उससे लड़ना चाहिए। किसी ने आज तक कुछ किया नहीं था, पर कहा सबने बहुत कुछ था।
कद्रू सबसे ज़्यादा बोलता था। उसकी बात में दम भी था। वह कहता कि सूरज रोज़ आता है और रोज़ जीतकर चला जाता है, और मेंढ़क रोज़ पीछे सरकते हैं, और एक दिन सरकने की जगह नहीं बचेगी। यह सच था। पिछले तीन बरसों में तालाब का उत्तरी किनारा पूरा सूख चुका था और वहाँ अब घास उगी हुई थी, ऐसी घास जो पानी में नहीं उगती।
उस जेठ में उसने तय कर लिया कि वह कुछ करेगा।
वह क्या कर सकता था, यह उसे मालूम नहीं था। मेंढ़क के पास दो ही चीज़ें होती हैं। एक कूद। एक आवाज़। कूदकर सूरज तक पहुँचा नहीं जा सकता, यह उसे भी पता था। तो बची आवाज़।
इसे अब हँसी की बात मत समझिए। तालाब में आवाज़ का मतलब होता है। बरसात की पहली रात जब सारे मेंढ़क एक साथ बोलते हैं, तो गाँव तक सुनाई देता है और लोग कहते हैं कि पानी आ गया। आवाज़ से मादा आती है, आवाज़ से जगह तय होती है, आवाज़ से दूसरे को हटना पड़ता है। कद्रू की पूरी दुनिया में जो भी बदला जा सकता था, आवाज़ से ही बदला जाता था। उसने वही चलाया जो उसके पास था।
उसने बीच वाले पत्थर को चुना। वह पत्थर सुबह से शाम तक धूप में रहता है। उस पर कोई नहीं बैठता।
वह चढ़ा और बोलना शुरू किया।
शुरू में यह देखने लायक़ था। तालाब के किनारे-किनारे मेंढ़क जमा हो गए, पानी में गले तक डूबे हुए, सिर्फ़ आँखें बाहर। कद्रू पत्थर पर फूला हुआ बैठा था और उसका गला रह-रहकर गुब्बारे की तरह उठ रहा था। किनारे से किसी ने बोला कि आज फ़ैसला हो जाएगा। ऐसा ही लग रहा था।
पहला घंटा उसने आराम से निकाला।
दूसरे घंटे में उसकी आवाज़ बदलने लगी। मेंढ़क की आवाज़ गले से नहीं, हवा की एक थैली से निकलती है, और उस थैली को भरने के लिए नमी चाहिए। दोपहर के पत्थर पर नमी नहीं थी।
मेंढ़क की खाल का काम सिर्फ़ ढकना नहीं है। वह उससे साँस भी लेता है और उसके लिए खाल का गीला रहना ज़रूरी है। सूखी खाल वाला मेंढ़क धीरे-धीरे दम घुटने की तरफ़ जाता है, और उसे यह पता भी नहीं चलता, क्योंकि दर्द कहीं नहीं होता। बस ताक़त कम होती जाती है।
तीसरे घंटे तक किनारे से मेंढ़क हटने लगे थे। दोपहर में पानी के बाहर सिर रखना उनके लिए भी आसान नहीं था। दो-चार ही बचे रहे। वे भी बीच-बीच में डुबकी लगा आते थे।
कद्रू डुबकी नहीं लगा सकता था। पत्थर से उतरने का मतलब हारना था और वह यह सबके सामने कर चुका था।
यह उस दिन की सबसे भारी बात है। लड़ाई सूरज से थी, पर पत्थर पर बैठे रहने की वजह सूरज नहीं था। वजह किनारे पर बैठे वे चार मेंढ़क थे जो देख रहे थे।
चौथे घंटे में उसकी आवाज़ टूट गई। पहले वह छोटी हुई, फिर बीच-बीच में ग़ायब होने लगी, फिर सिर्फ़ मुँह खुलता रहा और कुछ निकला नहीं। उसकी पीठ की खाल का रंग बदल चुका था। हरा नहीं। भूरा जैसा। उसकी पिछली टाँगें अकड़ने लगी थीं।
वह उतरना चाहता था। उतर नहीं पाया। यह अकड़ की बात नहीं रह गई थी। टाँगें काम नहीं कर रही थीं।
तब भैंसें आईं।
वे रोज़ नहीं आती थीं। उस बरस गाँव के पश्चिम वाले गड्ढे में पानी नहीं बचा था, इसलिए भैंसों वाला उन्हें इस तालाब पर लाने लगा था। यह उस दोपहर तीसरा दिन था।
भैंस पानी में उतरती है तो सीधे लेट जाती है और लेटते वक़्त किनारे की गीली मिट्टी उछलती है। एक भैंस बीच वाले पत्थर के पास से गुज़री। उसके खुर से कीचड़ का एक थपेड़ा उठा और पत्थर पर पड़ा। कद्रू उसके नीचे आ गया।
ठंडा कीचड़ खाल पर पड़ते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसे वापस खींच लिया हो। पंद्रह मिनट वह उसी में पड़ा रहा। फिर एक टाँग हिली। फिर वह लुढ़ककर पानी में गिरा।
शाम को तालाब में इसी की बात हुई।
बात यह बनी कि कद्रू सूरज से लड़ा। और लौट आया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह भैंस की वजह से लौटा। भैंस को किसी ने देखा भी था या नहीं, यह भी साफ़ नहीं है, क्योंकि उस वक़्त ज़्यादातर मेंढ़क पानी के भीतर थे।
कद्रू ने सुना। उसे मालूम था कि उसे किसने बचाया। उसने एक बार बताने की कोशिश भी की, और उस पर एक बूढ़े मेंढ़क ने कहा कि बहादुर आदमी अपनी बहादुरी छोटी करके बताता है, और बाक़ी सब हँस दिए। इसके बाद उसने कोशिश छोड़ दी, क्योंकि बताने का कोई तरीक़ा नहीं बचा था। जो भी वह कहता, वह उसी कहानी में जुड़ जाता।
उस बरस तालाब गहरा हुआ। भैंसें रोज़ आने लगीं। उनके लोटने से बीच का हिस्सा और नीचे बैठ गया, और किनारे की मिट्टी भी अंदर की तरफ़ खिसकी। अगले जेठ में उत्तरी किनारा पूरा नहीं सूखा। इतिहास में यह कद्रू के नाम लिखा गया।
अब भी हर शाम हवा ठंडी होने पर बहस चलती है। कोई कहता है कि सूरज को समझाना चाहिए, कोई कहता है कि लड़ना चाहिए। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना पड़ा है कि अब बहस के आख़िर में कोई कद्रू की तरफ़ इशारा कर देता है, और इससे बात वहीं ख़त्म हो जाती है। पहले बहस के बाद कुछ नहीं होता था। अब बहस के बाद भी कुछ नहीं होता, पर सबको लगता है कि हो चुका है।
कद्रू अब उस पत्थर पर नहीं बैठता। वह उस जगह बैठता है जहाँ भैंसों का रास्ता पानी से मिलता है, कीचड़ में, जहाँ से कुछ भी नहीं दिखता। बाक़ी मेंढ़क समझते हैं कि वह वहाँ अपनी जीत वाली जगह के पास बैठता है, और इस बात पर उन्हें उस पर और भरोसा हो गया है।