तालाब पर सुबह की पहली हलचल हरित हंस से शुरू होती थी। बाकी पक्षी तब भी सो रहे होते, जब वह अपने घोंसले की मरम्मत शुरू कर देता। एक तिनका इधर, एक उधर, रोज़ थोड़ा-थोड़ा। किसी ने उससे नहीं पूछा कि रोज़ क्या ठीक करता है, क्योंकि घोंसला बाहर से देखने पर हमेशा ठीक ही लगता था। बाकी पक्षी साल में एक बार, बरसात से ठीक पहले, अपने घोंसले सँभालते थे। तब तक कई घोंसले इतने कमज़ोर हो चुके होते कि सँभालने लायक़ भी नहीं बचते। हरित का घोंसला हर बरसात में वैसा का वैसा रहता था। यह बात किसी ने नोट नहीं की थी, क्योंकि जो चीज़ कभी टूटती ही नहीं, उस पर ध्यान भी नहीं जाता।

वह रोज़ जो ठीक करता था, वह भी कोई बड़ी चीज़ नहीं होती थी। एक तिनका खिसक गया हो तो उसे वापस बैठा देना। किनारे का एक रेशा उठ आया हो तो उसे अंदर दबा देना। नीचे की तह में कहीं ढीलापन आ गया हो तो एक तिनका और खोंस देना। इसमें रोज़ का इतना ही वक़्त लगता था जितना पानी पीने में लगता है।

यह काम इसलिए मुश्किल नहीं है कि इसमें मेहनत लगती है। यह इसलिए मुश्किल है कि इसे करने पर कुछ होता हुआ नहीं दिखता।

बाक़ी पक्षी बरसात से पहले वाले हफ़्ते में जुटते थे। पूरा तालाब उन दिनों भरा रहता था, सब तिनके ढो रहे होते, और उसमें एक रौनक़ भी होती थी। हरित उन दिनों कुछ नहीं करता था, क्योंकि उसके पास करने को कुछ बचा नहीं होता था। इस वजह से कुछ पक्षी उसे आलसी समझते थे और यह बात दो बार उसके सामने भी कही गई।

उस बरस बरसात जल्दी आ गई।

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आम तौर पर पहली बारिश हल्की होती है और उससे किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। उस बरस पहली ही बारिश के साथ हवा थी और वह पूरी रात चली।

सुबह तालाब पर नौ घोंसले नहीं थे।

नौ में से चार ख़ाली थे। तीन में अंडे थे। दो में बच्चे थे।

घोंसला एक ही तरह से नहीं टूटता। कुछ पूरे के पूरे नीचे आ गए थे, डाल समेत, क्योंकि डाल ही कमज़ोर थी। बाक़ी नीचे से खुल गए थे। नीचे वाली तह ही वह जगह है जहाँ सबसे पहले ढीलापन आता है, क्योंकि सारा वज़न वहीं पड़ता है और वहीं कोई देखता नहीं। ऊपर से घोंसला आख़िर तक ठीक दिखता रहता है और उसी दिन गिरता है जिस दिन हवा तेज़ चले।

हरित का घोंसला वैसा का वैसा था।

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उस सुबह पहली बार किसी ने उसकी तरफ़ ध्यान से देखा।

दोपहर तक वे उसके पास आ गए। उन्होंने पूछा कि वह क्या करता है।

हरित ने बता दिया। एक तिनका, रोज़। ढीली जगह पर एक और। किनारा उठे तो दबा दो।

उन्हें यह जवाब पसंद नहीं आया और यह वाजिब था। वे जो सुनना चाहते थे, वह कोई तरीक़ा था। कौन सा तिनका, किस तरफ़ से, किस मौसम में। ऐसा कुछ जो सुनकर किया जा सके।

ऐसा कुछ था ही नहीं।

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हरित ने कोशिश भी की। वह दो पक्षियों के साथ उनके घोंसलों तक गया और उसने उन्हें दिखाया कि नीचे की तह कहाँ से टटोली जाती है और ढीला तिनका उँगली में कैसा लगता है। यह दिखाने में उसे आधी दोपहर लगी और दोनों ने ठीक से सीख भी लिया। सीखने में कभी कोई दिक़्क़त नहीं थी।

हरित का घोंसला चार बरस पुराना था और उन चार बरसों में वह लगभग पूरा बदल चुका था, एक-एक तिनका करके, बिना किसी दिन बदले हुए। जो चीज़ इस तरह बनी हो, उसे कोई किसी को दे नहीं सकता। चार बरस दिए नहीं जाते।

फिर भी उन्होंने शुरू किया। ग्यारह पक्षियों ने उस हफ़्ते रोज़ अपने घोंसले देखे।

ग्यारह दिन बाद तीन बचे थे। पंद्रहवें दिन एक।

इसमें कोई बेईमानी नहीं थी और आलस भी नहीं था। रोज़ का काम तभी टिकता है जब उसका कुछ नतीजा दिखे। यहाँ नतीजा यह था कि कुछ नहीं हुआ। घोंसला वैसा ही रहा जैसा कल था। और परसों भी वैसा ही रहेगा।

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आदमी हो या पक्षी, वह उस चीज़ को महसूस नहीं कर पाता जो हुई ही नहीं। जो टूटा नहीं, उसका टूटना किसी को याद नहीं आता।

हरित को यह कभी अखरा नहीं। उसे यह मालूम भी नहीं था कि वह कुछ ख़ास कर रहा है। वह इसे उसी तरह करता था जिस तरह वह चोंच साफ़ करता था।

अगली बरसात तक तालाब पहले जैसा हो गया। जिनके घोंसले गए थे, उन्होंने नए बना लिए, और नया घोंसला दो-तीन बरस तो चल ही जाता है। इसलिए इस बात की भी ज़रूरत नहीं रह गई कि रोज़ कुछ किया जाए।

बरसात से एक हफ़्ता पहले फिर वही रौनक़ थी। सब तिनके ढो रहे थे।

एक बची।

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मालती का घोंसला उस रात वाला था जिसमें बच्चे थे। दोनों गए थे। वह उस बरस से रोज़ अपना घोंसला देखती है।

उसने यह किसी की सलाह से नहीं शुरू किया। उसने हरित से कोई सलाह भी नहीं ली थी, तब भी नहीं और बाद में भी नहीं। उसे बस यह मालूम हो गया था कि एक रात में क्या-क्या जा सकता है, और यह जान लेने के बाद रोज़ का एक तिनका महँगा नहीं लगता।

वह यह सुबह नहीं करती। वह शाम को करती है, जब बाक़ी सब बैठ चुके होते हैं।

तो अब उस तालाब पर दिन में दो वक़्त ऐसे हैं जब एक पक्षी अपने घोंसले पर लगा होता है और देखने वाले को कुछ होता हुआ नहीं दिखता। एक सुबह की पहली हलचल से पहले। एक शाम की आख़िरी के बाद।