तालाब में मछलियाँ कई तरह की थीं, और सब अपने-अपने हिस्से में रहती थीं। छोटी वाली किनारे के पास, जहाँ पानी गरम रहता। बड़ी वाली बीच में, जहाँ गहराई थी। यह बँटवारा किसी ने तय नहीं किया था। बस बरसों से ऐसा ही चला आ रहा था, और किसी ने इस पर कभी सवाल नहीं उठाया।
बरसात के बाद जब नदी चढ़ी, तो पानी खेतों के ऊपर से होता हुआ तालाब तक आ गया, और उसी पानी के साथ एक मगरमच्छ आ गया। वह बहुत बड़ा नहीं था, आदमी के क़द जितना, पर तालाब के हिसाब से बहुत बड़ा था। पानी उतरा तो वह वहीं रह गया। पहले हफ़्ते में उसने ग्यारह मछलियाँ खाईं। दूसरे हफ़्ते में सत्रह। गिनती किसी ने रखी नहीं थी, पर सबको पता था कि कौन नहीं लौटा।
मछलियों के पास न दाँत थे, न हाथ। लड़ने का सवाल ही नहीं था। भागें भी तो कहाँ। तालाब जितना था उतना ही था। पानी साफ़ था, इतना साफ़ कि तले की रेत गिनी जा सकती थी। मुसीबत भी यही थी। मगरमच्छ तले पर पड़ा रहता, बिना हिले, घंटों, और ऊपर से गुज़रती मछली को देखकर झपटता। साफ़ पानी में उसका निशाना कभी ख़ाली नहीं जाता था।
पहले दो हफ़्तों में मछलियों ने वही किया जो कोई भी करता। उन्होंने रास्ते बदले। दिन में निकलना कम किया। किनारे की घास के पीछे-पीछे चलने लगीं। इन सबसे कुछ नहीं हुआ, क्योंकि तालाब गोल है और मगरमच्छ को कहीं जाना नहीं होता। उसे बस इंतज़ार करना होता है।
तीसरे हफ़्ते में उसने पिंकी की माँ को लिया। यह दोपहर में हुआ, सबके सामने, किनारे से बस चार हाथ दूर। वह घास के गुच्छे के पास ठहरी हुई थी और उसके बाद वहाँ सिर्फ़ हिलता हुआ पानी था। उस दिन के बाद छोटी मछलियाँ किनारे की उस पट्टी में जाना बंद कर देतीं, अगर उन्हें कोई और जगह मिलती। कोई और जगह थी नहीं। तालाब जितना था उतना ही था, और उसके बाहर सिर्फ़ सूखी मिट्टी थी।
मुनिया ने एक बात पर ध्यान दिया। बरसात वाले दिनों में, जब ऊपर से मिट्टी आती थी और पानी गँदला हो जाता था, मगरमच्छ दिन भर तले पर पड़ा रहता और कुछ नहीं पकड़ पाता था। उन दिनों वह किनारे पर चढ़कर धूप में पड़ा रहता। मुनिया ने यह भी देखा कि गँदले पानी में वह सिर्फ़ आहट की तरफ़ झपटता है, और दस में से नौ बार चूक जाता है।
मुनिया ने बड़ी मछली गुड्डू और किनारे वाली पिंकी को बुलाया, और तीनों ने मिलकर वह बात कही जो अब तक किसी को नहीं सूझी थी: पानी को ख़ुद भी गँदला किया जा सकता है। किनारे की रेत छोटी मछलियाँ हिला सकती थीं, क्योंकि वहाँ पानी उथला था और उन्हें वहाँ का हर कोना पता था। बीच की भारी गाद सिर्फ़ बड़ी मछलियाँ हिला सकती थीं, क्योंकि वहाँ गहराई थी और ताक़त चाहिए थी। यह काम अकेले किसी से नहीं हो सकता था। जो बँटवारा बरसों से यूँ ही चला आ रहा था, वह पहली बार किसी काम आया।
पहरी बाँध दी गई। दिन के हर हिस्से में कुछ मछलियाँ तले की रेत उछालतीं, फिर थककर हट जातीं और दूसरी आ जातीं। रात में भी यह चलता रहा। पानी तीसरे दिन तक भूरा हो गया। उसके बाद भूरा ही रहा। इसकी क़ीमत भी थी। गँदले पानी में खाना ढूँढ़ना मुश्किल है। साँस लेना भी। बच्चों के लिए और भी ज़्यादा। कई मछलियाँ कमज़ोर पड़ गईं और अंडे उस मौसम में बहुत कम बचे। दो बूढ़ी मछलियाँ उन्हीं दिनों में मर गईं। मगरमच्छ से नहीं। गाद से।
यह बात मुनिया ने सबके सामने कही, उसी दिन। उसने यह नहीं कहा कि ऐसा होना ही था। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि यह उन्हीं की वजह से हुआ है और गिनती में यह भी जोड़ा जाएगा।
दूसरे हफ़्ते मगरमच्छ ने तरीक़ा बदला। वह उस जगह जाकर बैठने लगा जहाँ पानी सबसे पहले साफ़ होता था, यानी उस कोने में जहाँ नाले से ताज़ा पानी आता था। दो दिन तक वहाँ शिकार मिलता रहा। मुनिया ने यह देखा और पहरी का हिसाब बदल दिया: अब सबसे ज़्यादा मछलियाँ उसी कोने में लगीं, और बाक़ी तालाब में कम। तीसरे दिन वह कोना भी भूरा हो गया। मगरमच्छ वहाँ से हट गया और उसके बाद उसने कोई नई जगह नहीं आज़माई।
मगरमच्छ ने पहले हफ़्ते कोशिश की। जहाँ आहट होती वहाँ झपटता और मुँह में रेत भरकर लौटता। दूसरे हफ़्ते उसने झपटना कम कर दिया। आख़िरी दिनों में उसने खाना लगभग बंद कर दिया। यह उस वक़्त किसी ने नहीं देखा। बाद में जोड़ने पर यही निकला। तीसरे हफ़्ते वह ज़्यादातर वक़्त किनारे पर पड़ा रहने लगा, और एक सुबह वह वहाँ नहीं था। वह उसी नाले से निकल गया जिससे आया था। जाते हुए उसे किसी ने देखा नहीं, और किसी ने उसे रोका भी नहीं।
पानी साफ़ होने में पूरा एक महीना लगा। पहले तला दिखा, फिर रेत, फिर रेत के दाने। उसके बाद छोटी मछलियाँ फिर किनारे लौट गईं और बड़ी बीच में, ठीक वैसे ही जैसे पहले था। फ़र्क़ बस इतना था कि अब यह बँटवारा अपने आप नहीं चल रहा था। अब सब जानते थे कि वह क्यों है, और यह भी कि ज़रूरत पड़ने पर उसे तोड़ा जा सकता है। किसी ने इसे नियम नहीं बनाया। ज़रूरत भी नहीं पड़ी।