जंगल में एक नियम था, जो किसी ने लिखा नहीं था। सूरज ढलने से पहले सब अपने-अपने ठिकाने पर पहुँच जाएँ। इस नियम की वजह का नाम कुलपति था। वह जंगल के दक्षिणी छोर पर रहता था और महीने में एक-दो बार ही बाहर निकलता था। जिस रात वह निकलता, अगली सुबह जंगल में कोई न कोई कम हो जाता, और किसी में यह पूछने की हिम्मत नहीं होती कि कौन।

बंदर उस जंगल का नहीं था। वह नदी के उस पार से आया था, जहाँ आम के बाग़ कट गए थे, और उसे रहने के लिए नई जगह चाहिए थी। पहली ही शाम उसने कुछ अजीब देखा। सूरज ढलते ही जंगल ख़ाली हो गया। कोई पक्षी नहीं बोला, कोई हिरन नहीं चरा। उसने एक बूढ़े लंगूर से पूछा कि माजरा क्या है। लंगूर ने सिर्फ़ दक्षिण की तरफ़ इशारा किया और अपने पेड़ पर चढ़ गया।

अगले कई दिन बंदर ने सवाल पूछने में लगाए, और जो जवाब मिले वे आपस में मेल नहीं खाते थे। किसी ने कहा कुलपति पहाड़ जितना बड़ा है। किसी ने कहा वह आग उगलता है। एक चीतल ने कहा कि उसने कुलपति को अपनी आँखों से देखा है, पर जब बंदर ने पूछा कि किस रंग का था, तो चीतल बता नहीं पाया। बंदर ने यह बात गाँठ में बाँध ली। पूरे जंगल में एक भी ऐसा जानवर नहीं था जिसने कुलपति को देखा हो और वह ज़िंदा हो।

तो बंदर ने तय किया कि वह ख़ुद देखेगा। अमावस की रात वह दक्षिणी छोर के सबसे ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया और चुपचाप बैठ गया। आधी रात के बाद कुलपति निकला। वह पहाड़ जितना बड़ा नहीं था, और आग भी नहीं उगल रहा था। वह बड़ा था, इतना कि उसके चलने से नीचे की मिट्टी काँपती थी। पर बंदर ने जो सबसे ज़रूरी बात देखी वह यह थी कि कुलपति चलते हुए सिर नहीं घुमाता था। वह कान घुमाता था।

बंदर ने एक सूखी टहनी तोड़ी और दूर, बाईं तरफ़ फेंक दी। टहनी झाड़ी में गिरी और खड़खड़ाई। कुलपति उसी तरफ़ मुड़ गया, इतनी तेज़ी से कि बंदर की साँस रुक गई। उसने झाड़ी को चीरकर रख दिया। फिर वह रुक गया। वह सुन रहा था। कुछ देर बाद वह वापस चल दिया। बंदर सुबह तक पेड़ पर बैठा रहा, बिना हिले। उसे अब पता चल चुका था कि जंगल का वह अनलिखा नियम क्यों बना था। कुलपति देखता नहीं था। वह सुनता था।

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बंदर और उसकी शरारतें

सुबह उसने सबको इकट्ठा किया और अपनी बात कही। किसी ने यक़ीन नहीं किया। बूढ़े लंगूर ने कहा कि यह बाहर का बच्चा हम सबको मरवाएगा। बंदर ने कहा कि उसे किसी की मदद नहीं चाहिए, सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए। जिस रात वह कहे, उस रात पूरा जंगल चुप रहे। कोई न बोले, कोई न हिले, कोई बच्चा न रोए। बस इतना। जानवरों को यह करने में कोई डर नहीं लगा, क्योंकि यह वही था जो वे बरसों से कर रहे थे।

अगली अमावस को बंदर पूरब वाली ढलान पर बैठा था और उसके पास सूखी टहनियों का एक गट्ठर था। ढलान के आख़िर में एक खड्ड थी, जिसमें बरसात में पानी गिरता था और बाकी महीनों में सिर्फ़ पत्थर पड़े रहते थे। जंगल उस रात इतना चुप था कि बंदर को अपने ही दिल की आवाज़ सुनाई दे रही थी। हवा भी नहीं चल रही थी। फिर आधी रात के बाद मिट्टी काँपने लगी। पहले हल्का। फिर साफ़।

बंदर ने पहली टहनी फेंकी, अपने से दस क़दम आगे। खड़खड़ाहट हुई और भारी क़दमों की आवाज़ उधर मुड़ गई। उसने दूसरी टहनी उससे आगे फेंकी। फिर तीसरी। हर बार वह ख़ुद पीछे हटता जाता और आवाज़ आगे बढ़ती जाती, ढलान की तरफ़। कुलपति आवाज़ के पीछे चलता रहा, तेज़, और भी तेज़, क्योंकि आवाज़ भाग रही थी और भागती हुई चीज़ को पकड़ना उसे आता था। आख़िरी टहनी बंदर ने खड्ड के उस पार फेंकी।

फिर कुछ नहीं हुआ। कोई आवाज़ नहीं। बंदर ने साँस रोक ली। और तब, बहुत नीचे, पत्थरों पर, कुछ गिरा। बंदर ढलान के किनारे तक गया और नीचे झाँका, पर अँधेरे में कुछ नहीं दिखा। वह सुबह तक वहीं बैठा रहा। रोशनी होने पर उसने नीचे देखा, फिर चुपचाप वापस चल दिया। नीचे क्या दिखा था, यह उसने कभी नहीं बताया। जानवरों ने पूछा तो उसने बस इतना बताया कि अब दक्षिणी छोर पर कोई नहीं रहता।

उस बात को कई बरस हो गए। जंगल में अब भी वही नियम है: सूरज ढलने से पहले सब अपने-अपने ठिकाने पर। किसी ने इसे बदलने की बात नहीं उठाई। छोटे बच्चों को यह नियम सिखाया जाता है और साथ में कुलपति का नाम भी बता दिया जाता है, हालाँकि अब कोई ठीक से नहीं जानता कि वह सचमुच था या नहीं। बंदर अब बूढ़ा हो चला है। वह दक्षिणी छोर पर ही रहता है, उसी जगह, जहाँ जाने से आज भी बाकी सब कतराते हैं।