नरोत्तम व्यापारी था और महीने में बीस दिन सफ़र में रहता था। उसके साथ हमेशा एक कुत्ता चलता था, जिसे उसने कभी ख़रीदा नहीं था। वह एक बरसात में उसके पीछे-पीछे आ गया था और फिर कभी नहीं गया। नरोत्तम ने उसे नाम नहीं दिया। नाम गाँव ने दिया। किसी ने उसे शेरू कह दिया और वह चिपक गया, जैसे नाम चिपक जाते हैं। नरोत्तम फिर भी ‘कुत्ता’ कहकर बुलाता था, और कुत्ता आ जाता था।
उस साल चैत में नरोत्तम को सबसे लंबे सफ़र पर निकलना था। तीन हफ़्ते। चार मंडियाँ। रास्ते का एक हिस्सा घने जंगल से होकर जाता था और वहाँ रात में रुकना पड़ता। पिछली बार शेरू के पंजे में काँटा धँस गया था और वह तीन दिन लंगड़ाता रहा था। इस बार नरोत्तम ने तय किया कि वह साथ नहीं जाएगा। उसने उसे दुकान के पीछे रस्सी से बाँधा और मुनीम से कह दिया कि सुबह-शाम रोटी डालता रहे। शेरू भौंका नहीं। वह बस बैठ गया और देखता रहा।
नरोत्तम सुबह अँधेरे में निकला, ताकि शेरू उसे जाते हुए न देखे। दो कोस चलने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा। रास्ता ख़ाली था। उसे अच्छा लगा। फिर थोड़ी देर बाद अच्छा नहीं लगा। दोपहर तक वह यह बात भूल चुका था, क्योंकि सफ़र में भूलना आसान होता है। पहली मंडी में सौदा ठीक रहा। दूसरी में और बेहतर।
तीसरे दिन नरोत्तम जंगल वाले हिस्से में पहुँचा। रास्ता सुनसान था और शाम उतर रही थी। तभी झाड़ियों के पीछे से एक तेंदुआ निकला। वह भूखा था। यह उसकी चाल से दिखता था। नरोत्तम के पास लाठी थी, और उस वक़्त लाठी का कोई मतलब नहीं था। तेंदुआ पास आया। और तभी पीछे से शेरू आकर बीच में खड़ा हो गया। नरोत्तम उसे बाँधकर आया था। रस्सी उसने पहली ही रात चबा डाली होगी। तीन दिन से वह पीछे-पीछे चल रहा था, इतनी दूर रहकर कि दिखाई न दे। भौंकना उसने तभी शुरू किया जब छिपे रहने का कोई फ़ायदा नहीं बचा। लड़ाई लंबी नहीं चली। तेंदुआ कहीं ज़्यादा ताक़तवर था, पर उसे शिकार चाहिए था, झगड़ा नहीं। जब वह पीछे हटा, तब तक शेरू का एक कान और कंधा फट चुका था।
तेंदुए के जाने के बाद भी नरोत्तम काफ़ी देर हिल नहीं पाया। फिर वह घुटनों के बल बैठा। शेरू का कान लटक रहा था और कंधे से ख़ून बह रहा था। पर वह पूँछ हिला रहा था। यही बात नरोत्तम को सबसे बुरी लगी। उसने अपनी धोती फाड़ी। घाव बाँधा। उस रात उन्होंने आगे का सफ़र नहीं किया। नरोत्तम ने पेड़ के नीचे आग जलाई और सुबह तक जागता रहा। शेरू उसके पैरों के पास सोया रहा।
कान कभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। वह आधा मुड़ा ही रहा। कंधे पर बाल दोबारा नहीं उगे और वहाँ की खाल चमकती रहती थी। गाँव के लोग उसी निशान से उसे दूर से पहचान लेते थे। नरोत्तम ने उस सफ़र के बाद अपना रास्ता बदल दिया। अब वह जंगल वाला हिस्सा नहीं लेता था, चाहे उससे डेढ़ दिन ज़्यादा लगे। मुनीम ने एक बार हिसाब लगाकर बताया कि इससे साल भर में कितना नुक़सान होता है। नरोत्तम ने हिसाब सुन लिया। रास्ता फिर भी नहीं बदला।
गाँव लौटने के बाद नरोत्तम ने सफ़र कम नहीं किया, क्योंकि सफ़र से ही घर चलता था। पर अब वह शेरू को छोड़कर नहीं जाता था। बैलगाड़ी के पिछले हिस्से में उसने बोरियाँ थोड़ा खिसकाकर जगह बना दी, ताकि थक जाने पर वह चढ़ सके। कहानी गाँव में फैली, और फैलते-फैलते बड़ी होती गई। किसी की ज़बानी तेंदुआ शेर बन गया। किसी की ज़बानी दो तेंदुए। लोग शेरू के आगे रोटी डालते और शेरू रोटी खा लेता था। नरोत्तम ख़ुद इस बारे में ज़्यादा बात नहीं करता था। जब कोई पूछता कि कुत्ता उस दिन जंगल में पहुँचा कैसे, तो वह कंधे उचका देता। उसे ख़ुद इसका जवाब नहीं आता था।
आठ साल बाद शेरू के लिए गाड़ी के पीछे दौड़ना मुश्किल हो गया। पिछली टाँग में जकड़न रहने लगी और ठंड में वह सुबह देर से उठता। नरोत्तम ने इसका ज़िक्र किसी से नहीं किया, पर उसने अपने चक्कर छोटे कर लिए। बीस दिन पंद्रह हुए, फिर बारह। दूर की दो मंडियाँ उसने छोड़ ही दीं। बही में मुनाफ़ा कम दिखने लगा और नरोत्तम ने उसे वैसे ही रहने दिया। सर्दियों में वह शेरू को दुकान के भीतर, अंगीठी के पास सुला देता था, जहाँ पहले बोरियाँ रखी जाती थीं।
एक सुबह शेरू अंगीठी के पास से नहीं उठा। नरोत्तम काफ़ी देर वहीं बैठा रहा। फिर उसने उसे उठाया और गाँव के बाहर उसी रास्ते पर ले गया जिससे वह पहली बार, बरसात में, पीछे-पीछे आया था। वहीं उसने उसे दफ़नाया। न पत्थर लगाया, न कोई निशान। लौटते हुए उसने पहली और आख़िरी बार उसे उसके नाम से पुकारा।