उस जंगल में लोमड़ी की चालाकी के किस्से हर जानवर को पता थे। कौन सा किस्सा सच है और कौन सा बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया, यह किसी को नहीं पता था। लोमड़ी ने कभी किसी किस्से का खंडन नहीं किया। उसे यह ठीक लगता था कि लोग उससे पहले ही सावधान हो जाएँ। इससे उसका आधा काम बिना किए ही हो जाता था।
एक किस्सा ऐसा था जो सच था। तीन बरस पहले उसने मोर के अंडे उठाए थे और पकड़ी गई थी। बाक़ी सब में सच कम था। जैसे यह कि वह बगुलों को गिनकर उठाती है, या यह कि उसने एक बार पूरे झुंड को नाले के उस पार भेज दिया था। ये दोनों बातें उसने ख़ुद नहीं फैलाईं, पर उसने रोकी भी नहीं।
फागुन में जंगल के किनारे वाले हिस्से पर आदमी आए। चार आदमी, एक बैलगाड़ी, और एक आरा।
आरा दो आदमियों वाला था, लंबा, जिसके दोनों सिरों पर हत्थे लगे होते हैं। ऐसा आरा साल के मोटे तने चीरने के काम आता है और उसकी आवाज़ दूर तक जाती है, रुक-रुक कर, एक ही लय में।
पहली रात जंगल में किसी को नींद नहीं आई।
आरे की आवाज़ में जो चीज़ बुरी है वह उसका तेज़ होना नहीं है। बुरी बात यह है कि वह रुकती है और फिर शुरू होती है, बराबर के अंतर पर, और जानवर इसी से समझ जाते हैं कि यह हवा नहीं है। हवा एक लय में नहीं चलती। आदमी चलता है।
सुबह जानवरों ने आपस में बात की और जो बातें निकलीं वे सब एक ही तरफ़ जाती थीं। आदमी आ गए हैं। पेड़ गिरेंगे। फिर और आदमी आएँगे।
किसी ने लोमड़ी से नहीं कहा कि जाकर देख आओ। वह ख़ुद गई, और हिम्मत इसमें कहीं नहीं थी। उसे उधर से एक रास्ता मालूम था जिससे वह क़रीब तक पहुँच सकती थी।
वह दो दिन देखती रही।
देखना आसान नहीं था। आदमी सुबह आते थे और शाम को चले जाते थे, और दिन में लोमड़ी को झाड़ी में पड़े रहना पड़ता था, बिना हिले, क्योंकि उनके साथ एक कुत्ता भी था। कुत्ता बँधा हुआ था, पर बँधा हुआ कुत्ता भी भौंकता है।
उसने जो देखा वह यह था। आदमियों ने कुल तीन पेड़ गिराए और तीनों गिरे हुए थे, आँधी वाले, जो पिछली बरसात से पड़े हुए थे। खड़े पेड़ों को उन्होंने छुआ भी नहीं। गाड़ी पर लकड़ी लदी जा रही थी और गाड़ी छोटी थी।
छोटी गाड़ी का मतलब यह होता है कि आदमी ज़्यादा लकड़ी ले जाने आए ही नहीं। जो आदमी जंगल काटने आता है वह ट्रक लाता है और आरा मशीन वाला लाता है। दो हत्थे वाला आरा उस काम का नहीं है। यह बात लोमड़ी ने बैठे-बैठे सोच ली थी।
तीसरे दिन उसने जानवरों को यह बता दिया। उसने यह भी बता दिया कि उनका काम एक-दो दिन में ख़त्म हो जाएगा।
किसी ने उसकी बात नहीं मानी।
सुनने वाले चुप नहीं रहे। उन्होंने पूछा कि तुम इतने पास कैसे पहुँचीं, और तुम्हें कुत्ते ने क्यों नहीं देखा, और तुम दो दिन वहाँ करती क्या रहीं। हर सवाल का जवाब उसके पास था और हर जवाब सुनने के बाद अगला सवाल आ गया।
बात मानने लायक़ नहीं थी, ऐसा नहीं था। दिक़्क़त कहने वाली में थी। उसने जो बताया वह गिना जा सकने वाली बातें थीं। तीन पेड़, चारों गिरे हुए नहीं, एक छोटी गाड़ी।
जंगल में यह तय हो चुका था कि लोमड़ी जो कहे उसमें कुछ न कुछ होता है। यही बात बरसों से उसके काम आती रही थी। इस बार वही बात उलटी पड़ी।
हिरनों ने उस हिस्से से हटना शुरू कर दिया। उनके पीछे और जानवर हटे। दो दिन में जंगल का वह पूरा किनारा ख़ाली हो गया।
लोमड़ी ने रोकने की कोशिश दोबारा नहीं की। एक बार कहकर देख चुकी थी और उसे यह दिख गया था कि दूसरी बार कहने से उलटा होगा, क्योंकि जो बात दो बार कही जाए उसमें लोग और गहरी चाल ढूँढ़ते हैं।
किनारा छोड़ने की क़ीमत थी। उसी किनारे पर वह घास थी जो फागुन में सबसे आख़िर तक हरी रहती है, और उसी तरफ़ पानी का वह गड्ढा था जो गर्मी में सबसे बाद में सूखता है।
जो जानवर भीतर की तरफ़ गए, उन्हें भीतर वालों के साथ जगह बाँटनी पड़ी। इसमें झगड़े हुए और दो हिरन के बच्चे उन्हीं दिनों में अलग हो गए।
आदमी चौथे दिन चले गए। ठीक वैसे, जैसा लोमड़ी ने कहा था। गाड़ी भर गई थी।
जानवर एक हफ़्ते बाद लौटे। तब तक घास चरने लायक़ नहीं रही थी।
पानी वाला गड्ढा भी उन दिनों में आधा उतर गया था, क्योंकि किसी के न आने से वह भरता नहीं, बस सूखता है। यह बात किसी को नहीं मालूम थी और लोमड़ी ने बताई भी नहीं।
इस पर बाद में कोई नहीं बोला। लोमड़ी भी नहीं। कहने को कुछ था भी नहीं, क्योंकि जो हुआ वह किसी की चाल से नहीं हुआ था।
अब वह एक काम करती है जो पहले नहीं करती थी। जब उसे कोई बात सबको बतानी होती है, तो वह उसे ख़ुद नहीं कहती। वह किसी और से कहलवाती है, और यह चुनने में उसे कुछ दिन लग जाते हैं कि किससे कहलवाए।
यह भी एक चालाकी है। इसका किस्सा जंगल में नहीं चलता, क्योंकि इसमें बताने लायक़ कुछ नहीं है।