मिंटी बंदर सबसे ऊँची डाल पर बैठता था, और इसकी वजह ऊँचाई नहीं थी। वहाँ से पूरा जंगल दिखता था। कौन कहाँ जा रहा है, किस रास्ते पर आज ज़्यादा आवाजाही है, और कौन सा जानवर कई दिनों से नहीं दिखा। मिंटी यह सब देखता रहता और कहता कुछ नहीं था। जंगल में उसे चतुर कहा जाता था, पर किसी ने यह नहीं सोचा कि चतुराई आती कहाँ से है। मिंटी ने भी कभी नहीं बताया। उसे लगता था कि अगर सबको पता चल गया कि वह सिर्फ़ ध्यान से देखता है, तो लोग ख़ुद देखने लगेंगे, और फिर उसके पास कुछ ख़ास नहीं बचेगा।

जंगल उससे सवाल पूछता था और वह जवाब देता था। सवाल हमेशा एक ही किस्म के होते थे। फलाँ कहाँ गया। उधर वाला रास्ता खुला है या नहीं। कल शाम पानी पर भीड़ थी क्या। इन सब का जवाब मिंटी के पास होता था, और सही होता था।

एक बार लोमड़ी के दोनों बच्चे शाम तक नहीं लौटे। सब नाले की तरफ़ ढूँढ़ने चले थे। मिंटी ने कहा कि नाले की तरफ़ नहीं, पीछे वाली मेड़ पर देखो। वहीं मिले। उसने सुबह उन्हें उधर जाते देखा था और लौटते नहीं देखा था। बस इतनी सी बात थी।

पर उसने यह कभी नहीं कहा कि बस इतनी सी बात थी।

उस बरस बरसात के बाद हिरनों ने शाम वाली खुली जगह पर आना बंद कर दिया।

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वह जगह जंगल के बीच में है, गोल, और उस पर घास ही घास है। हिरन वहाँ शाम को आते हैं क्योंकि खुले में उन्हें दूर तक दिखता है, और दिखना उनके लिए सबसे बड़ी सुरक्षा है। तीन-चार शामें ख़ाली गईं तो बात फैल गई।

सबका एक ही ख़याल था। वहाँ कोई बैठा है।

पूछने वे मिंटी के पास आए। मिंटी ने वही किया जो वह करता है। उसने तीन शामें उस जगह के ऊपर वाली डाल पर बिताईं और नीचे देखता रहा।

तीन शाम में उसने जो देखा वह यह था कि वहाँ कोई नहीं था। न बाघ। न तेंदुआ। न कुत्ता। घास में कहीं दबाव का निशान नहीं था, कोई चीज़ हिली नहीं, और पक्षी उस जगह पर उसी तरह उतरते रहे जिस तरह ख़ाली ज़मीन पर उतरते हैं।

उसने साफ़ कह दिया कि वहाँ कोई शिकारी नहीं है।

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यह बात सही थी। इसी बात पर हिरन लौट आए।

चौथे दिन एक हिरनी लड़खड़ाकर गिरी और उठ नहीं पाई। उसके मुँह से झाग आ रहा था। उसी शाम एक और की हालत ख़राब हुई, हालाँकि वह बच गई।

हिरन उस शाम वहाँ इसलिए थे कि मिंटी ने कह दिया था कि वहाँ कुछ नहीं है। यह बात किसी ने ज़ोर से नहीं कही। ज़ोर से कहने की ज़रूरत भी नहीं थी।

इसके बाद जो हुआ वह चीख़-पुकार नहीं थी। किसी ने मिंटी से झगड़ा नहीं किया। बस अगले हफ़्ते जब सांभर का बच्चा गुम हुआ तो कोई उससे पूछने नहीं आया, और यह उसे तीसरे दिन जाकर मालूम हुआ।

वह ऊपर बैठा रहा और उस खुली जगह को देखता रहा। दिन में देखा, शाम को देखा, सुबह देखा। हर बार वही दिखा। गोल जगह, घास, हरा।

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उन दिनों में उसने एक काम और किया। उसने अपनी डाल बदली और दूसरी तरफ़ वाले पेड़ पर जाकर बैठा, यह सोचकर कि शायद कोण से कुछ फ़र्क़ पड़े। कोण से फ़र्क़ नहीं पड़ा। जो चीज़ ऊपर से नहीं दिखती, वह किसी भी ऊपर से नहीं दिखती।

आठवें दिन वह नीचे उतरा।

नीचे उतरना उसके लिए मामूली बात नहीं थी। ज़मीन पर बंदर तेज़ नहीं होता और उसे यह मालूम था। वह किनारे-किनारे चला, फिर घास में घुसा, और घास उसके कंधे तक थी।

भीतर से वह जगह वैसी नहीं थी जैसी ऊपर से दिखती थी। घास एक तरह की नहीं थी। बीच-बीच में एक और चीज़ उगी हुई थी, पतली, चढ़ने वाली, जो घास के तनों से लिपटकर ऊपर आ रही थी। उसके पत्ते भी हरे थे। ऊपर से सब हरा ही दिखता है।

उसी घास में एक तीतर चल रहा था, दाना चुगता हुआ, और वह मिंटी को देखकर रुका नहीं।

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मिंटी ने उससे पूछा कि यह बेल कब से है। तीतर ने बिना सिर उठाए कहा कि बरसात से। पानी के साथ ऊपर से आई थी और यहीं जम गई। फिर उसने यह भी कहा कि इसे हम नहीं छूते।

मिंटी ने पूछा कि तुमने बताया क्यों नहीं। तीतर ने कहा कि पूछा किसी ने नहीं।

हिरन के लिए वह बेल दिखनी मुश्किल थी। हिरन ऊपर से मुँह डालकर चरता है और घास के साथ जो आ जाए वह भी खा लेता है। तीतर नीचे चलता है और एक-एक दाना देखकर उठाता है। दोनों उसी जगह पर थे, और दोनों ने अलग चीज़ें देखीं।

आगे की बात छोटी है। जानवरों ने वह हिस्सा दो मौसम के लिए छोड़ दिया और उधर से आना-जाना बंद कर दिया, जिससे बेल फैलती रही और फिर सूखे में अपने आप ख़त्म हो गई। इसमें किसी की चतुराई काम नहीं आई।

मिंटी आज भी सबसे ऊँची डाल पर बैठता है, क्योंकि वहाँ से पूरा जंगल दिखता है और यह बात अब भी सच है। शाम को उसे नीचे उस खुली जगह में तीतर चलता हुआ दिखता है। तीतर क्या देख रहा है, यह उसे ऊपर से आज तक नहीं दिखा।