खूँटा दरवाज़े से चार क़दम पर था और उस पर धौली बँधती थी। बाक़ी सात बकरियाँ पीछे बाड़े में बँधती थीं, जहाँ से घर नहीं दिखता। धौली इसे अपनी बात मानती थी। सफ़ेद वह अकेली थी, और उसके सींग भी सबसे अच्छे मुड़े हुए थे।
पीछे वाली बकरियों में कजरी सबसे पुरानी थी। धौली उससे अक्सर कहती कि आगे बँधने के लिए कुछ होना पड़ता है। कजरी कोई जवाब नहीं देती थी। जवाब उसके पास था। पर जवाब देने पर बात लंबी होती, और कजरी सात बरस से यही टालती आई थी।
साल में एक बार गाँव में बकरियों का बाज़ार लगता है और रामसरन दो-तीन को ले जाता है। धौली को वह कभी नहीं ले गया। धौली इसे भी अपने हक़ में गिनती थी। जिसे बेचने लायक़ नहीं समझा जाता, वह घर की होती है, यह उसने कजरी को कई बार समझाया था।
रामसरन के घर में आठ बकरियाँ, दो भैंसें और चार लोग थे। क्वार का महीना था। धान पक रहा था और खेतों की तरफ़ से रात में आवाज़ें आने लगी थीं, जैसी इस मौसम में आती हैं।
उस साल रामसरन एक कुत्ता ले आया। कुत्ता बड़ा नहीं था, पर वह ऐसी नस्ल का था जो रात भर जागती है।
कुत्ते के आने की वजह भी थी। उस बरस दो घरों से बकरियाँ गई थीं और दोनों बार रात में गई थीं। रामसरन ने चौक में इस पर बात की थी और उसी बात के कुछ दिन बाद वह कुत्ता आया। चौक बाड़े से सटा हुआ है, इसलिए यह सब वहाँ बैठे-बैठे सुना जा सकता था। धौली ने भी सुना था और उसने इसका कोई मतलब नहीं निकाला।
कुत्ते को दरवाज़े वाले खूँटे के पास बाँधा गया। और धौली को पीछे कर दिया गया।
यह उसके लिए समझ से बाहर था। कुत्ता सफ़ेद नहीं था। उसके सींग ही नहीं थे। वह दूध भी नहीं देता था। फिर भी उसे वह जगह मिल गई थी जो सात बरस से धौली की थी।
पहले हफ़्ते उसने वही किया जो ऐसे मौक़े पर किया जाता है। उसने चारा डालते वक़्त सबसे आगे घुसने की कोशिश की। दो बार रस्सी तुड़ाई। एक बार बाड़े का फाटक खोल दिया। इसका नतीजा यह निकला कि उसकी रस्सी छोटी कर दी गई।
दूसरे हफ़्ते उसने देखना शुरू किया, क्योंकि और कुछ करने को था नहीं।
उसने जो देखा वह यह था। कुत्ते को दिन में खोल दिया जाता है और रात में बाँधा जाता है। बाँधा उसी खूँटे पर जाता है, दरवाज़े से चार क़दम पर। और वह वहाँ इसलिए नहीं बाँधा जाता कि वह देखने में अच्छा लगे।
फिर उसे एक और बात याद आई, और वह याद आते ही चुभी। सात बरस में रामसरन ने उसके सींगों की कभी तारीफ़ नहीं की थी। किसी ने नहीं की थी। जो बात लोग कहते थे वह यह थी कि यह ज़्यादा बोलती है।
तीसरी बात छोटी थी। जिस रात बादल होते और अँधेरा ज़्यादा होता, उस रात कुत्ते की रस्सी लंबी कर दी जाती। जिस रात चाँद होता, छोटी। यानी रस्सी की लंबाई का चाँद से रिश्ता था। और चाँद से रिश्ता उसी चीज़ का होता है जिसे रात में देखना या सुनना हो।
धौली सचमुच ज़्यादा बोलती थी। रात में कुछ भी हो, कोई आहट, कोई परछाईं, वह चिल्लाना शुरू कर देती थी और तब तक नहीं रुकती थी जब तक कोई भीतर से निकलकर देख न ले।
वह आगे इसलिए बाँधी जाती थी।
यह जानने के बाद उसने चिल्लाना बंद कर दिया, और यह उसने ग़ुस्से में किया। पीछे बाड़े में उसने दो हफ़्ते तक रात में मुँह नहीं खोला।
उन दो हफ़्तों में कुछ नहीं हुआ, और किसी ने उसकी चुप्पी पर ध्यान तक नहीं दिया।
फिर क्वार के आख़िरी दिनों में एक रात सियार बाड़े के पीछे तक आ गया। कुत्ता सोता रहा। कुत्ते इसी तरह सोते हैं जब उन्हें रोज़ का कुछ भी लगे, और सियार की आवाज़ उस घर के लिए रोज़ की थी।
धौली जाग रही थी और उसने सुन लिया। एक पल के लिए उसने कुछ नहीं किया। फिर उसने वही किया जो वह सात बरस से करती आई थी, और उस रात उसने बहुत देर तक किया।
उस एक पल में उसने यह भी सोचा कि अगर वह चुप रह जाए तो सुबह सबको मालूम होगा कि कुत्ता सोता रह गया था। यह सोचना उसे बुरा नहीं लगा। फिर उसे यह दिखा कि पीछे बाड़े में सबसे किनारे कजरी बँधी है।
रामसरन लालटेन लेकर निकला। उसका लड़का भी निकला। सियार बाड़े के पीछे से भागा और उस रात कोई बकरी कम नहीं हुई।
अगले दिन इस पर कोई बात नहीं हुई। इस तरह की बात पर होती भी नहीं।
तीन दिन बाद रामसरन ने धौली की रस्सी खोली और उसे आगे लाकर बाँध दिया, दरवाज़े से चार क़दम पर, कुत्ते से थोड़ा हटकर। दोनों अब वहीं बँधते हैं।
धौली को अब भी लगता है कि वह उस बाड़े की सबसे अच्छी बकरी है, और हो सकता है कि वह सही सोचती हो। फ़र्क़ इतना पड़ा है कि अब उसे मालूम है कि उसे आगे किस वजह से बाँधा जाता है, और वह वजह उसके सींग नहीं हैं। रात में जब कुत्ता सोता है, वह जागती रहती है, और यह बात कुत्ते को आज तक पता नहीं चली।