भारीलाल हाथी जब चलता था तो रास्ता ख़ुद ही ख़ाली हो जाता था। यह बात उसे बहुत पसंद थी। वह जान-बूझकर उन्हीं पगडंडियों से जाता जहाँ भीड़ हो, सिर्फ़ यह देखने के लिए कि सब किनारे हट जाते हैं। जंगल का राजा गब्बर शेर था, पर भारीलाल का मानना था कि राजा वह होना चाहिए जिससे सब हटते हैं, न कि वह जिससे सब डरते हैं। इन दोनों में क्या फ़र्क़ है, यह उसने कभी सोचा नहीं था।
हटने में सबको बराबर मेहनत नहीं पड़ती। हिरन एक छलाँग में किनारे हो जाता है। बंदर को तो हटना ही नहीं पड़ता। दिक़्क़त उनकी होती है जो धीरे चलते हैं, और सबसे ज़्यादा दिक़्क़त बूढ़े कछुए की थी, जिसे रास्ता छोड़ने में इतना वक़्त लगता था कि भारीलाल को रुकना पड़ जाता।
एक बार भारीलाल ने उससे कहा था कि तू किनारे-किनारे चला कर। कछुआ चुपचाप सुनता रहा था। उसके बाद से वह पगडंडी छोड़कर घास में से जाता था, जिसमें दुगना वक़्त लगता है, और यह बात भारीलाल ने कभी नोट नहीं की।
फागुन में एक दोपहर, पानी पर, भारीलाल ने ऊँची आवाज़ में कह दिया कि जंगल का राजा वह होना चाहिए जिसके आगे से जगह ख़ाली होती है। वहाँ बीस-पच्चीस जानवर थे और सबने सुना। गब्बर भी वहीं था, थोड़ी दूर, पानी पीता हुआ।
गब्बर ने सिर उठाया और इतना ही कहा कि तो चलकर देख लेते हैं। उसने बहस नहीं की, क्योंकि बहस में वह जीत भी जाता तो बात वहीं की वहीं रहती।
तय यह हुआ कि दोनों जंगल के सबसे बड़े पेड़ तक दौड़ेंगे। जो पहले पहुँचकर उसे छू ले, बात उसकी। रास्ता वही था जिससे सब रोज़ आते-जाते हैं, नाले के साथ-साथ, फिर ऊपर की तरफ़।
जंगल के जानवर दोनों तरफ़ कतार में खड़े हो गए। कोई बोला नहीं, पर ज़्यादातर की उम्मीद भारीलाल से थी, क्योंकि वह बड़ा था और बड़ा होना सबको जीत जैसा लगता है। बूढ़े कछुए ने सिर्फ़ इतना कहा कि दौड़ लंबी है और रास्ता उसने बहुत साल से नहीं देखा।
दौड़ शुरू हुई तो पहले कुछ सेकंड भारीलाल पीछे रहा, क्योंकि हाथी को गति पकड़ने में वक़्त लगता है। उसके बाद वह आगे निकल गया और फिर बहुत आगे निकल गया। ज़मीन हिल रही थी और उसके पीछे धूल का एक लंबा बादल चल रहा था।
भारीलाल के पैरों की आवाज़ पूरे जंगल में सुनाई दे रही थी। वह पीछे मुड़कर देखता। शेर दूर था। वह और तेज़ दौड़ता। तेज़ दौड़ते हुए उसे सामने का कम दिखने लगा। पर उसे परवाह नहीं थी। उसे लग रहा था कि आज सब बदल जाएगा।
जो बात भारीलाल को नहीं पता थी वह यह थी कि दो बरस पहले सावन में नाले ने अपना किनारा काट दिया था। पानी ने ऊपर वाले मोड़ के पास एक खाई बना दी थी, और उसके बाद से पगडंडी वहाँ से नहीं जाती। वह दस क़दम पहले ही दाहिने मुड़ जाती है।
यह बात जंगल में सबको मालूम थी। इसमें कोई राज़ नहीं था। जो रोज़ उस रास्ते से चलता है, उसका पैर अपने आप वहाँ मुड़ जाता है। भारीलाल रोज़ उस रास्ते से नहीं चलता था। भारीलाल के लिए रास्ता ख़ाली हो जाता था, और ख़ाली रास्ते पर आदमी ज़मीन नहीं देखता।
वह मोड़ पर मुड़ा नहीं। वह सीधा गया।
आगे क्या हुआ, यह भारीलाल को बाद में भी ठीक-ठीक याद नहीं रहा। ज़मीन पहले ढीली हुई। फिर नहीं रही। गिरते वक़्त उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली, पर गिरने की आवाज़ इतनी हुई कि दौड़ देखने वाले सब उसी तरफ़ भागे।
खाई गहरी नहीं थी। पर उसकी दीवारें सीधी थीं और मिट्टी भुरभुरी। भारीलाल ने तीन बार निकलने की कोशिश की। तीनों बार फिसलकर वापस गिरा। उसकी ताक़त वहाँ किसी काम नहीं आई। तभी ऊपर से एक परछाईं पड़ी। गब्बर किनारे पर खड़ा था। पीछे से बाकी जानवर भी आ रहे थे।
गब्बर ने ऊपर से देखा और नीचे नहीं उतरा। वह जानता था कि उतरने से एक की जगह दो फँसेंगे। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि रुको, और वापस मुड़कर बाक़ी जानवरों की तरफ़ चला गया।
बेलें कहाँ मिलेंगी, यह किसी को ठीक-ठीक नहीं मालूम था, क्योंकि बेलें पगडंडी पर नहीं होतीं। वे घास के भीतर होती हैं। बूढ़े कछुए ने बताया कि नाले के मोड़ से पहले वाली घास में मोटी बेलें हैं। यह उसे इसलिए मालूम था कि वह बरसों से उसी घास में से आता-जाता था।
अकेला शेर उसे नहीं निकाल सकता था, यह दोनों जानते थे। जानवरों ने बेलें काटीं, टहनियाँ डालीं, और मिट्टी को दबाकर एक ढलान बनाई। इसमें पूरी दोपहर लगी। जब भारीलाल आख़िरकार बाहर आया, तो सबसे आगे वही बूढ़ा कछुआ खड़ा था, जिसे भारीलाल ने कभी रास्ते से हटने के लिए कहा था।
पानी सबसे पहले बंदरों ने पहुँचाया, पत्तों के दोनों में, कई बार में, क्योंकि एक बार में उतना ही आता है जितना एक हाथी के लिए कुछ भी नहीं होता। किसी ने दौड़ की बात नहीं छेड़ी। गब्बर शाम से पहले वहाँ से चला गया। जाते हुए वह भारीलाल के पास से निकला और रुका नहीं।
दौड़ का नतीजा किसी ने कभी घोषित नहीं किया। पेड़ को उस दिन कोई नहीं छू पाया। भारीलाल कई हफ़्तों तक लंगड़ाकर चलता रहा, और इस बीच उसे पहली बार पता चला कि जंगल की पगडंडियाँ कितनी सँकरी हैं। ठीक होने के बाद उसने एक काम शुरू किया, जिसके लिए किसी ने नहीं कहा था। वह उन रास्तों को चौड़ा करने लगा, जहाँ से छोटे जानवरों को निकलने में दिक़्क़त होती थी।