चंचला लोमड़ी की योजनाएँ हमेशा दो-तीन क़दम आगे की होती थीं। वह किसी काम में सीधे नहीं उतरती थी। पहले देखती, फिर सोचती, और तब कुछ करती। जंगल में उसे चालाक कहा जाता था, और वह इस पर नाराज़ नहीं होती थी। उसका मानना था कि चालाकी और समझदारी में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि नतीजा आख़िर में किसके हक़ में गया।

उसकी योजनाओं में एक बात एक जैसी रहती थी। वह किसी को कुछ करने के लिए कहती नहीं थी। वह उसे वह बात दिखा देती थी जिससे वह ख़ुद वहाँ पहुँच जाए। कहा हुआ काम आदमी टाल देता है। ख़ुद सोचा हुआ काम वह करता है, और उस पर अड़ भी जाता है।

उसके साथ तीन जानवर चलते थे। एक गीदड़, एक बूढ़ा नेवला, और एक कौआ जो ऊपर से देखता था और नीचे आकर बताता था।

तीनों उससे छोटे नहीं थे, कम से कम उम्र में नहीं। नेवला उससे बड़ा था। पर तीनों उसकी बात मानते थे और यह उन्हें बुरा नहीं लगता था, क्योंकि उसकी बात मानने से उनका काम बनता था। जंगल में इससे ज़्यादा किसी रिश्ते की ज़रूरत नहीं पड़ती।

काम का बँटवारा कभी तय नहीं हुआ था। चंचला सोचती थी और बाक़ी करते थे। यह ठीक चलता था, क्योंकि उसकी सोची हुई बात ज़्यादातर बार काम कर जाती थी।

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उसका ठिकाना नाले के किनारे वाली एक माँद थी। जगह अच्छी थी। दो तरफ़ से रास्ता, ऊपर घनी झाड़ी, और पानी दस क़दम पर।

बरसात में वह जगह अच्छी नहीं रहती। नाला चढ़ता है और माँद के मुँह तक पानी आ जाता है। तीन बरस से हर बरसात में यह होता था। तीनों बार चंचला ने माँद नहीं छोड़ी।

हर बार वह कुछ दिन ऊपर वाली झाड़ी में काट लेती और पानी उतरने पर लौट आती। यह उसे मुश्किल नहीं लगता था। उसे यह भी लगता था कि इतनी अच्छी जगह के लिए बरस में चार-पाँच रातें कोई बड़ी क़ीमत नहीं है।

कारण वही था जो ऐसी बातों में होता है। जगह छोड़ना यह मानना है कि जगह ग़लत चुनी थी।

चौथे बरस बरसात से पहले तीनों ने आपस में बात की। यह बात उन्होंने चंचला के सामने नहीं की।

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पिछले बरस नाला उम्मीद से ज़्यादा चढ़ा था और माँद के भीतर तक पानी गया था। उस रात चंचला बाहर थी। अगर वह भीतर होती तो निकल भी आती, शायद। तीनों ने यही शब्द इस्तेमाल किया था, शायद, और उसी शब्द पर वे तीनों रुक गए थे।

फिर कौआ नीचे आया और उसने चंचला को बताया कि ऊपर वाली ढलान पर एक पुरानी माँद ख़ाली पड़ी है, जो शायद साही की रही होगी। उसने आगे जोड़ा कि वह इसमें रहने की सोच रहा है, हालाँकि कौए माँद में नहीं रहते।

चंचला ने कहा कि कौए माँद में नहीं रहते। कौआ चुप रहा। फिर बोला कि तो शायद कोई और रह ले।

दो दिन बाद गीदड़ ने बातों-बातों में कहा कि ऊपर वाली ढलान से नाले का पूरा मोड़ दिखता है और वहाँ से आते हुए किसी को भी पहले देखा जा सकता है। उसने माँद का नाम नहीं लिया।

तीसरे दिन नेवले ने कहा कि पिछली बरसात में उसकी अपनी बिल भर गई थी और उसे तीन रातें भीगकर काटनी पड़ी थीं। यह सच था। उसने यह पहले कभी नहीं बताया था।

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नेवला झूठ नहीं बोल रहा था। तीन रातें भीगी थीं। बात सिर्फ़ इतनी थी कि उसने वे तीन रातें किसी और बरस काटी थीं, और अब तक उन्हें बताने लायक़ नहीं समझा था। बताने लायक़ वे अब हुई थीं।

चौथे दिन उसने ऊपर वाली माँद देख ली। पाँचवें दिन वह वहाँ चली गई। किसी ने रोका नहीं।

जाते हुए उसने तीनों को बताया कि उसने यह क्यों किया। उसने ऊपर वाली जगह के तीन फ़ायदे गिनाए और तीनों सही थे। तीनों ने सुना और तीनों ने सिर हिलाया।

उस बरसात नाला वैसा ही चढ़ा जैसा हर बरस चढ़ता है। नीचे वाली माँद तीन दिन पानी में रही।

ऊपर वाली माँद में दिक़्क़त भी थी। वह छोटी थी, उसका मुँह हवा की तरफ़ पड़ता था, और वहाँ से पानी तक जाने में दुगना वक़्त लगता था। चंचला ने ये तीनों बातें पहले हफ़्ते में गिन लीं और फिर भी लौटी नहीं, क्योंकि लौटना मानना पड़ता।

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यह बात चंचला को बरसात के बाद दिखी। एक ही बार में। पूरी।

तीनों ने वही किया था जो वह करती है। पहले जगह दिखाओ, फिर उसका फ़ायदा गिनवाओ, और फिर कोई ऐसी बात कहो जो सामने वाले को अपने ऊपर लागू लगे। तीनों बातें अलग-अलग दिनों में, अलग-अलग मुँह से।

उन्होंने यह उसी से सीखा था। और कहीं से सीख भी नहीं सकते थे।

यह सोचकर उसे एक बात और दिखी। तीन बरस वह जिस बात पर नहीं मानी थी, उस पर चौथे बरस मान गई, और मानते वक़्त उसे यह लगा कि यह उसका अपना फ़ैसला है। हर बार सामने वाले को भी यही लगता होगा। यह उसने पहले कभी नहीं सोचा था।

चंचला नाराज़ नहीं हुई। ग़ुस्सा भी नहीं आया। उसे थोड़ा डर ज़रूर लगा, और वह डर आज तक बना हुआ है।

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अब जब कोई उसके सामने कोई बात रखता है, तो वह पहले यह देखती है कि यह बात किसने रखी है और उससे पहले किसने क्या कहा था। इसमें वक़्त लगता है और इससे उसका काम धीमा हो गया है।

तीनों को यह मालूम है। तीनों चुप हैं। और यह चुप्पी भी उन्होंने उसी से सीखी है।