नदी के उस मोड़ पर दो ही रहते थे। किरण मगरमच्छ, जो ज़्यादातर पानी के नीचे रहता और सिर्फ़ आँखें ऊपर रखता। और रानी बत्तख, जो ऊपर तैरती रहती और लगातार कुछ न कुछ बोलती रहती। बाकी जानवरों को यह जोड़ी अजीब लगती थी। किरण से सब डरते थे। रानी से कोई नहीं डरता था। फिर भी दोनों साथ दिखते थे, हर रोज़।
इसकी वजह कोई दोस्ती नहीं थी, कम से कम शुरू में नहीं। पानी के नीचे पड़े मगरमच्छ को ऊपर का कुछ नहीं दिखता। बत्तख ऊपर तैरती है और उसे दूर तक दिखता है, और ख़तरा देखकर वह चुप नहीं रहती। दूसरी तरफ़, उस मोड़ पर रानी को कोई नहीं छेड़ता था, और इसकी वजह भी सबको मालूम थी।
दो बरस पहले शिकारी कुत्ते नदी के उस मोड़ तक आ गए थे। रानी ने उन्हें पहले देख लिया और उसने वही किया जो बत्तख करती है, यानी बहुत शोर। किरण उस दिन पानी के नीचे चला गया और शाम तक बाहर नहीं निकला। उसके बाद से वे दोनों साथ दिखने लगे।
उस बरस सावन में रानी के पंख गिरने लगे। यह हर साल होता है और इसमें डरने की कोई बात नहीं, पर जब तक नए पंख नहीं आते तब तक बत्तख उड़ नहीं सकती। कुछ हफ़्ते वह सिर्फ़ तैर सकती है।
इन हफ़्तों में रानी नरकट के पास ही रहती थी। पानी में वह अब भी तेज़ थी, पर पानी से बाहर वह कुछ भी नहीं थी, और यह बात उसे भी मालूम थी और किरण को भी।
सावन में नदी चढ़ी हुई थी। बीच की धार इतनी तेज़ थी कि उसमें तैरकर पार जाना बत्तख के बस का नहीं। दूसरे किनारे पर अमरूद का बाग था और उसके फल इस तरफ़ तक नहीं आते थे।
तीन बरस से वह उस बाग को देखती आई थी। इस किनारे से वह सिर्फ़ हरा दिखता है और शाम को उसके ऊपर तोते उतरते हैं। जो चीज़ रोज़ दिखे और कभी हाथ न आए, उसके बारे में बहुत सोचा जाता है।
एक सुबह किरण ने कहा कि वह उसे उस पार ले जा सकता है।
रानी ने तुरंत हाँ नहीं की। उसने दिन भर सोचा। सोचने की वजह डर नहीं था, कम से कम पूरा डर नहीं। वजह यह थी कि वह उस बाग को तीन बरस से देख रही थी और कभी वहाँ नहीं गई थी।
अगली सुबह उसने हाँ कह दी।
पार जाना आसान था। किरण पानी में नीचे रहा और उसकी पीठ का एक हिस्सा ऊपर, और रानी उस पर बैठ गई। बीच की धार में उसे पंजे जमाकर बैठना पड़ा। दस मिनट में वे उस पार थे।
बाग पुराना था और उसमें गिरे हुए अमरूद ज़मीन पर पड़े थे, कुछ पर चींटियाँ लगी थीं और कुछ ताज़े थे। गंध दूर तक जा रही थी। रानी ने खाना शुरू किया और काफ़ी देर तक खाती रही।
किरण किनारे पर पड़ा रहा। थोड़ी देर बाद उसने भी एक अमरूद उठाया और खा लिया।
रानी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसने खाना जारी रखा।
रानी खाती रही। खाते-खाते वह थोड़ा-थोड़ा खिसकती भी रही, इस तरह कि खिसकना खाने का हिस्सा लगे। जब वह रुकी, तब वह पानी से चार क़दम पर थी।
लौटते वक़्त वह फिर उसकी पीठ पर बैठी। इस बार उसने बीच धार में पंजे नहीं जमाए। इस किनारे से बीस हाथ पहले, जहाँ पानी उथला है और नरकट शुरू होते हैं, वह पीठ से उतर गई और तैरकर भीतर चली गई।
बीस हाथ पहले उतरने की कोई वजह नहीं थी। पानी वहाँ उथला है और नरकट घने हैं। किरण रुका नहीं। उसने पीछे देखा भी नहीं। वह सीधा मोड़ की तरफ़ बढ़ गया, जैसे उसे कहीं और जाना हो।
बीच धार में किरण थोड़ा नीचे हुआ। इतना नहीं कि रानी गिरे, बस इतना कि पानी उसके पंजों तक आ जाए। फिर वह वापस ऊपर आ गया। यह एक बार हुआ और दोबारा नहीं हुआ।
किरण ने पानी में सिर डालकर देखा। नीचे सिर्फ़ कीचड़ था और हिलती हुई घास। वह किनारे तक आया और अपना भारी शरीर गीली मिट्टी पर टिका दिया। दूर, नरकट के झुरमुट में कुछ हिला। एक सफ़ेद सिर बाहर निकला और फिर अंदर हो गया। रानी वहीं थी, पानी में, उससे बीस हाथ दूर, और उसे देख रही थी।
"तुमने वादा किया था," किरण ने कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ थकान। "बाग का राज़ बताओ।" रानी नरकट से बाहर आई, पर पानी नहीं छोड़ा। "राज़ बाग का नहीं था," उसने कहा। "तुम्हारा था।" किरण चुप हो गया। "तुमने आज अमरूद खाया," रानी बोली। "मगरमच्छ अमरूद नहीं खाते, किरण। तुमने वह सिर्फ़ इसलिए खाया ताकि मैं तुम्हें खाते हुए देखूँ और डरूँ नहीं। जिस पल तुमने वह फल उठाया, उसी पल मुझे पता चल गया कि तुम मुझे उस किनारे क्यों ले जा रहे हो।"
किरण ने अपनी आँखें पानी के नीचे कर लीं। बस नथुने ऊपर रह गए। "कल भी आना," रानी ने कहा। "पर भूखे मत आना।"
अगली सुबह किरण मोड़ पर था। उसके जबड़े में एक मरी हुई मछली थी। उसने वह किनारे पर रखी और पीछे हट गया। रानी ऊपर से उतरी, मछली देखी, और तैरकर पास आ गई। उस दिन के बाद दोनों फिर रोज़ साथ दिखने लगे। बस अब रानी हमेशा धार के ऊपर वाली तरफ़ तैरती थी, जहाँ से पानी उसकी तरफ़ आता था और किरण की तरफ़ जाता था।
किरण अब मोड़ पर नीचे की तरफ़ से आता है। इसमें उसे रोज़ ज़्यादा तैरना पड़ता है, क्योंकि उसका अपना किनारा ऊपर की तरफ़ है। इस तरह आने पर रानी उसे दूर से आते हुए देख लेती है। मगरमच्छ के लिए दूर से दिख जाना कोई अच्छी बात नहीं होती। वह यह रोज़ करता है।