बगीचे में दो ही थीं जो सुबह सबसे पहले काम पर लग जाती थीं। एक चींटी, जो ज़मीन पर दाने ढोती थी। दूसरी मधुमक्खी, जो ऊपर फूलों से रस लेती थी। दोनों दिन भर एक-दूसरे को देखती रहतीं और शाम को दोनों बराबर थकी होतीं। फ़र्क़ सिर्फ़ एक था। चींटी जो जमा करती, वह ज़मीन के नीचे रहता। मधुमक्खी जो जमा करती, वह ऊपर डाल पर लटकता।

एक दिन, जब चींटी अपने छोटे से घर के लिए बीज इकट्ठा कर रही थी, तो उसने मधुमक्खी को देखा, जो फूलों से रस चूस रही थी। चींटी ने मधुमक्खी से कहा, "मधुमक्खी दीदी, तुम हमेशा फूलों से रस इकट्ठा करती रहती हो। क्या तुम कभी आराम नहीं करती हो?"

मधुमक्खी हंसते हुए बोली, "नहीं, चींटी, मुझे आराम नहीं करना चाहिए। मुझे अपनी मेहनत से शहद इकट्ठा करना है ताकि सर्दियों में मुझे कोई परेशानी न हो। जब सर्दी आएगी, तो हम सभी को अपने संसाधनों की जरूरत पड़ेगी।"

चींटी ने सोचा, "मधुमक्खी कितनी समझदार है। वह सर्दियों के लिए इतनी मेहनत कर रही है। मैं भी अपने घर में पर्याप्त सामान इकट्ठा करूंगी ताकि मुझे कभी भूखा न रहना पड़े।" इस विचार से चींटी ने अपना काम जारी रखा और लगन से बीज इकट्ठा करती रही।

उस साल सर्दी जल्दी आई। एक हफ़्ते में फूल मुरझा गए। चींटी ने काम बढ़ा दिया। दिन में दो की जगह चार चक्कर। मधुमक्खी भी लगी रही। पर रस कम मिलता गया। दोनों में से किसी ने यह बात नहीं उठाई। दोनों को लगा कि सामने वाली सँभाल लेगी।

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लेकिन, कुछ समय बाद मौसम बदलने लगा। गर्मी धीरे-धीरे सर्दी में बदलने लगी, और बगिचे में ठंड बढ़ने लगी। चींटी और मधुमक्खी दोनों को महसूस हुआ कि सर्दियों का समय बहुत जल्दी आ गया है।

एक दिन, सर्दी अपने चरम पर पहुँच गई और बगिचे में बर्फ जम गई। चींटी का घर और बगीचा पूरी तरह से बर्फ से ढक गए थे। अब चींटी को अपना किया हुआ काम नजर आने लगा, क्योंकि उसके पास सर्दी के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री थी। वहीं, मधुमक्खी का भी छत्ता था, और उसके पास भी शहद का पर्याप्त भंडार था।

बर्फ़ पड़ने से पहले एक रात तेज़ हवा चली। सुबह मधुमक्खी बाहर आई। छत्ते का ऊपर वाला हिस्सा टूट चुका था। नीचे गिरा पड़ा था। उसमें जो शहद था, वह मिट्टी में मिल गया। जो बचा, वह पंद्रह दिन का था। सर्दी उस साल दो महीने चली।

एक दिन, जब चींटी अपने घर में आराम कर रही थी, वह बाहर गई और देखा कि मधुमक्खी काफी परेशान और थकी हुई नजर आ रही थी। चींटी ने देखा कि मधुमक्खी के पास अब शहद का कोई भंडार नहीं था, और वह ठंड के कारण सर्दी से कांप रही थी। चींटी ने सहानुभूति से मधुमक्खी से पूछा, "क्या हुआ, मधुमक्खी दीदी? आप तो इतनी मेहनत करती थीं, फिर अब आपके पास शहद क्यों नहीं है?"

मधुमक्खी ने दुखी होते हुए कहा, "मैंने ज्यादा मेहनत की थी, लेकिन अब बर्फबारी के कारण मैं फूलों से रस इकट्ठा नहीं कर पा रही हूँ। और जो शहद था, वह सर्दी में खत्म हो गया है। अब मुझे बहुत कठिनाई हो रही है।"

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चींटी ने अपनी खाद्य सामग्री का भंडार देखा और मधुमक्खी से कहा, "तुमने मेहनत तो बहुत की थी, लेकिन तुमने भविष्य के लिए कोई योजना नहीं बनाई थी। मैंने समय रहते अपनी ज़रूरत के अनुसार भोजन इकट्ठा कर लिया था। अब मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं। तुम मेरे पास आ जाओ, मैं तुम्हें थोड़ी सी दाने दे सकती हूं।"

मधुमक्खी ने शुक्रिया कहा और चींटी के पास जाकर उसकी मदद ली। चींटी ने उसे अपने घर में बैठने दिया और उसे अपनी खाद्य सामग्री दी। धीरे-धीरे, सर्दी का मौसम बीतने लगा, और मौसम फिर से बदलने लगा।

चींटी का घर छोटा था। दोनों को सटकर बैठना पड़ता। मधुमक्खी को यह अजीब लगा। वह हमेशा ऊपर रही थी। हवा में। अकेले। यहाँ नीचे अँधेरा था। पर ठंड नहीं थी। पहली रात उसे नींद नहीं आई। दूसरी रात आ गई।

इस घटना के बाद, मधुमक्खी को समझ में आया कि अगर वह पहले से अपनी मेहनत के साथ साथ योजना भी बनाती, तो उसे इस संकट से नहीं गुजरना पड़ता। उसने यह सीखा कि मेहनत ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए सही योजना भी जरूरी है।

इसके बाद, मधुमक्खी और चींटी दोनों ने मिलकर काम करना शुरू किया। अब मधुमक्खी सर्दी आने से पहले शहद इकट्ठा करती और चींटी खाद्य सामग्री इकट्ठा करती। दोनों ने एक-दूसरे से यह सीखा कि मेहनत और योजना दोनों का मेल जीवन में सफलता लाता है।

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अगली सर्दी से पहले दोनों ने एक चीज़ बदली। मधुमक्खी ने अपना कुछ शहद चींटी के घर में रखवा दिया, ज़मीन के नीचे, जहाँ हवा नहीं पहुँचती। और चींटी ने अपने कुछ दाने छत्ते में रखे, ऊपर, जहाँ पानी नहीं चढ़ता। किसी ने इसे योजना नहीं कहा। पर उस साल दोनों के पास पूरी सर्दी का सामान था।