जंगल के किनारे वाले पेड़ों पर पक्षियों के घोंसले थे, और नीचे एक कुत्ता रहता था। कुत्ता भूखा नहीं था। उसे खाना मिल जाता था। फिर भी वह रोज़ शाम को उन्हीं पेड़ों के नीचे आकर बैठ जाता और ऊपर देखता रहता। पक्षी उसकी वजह से नीचे नहीं उतरते थे, और कुत्ते के लिए दिन भर में इससे अच्छा कुछ नहीं था।

वह कुछ करता नहीं था। भौंकता भी नहीं था। बस बैठता था।

पक्षियों के लिए इतना ही काफ़ी था। पक्षी ज़मीन पर उतरे बिना नहीं रह सकता, चाहे उसका घोंसला कितना भी ऊँचा हो। उसे नीचे से दो चीज़ें चाहिए। एक कीड़े, जो शाम को भैंसों के खुरों से उठी हुई मिट्टी में निकलते हैं। दूसरी रेत के छोटे-छोटे दाने, जिन्हें वे निगलते हैं और जिनके बिना दाना पेट में पिसता नहीं।

बड़े पक्षी इसे किसी तरह निपटा लेते थे। वे दोपहर में उतरकर काम चला लेते थे, जब कुत्ता अपने घर पर होता था।

बच्चों के लिए यह मुश्किल था। घोंसले से निकले हुए बच्चे दोपहर की गर्मी में नीचे नहीं टिक सकते। उनके लिए सही वक़्त शाम का ही है, और शाम कुत्ते की थी।

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उस बरस की बात है। पेड़ों पर उन्नीस घोंसले थे और उनमें से चौदह में बच्चे थे।

जेठ बीतते-बीतते यह दिखने लगा कि इस बरस के बच्चे पिछले बरस के बच्चों जैसे नहीं हैं। वे उड़ना सीख रहे थे, पर देर से। एक घोंसले के तीन में से दो ही उड़े। यह किसी एक शाम में नहीं हुआ। यह हर शाम थोड़ा-थोड़ा हुआ।

पेड़ पर इस पर बात हुई। बहुत बार हुई।

एक ने कहा कि सब मिलकर उस पर टूट पड़ें। पंद्रह-बीस पक्षी एक साथ किसी कुत्ते पर टूट पड़ें तो कुत्ता भाग जाता है, यह सच है। दूसरे ने पूछा कि उसके बाद क्या। कुत्ता लौटकर आएगा और अगली बार नीचे नहीं बैठेगा, ऊपर देखेगा, और घोंसले नीचे वाली डालों पर हैं।

एक ने राय दी कि घोंसले ऊपर ले जाएँ। ऊपर की डालें पतली हैं और उन पर हवा चलती है। पिछले बरस ऊपर वाले दो घोंसले आँधी में गिरे थे।

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कोई बोला कि दूसरे पेड़ों पर चले जाएँ। दूसरे पेड़ भी हैं, जंगल के भीतर, जहाँ भैंसें नहीं आतीं। भैंसें नहीं आतीं तो शाम को कीड़े भी नहीं उठते।

हर बात का जवाब मौजूद था और इसीलिए कोई बात आगे नहीं बढ़ती थी।

दुलारी उस बरस की सबसे छोटी थी। वह उन तीन में से एक थी जिनमें से दो ही उड़े थे। उसका भाई नहीं उड़ा। वह घोंसले में ही रह गया।

उसने कुत्ते को देखना शुरू किया, और वहीं से बात बदली।

बड़े पक्षी कुत्ते को दुश्मन की तरह देखते थे। दुश्मन को देखने में एक ख़राबी है। आदमी वही देखता है जो डराता है, और बाक़ी सब छूट जाता है। दुलारी छोटी थी और उसे डर उतना नहीं लगता था, क्योंकि उसने अभी नीचे उतरना ठीक से शुरू ही नहीं किया था।

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उसने पंद्रह दिन में एक चीज़ पकड़ी। कुत्ता रोज़ आता था, पर रोज़ एक ही वक़्त पर नहीं आता था। कभी वह जल्दी आ जाता, कभी अँधेरा होने को होता तब आता।

उसने यह भी देखा कि जिस दिन वह देर से आता, उस दिन वह पेट भरा हुआ आता और जल्दी ऊँघने लगता।

फिर उसने वह देखा जो देखने लायक़ था। कुत्ते के आने का वक़्त गाँव वाले घर की छत के धुएँ से बँधा हुआ था। जिस दिन चूल्हा जल्दी जलता, कुत्ता जल्दी आता। जिस दिन देर से, उस दिन देर से। हर दिन।

यह कोई जादू नहीं था। कुत्ते को खाना उसी घर से मिलता था और खाने के बाद ही वह ख़ाली होता था। उसकी शाम उस घर की शाम थी। वह पेड़ के नीचे तभी आ पाता था जब उसका अपना काम निपट जाता।

दुलारी ने यह बात एक बूढ़ी मादा को बताई, जो सबसे ऊँचे घोंसले में रहती थी और जिसकी बात सुनी जाती थी। बूढ़ी ने तीन दिन ख़ुद धुआँ देखा। तीसरे दिन उसने कहा कि लड़की ठीक कह रही है। बात मान ली गई।

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इसके बाद जो हुआ वह लड़ाई नहीं थी। यह एक नया वक़्त था, बस।

पक्षियों ने शाम छोड़ दी। वे धुआँ देखने लगे, और धुआँ उठने से पहले वाले आधे घंटे में नीचे उतरने लगे। वह वक़्त उनके लिए अच्छा नहीं था। धूप अभी बची होती थी और कीड़े कम निकलते थे, क्योंकि मिट्टी ठंडी नहीं हुई होती।

क़ीमत असली थी। एक बूढ़ा नर उन दिनों मरा। गर्मी से, नीचे ही। बच्चों को रोज़ का पेट भरने में पहले से ज़्यादा वक़्त लगने लगा। दो घोंसलों ने हार मानकर जंगल के भीतर वाला रास्ता चुना और चले गए।

पर बच्चे उड़े। सब नहीं। पर उड़े। उस बरस चौदह घोंसलों में से बारह के बच्चे उड़े, जो पिछले बरस से बेहतर था।

कुत्ते ने कभी नहीं जाना कि क्या हुआ। उसके लिए कुछ बदला भी नहीं था। वह रोज़ उसी वक़्त आता था और उसे कभी यह गिनने की आदत नहीं रही थी कि ऊपर कितने हैं।

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दुलारी अब बड़ी है और उसके अपने बच्चे हैं। उसने उन्हें कीड़े पकड़ना सिखाया और उससे पहले एक और चीज़ सिखाई, जो पक्षी अपने बच्चों को नहीं सिखाते। उसने उन्हें बताया कि नीचे उतरने से पहले पेड़ की तरफ़ नहीं, गाँव की तरफ़ देखना है।

कुत्ता अब भी हर शाम आता है। वह उसी जगह बैठता है और ऊपर देखता है, और ऊपर से कोई नहीं उतरता। उसे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। दिन भर में उसका सबसे अच्छा घंटा अब भी वही है।