जंगल के बीचोंबीच वाले तालाब पर दिन में बहुत भीड़ रहती थी। रात को वहाँ सिर्फ़ एक जागता था। उल्लू सबसे ऊँचे पेड़ की डाल पर बैठता और नीचे देखता रहता। दिन वाले जानवर उससे कहते कि वह ज़िंदगी सोने में गँवा देता है। वह जवाब नहीं देता था। उल्लू जवाब नहीं देता था। उसे पता था कि जो वह रात में देखता है, वह उनमें से किसी ने नहीं देखा।
रात में तालाब पर वही होता है जो दिन में नहीं होता। जो जानवर दिन में एक-दूसरे से दूर रहते हैं, वे रात में एक ही किनारे से पानी पीते हैं, बारी-बारी, बिना किसी झगड़े के। उल्लू यह बरसों से देख रहा था।
उसे यह भी मालूम था कि कौन कितनी बार आता है। सांभर रात में दो बार आता है और दूसरी बार बहुत देर से। गीदड़ आते ही नहीं, वे नाले से पीते हैं। और बत्तखें रात भर किनारे पर रहती हैं, क्योंकि उनके घोंसले वहीं हैं और अंडे वहीं रहते हैं।
उस बरस अगहन में बत्तखों के अंडे कम होने लगे।
पहले एक, फिर तीन, फिर एक ही रात में पाँच। घोंसले टूटे नहीं मिलते थे। बस अंडे नहीं होते थे।
बत्तख के अंडे टूटे हुए मिलें तो बात साफ़ होती है। ग़ायब अंडे की कोई बात साफ़ नहीं होती। बत्तखें पहले यह सोचती हैं कि शायद गिनती में भूल हुई, फिर यह कि शायद पानी में लुढ़क गया, और तीसरी बार जाकर वे मानती हैं कि कोई ले जा रहा है।
दिन वाले जानवरों ने तय कर लिया कि यह बाहर का काम है। बरसात के बाद नदी की तरफ़ से एक नेवला आया था और वह अब भी उधर था। बात यहीं रुक गई और सब इस पर सहमत हो गए।
यह तय करने में उन्हें आधा दिन लगा और उसमें किसी ने कुछ देखा नहीं था। सबूत यह था कि नेवला नया था। जंगल में नया होना अपने आप में एक सबूत माना जाता है, और इसका कोई तोड़ नहीं है।
उल्लू कुछ दिन चुप रहा। फिर एक सुबह उसने बत्तखों से कह दिया कि नेवला उस तरफ़ आता ही नहीं। वह नाले के उस पार रहता है और रात में भी वहीं रहता है।
बत्तखों ने पूछा कि फिर कौन। उल्लू चुप रहा। फिर उसने बता दिया।
उल्लू ने नाम बता दिया। वह उन्हीं में से एक थी, एक बूढ़ी बत्तख, जिसके अपने अंडे उस बरस नहीं ठहरे थे।
उल्लू ने उसे तीन रातें देखा था। वह किसी और के घोंसले तक चलकर नहीं जाती थी। वह तैरती हुई जाती थी, किनारे के साथ-साथ, और घोंसले के पास पहुँचकर पानी में ही रुकी रहती थी, बहुत देर। जो चीज़ उल्लू को सबसे साफ़ याद रही वह यह थी कि वह जल्दी में कभी नहीं थी।
किसी ने यक़ीन नहीं किया।
यक़ीन न करने के पीछे उल्लू पर शक नहीं था। दिक़्क़त यह थी कि मानने पर आगे क्या करना है, यह किसी को नहीं पता था। नेवले के साथ क्या करना है, यह साफ़ था। अपने में से किसी के साथ क्या करना है, यह साफ़ नहीं था।
दो हफ़्ते और अंडे जाते रहे।
फिर एक रात दो बत्तखें जागती रहीं और उन्होंने ख़ुद देख लिया।
दोनों ने अगली सुबह जो बताया वह वही था जो उल्लू दो हफ़्ते पहले बता चुका था, शब्द भी लगभग वही। इस बार सबने मान लिया। उल्लू ने इस पर कुछ नहीं जोड़ा, और उससे कोई यह कहने नहीं आया कि तुम सही थे।
इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ। बूढ़ी बत्तख से कोई कुछ नहीं बोला। वह उसी किनारे पर रही और अगली बरसात में मर गई, और तब तक अंडे जाते रहे, कम होकर, पर जाते रहे।
जो चीज़ बदली वह दूसरी थी। उस दिन के बाद जंगल ने उल्लू से रोज़ पूछना शुरू कर दिया।
हर सुबह कोई न कोई नीचे से आवाज़ देता कि रात में क्या हुआ। पहले यह हफ़्ते में एक बार होता था, फिर रोज़, और फिर यह उम्मीद बन गई।
उल्लू दिन में सोता है। सुबह उसका सोने का वक़्त होता है, ठीक वही वक़्त जब लोग नीचे से पूछने आते हैं।
इसका असर धीरे-धीरे दिखा। उल्लू का शिकार रात के आख़िरी पहर में होता है, और अच्छी नींद के बिना उस पहर में आँख टिकती नहीं। दो महीने में वह पतला हो गया। यह किसी ने नोट नहीं किया, क्योंकि उल्लू के पंख उसे मोटा दिखाते हैं।
पहले महीने उसने पूरा बताया। दूसरे महीने उसने छोटा कर दिया। तीसरे महीने उसके जवाब दो-तीन शब्दों के हो गए।
इसकी शिकायत किसी ने नहीं की, क्योंकि जवाब मिल तो रहा था।
एक बार, गर्मियों में, उसने नीचे से आती आवाज़ का जवाब ही नहीं दिया। उस दिन दोपहर तक पेड़ के नीचे चार जानवर खड़े रहे। शाम को एक बत्तख ऊपर तक आई और उसने पूछा कि तबीयत तो ठीक है। उल्लू ने कहा कि ठीक है। इसके बाद उसने जवाब देना बंद नहीं किया।
पिछले जाड़ों में एक सुबह उससे यही सवाल हुआ और उसने कहा कि कुछ नहीं हुआ।
उस रात कुछ हुआ था। नाले वाले किनारे पर एक साही मरी पड़ी मिली, तीसरे दिन।
उल्लू अब भी उसी डाल पर बैठता है और अब भी जवाब देता है। नीचे वाले अब पूछते हुए ऊपर नहीं देखते। वे पानी की तरफ़ मुँह किए हुए पूछ लेते हैं, चलते-चलते, क्योंकि जवाब आ ही जाता है।