चिंटी बंदर की एक आदत थी। जो चीज़ उसे समझ नहीं आती, उसके पीछे वह तब तक पड़ा रहता जब तक समझ न आ जाए। पिछले हफ़्ते उसने एक बात पकड़ी थी। जंगल के उत्तरी हिस्से में मधुमक्खियाँ हमेशा एक ही दिशा से लौटती थीं। इसका मतलब था कि उधर कहीं कुछ है। चिंटी ने तय कर लिया कि वह पता लगाकर रहेगा। बाकी बंदरों ने उसे रोका। उत्तर की तरफ़ जाना ठीक नहीं, उन्होंने कहा, वहाँ पहले भी कोई गया था और लौटा नहीं। चिंटी ने पूछा कि कौन गया था। किसी को नाम याद नहीं था। चिंटी को यही जवाब चाहिए था।
वह चौथे दिन निकला। तीन दिन उसने मधुमक्खियों को गिनने में लगाए, क्योंकि निकलने से पहले उसे यह तय कर लेना था कि दिशा सचमुच एक ही है या उसे ऐसा लग रहा है।
दिशा एक ही थी। सुबह वे उत्तर की तरफ़ जाती थीं और दोपहर बाद उसी तरफ़ से लौटती थीं, और लौटते वक़्त वे नीची उड़ती थीं और सीधी उड़ती थीं, जैसे कोई भरा हुआ घड़ा लेकर चल रहा हो।
उत्तर की तरफ़ जंगल बदल जाता है। पेड़ छोटे होते जाते हैं और ज़मीन पथरीली होने लगती है। दो कोस बाद एक ढलान आती है और उसके ऊपर एक चट्टान खड़ी है, जिसका मुँह पूरब को है और जिस पर सुबह की धूप सबसे पहले पड़ती है।
उस चट्टान पर छत्ते लटके थे। चिंटी ने गिने। सात।
वे पेड़ वाले छत्ते नहीं थे। ये बड़े थे, आदमी के क़द से भी लंबे, और चट्टान के पेट के नीचे चिपके हुए, जहाँ न बारिश पहुँचती है न कोई चढ़ सकता है। इन्हीं मधुमक्खियों को गाँव में भँवर कहते हैं और इनके बारे में एक ही बात कही जाती है, कि इनसे बचकर रहो।
चिंटी वहीं बैठकर कुछ देर सोचता रहा। जिस बंदर के बारे में कोई नाम याद नहीं था, वह शायद यहीं तक आया होगा। ऊपर चढ़ा होगा। यह कोई कहानी नहीं थी। यह इस चट्टान का सीधा हिसाब था, और जंगल ने उसे कहानी में बदल दिया था, क्योंकि हिसाब याद रखने से डर कम हो जाता है और कहानी से बढ़ जाता है।
चिंटी को अब अपने सवाल का आधा जवाब मिल चुका था। छत्ते उधर हैं, इसलिए मधुमक्खियाँ उधर से आती हैं।
पर आधा जवाब उसे कभी काफ़ी नहीं लगता था। छत्ते तो सुबह से शाम तक वहीं रहते हैं। मधुमक्खियाँ सुबह उत्तर जाती क्यों हैं?
वह यह देखने बैठ गया।
तीसरी सुबह उसे दिखा। मधुमक्खियाँ चट्टान से निकलकर आगे नहीं जाती थीं। वे मुड़कर पश्चिम वाली ढलान पर उतरती थीं, जहाँ महुए के आठ-दस पेड़ खड़े थे और उन पर फूल आया हुआ था। सारी उड़ान उन्हीं फूलों तक की थी।
यानी दिशा फूलों की थी, छत्तों की नहीं। और फूल हर बरस उसी वक़्त आते हैं और डेढ़ महीने में झड़ जाते हैं।
चिंटी को इस बात से जितनी ख़ुशी हुई, उतनी शहद से नहीं हुई होती। उसका सवाल ख़त्म हो गया था।
शहद की बात अलग से हुई, और वह ऐसे हुई कि उसमें उसकी कोई चतुराई नहीं थी।
वह चट्टान पर चढ़ने की सोच भी नहीं सकता था। भँवर मधुमक्खी का छत्ता हिल जाए तो पूरा छत्ता उठता है और वह किसी एक जगह नहीं काटता, वह पीछा करता है। जंगल में इससे मरने वाले जानवरों के क़िस्से चलते हैं और वे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहे जाते।
उन्हीं दिनों एक रात आँधी आई।
सुबह चिंटी ऊपर गया तो चट्टान के नीचे, पत्थरों के बीच, छत्ते का एक टूटा हुआ टुकड़ा पड़ा था। सबसे नीचे वाला किनारा, जो हवा में झूल रहा था, टूटकर गिर गया था। उसमें शहद था।
मधुमक्खियाँ ऊपर थीं। वे टूटे टुकड़े के पीछे नहीं आतीं। उनका काम ऊपर वाले हिस्से को बचाना होता है और गिरी हुई चीज़ उनके लिए ख़त्म हो चुकी होती है।
चिंटी ने वह टुकड़ा उठाया और नीचे की तरफ़ चल दिया।
यह बात उसे बाद में समझ आई कि टुकड़ा वहाँ पहले भी गिरता रहा होगा। आँधी हर बरस आती है। बात सिर्फ़ इतनी थी कि उस चट्टान पर जो भी जाता, वह ऊपर देखता था।
उसने वापस आकर बाक़ी बंदरों को सब बता दिया। छत्ते, महुआ, ढलान, आँधी, टूटा टुकड़ा। उसने कुछ छिपाया नहीं।
बंदरों ने उसमें से एक ही चीज़ सुनी।
अगले बरस जेठ में वे सब उत्तर गए। दस-बारह बंदर एक साथ। उन्होंने महुए के फूल नहीं देखे और मधुमक्खियों की उड़ान भी नहीं देखी। वे सीधे चट्टान के नीचे जाकर बैठ गए और आँधी का इंतज़ार करने लगे।
आँधी उस बरस देर से आई और जब आई तब भी छत्ता नहीं टूटा। कुछ नहीं मिला। लौटकर उन्होंने कहा कि पिछले बरस चिंटी की क़िस्मत अच्छी थी।
चिंटी उस बरस उनके साथ नहीं गया।
उसका सवाल पिछले बरस ख़त्म हो चुका था और शहद उसके लिए कभी सवाल था ही नहीं। जिस चीज़ का जवाब मिल जाए, उस पर बैठे रहने में उसे कोई मज़ा नहीं आता था।
उन दिनों वह एक दूसरी चीज़ के पीछे पड़ा हुआ था। बरगद के नीचे चींटियों की एक क़तार थी, जो हर रोज़ शाम को उसी दरार से निकलती थी और सुबह तक ग़ायब हो जाती थी। वह यह जानना चाहता था कि वे रात में कहाँ जाती हैं।
बाक़ी बंदरों ने उसे देखा और आपस में कहा कि चिंटी का दिमाग़ अब सही नहीं है। पिछली बार भी उन्होंने यही कहा था। पिछली बार वे उसके पीछे-पीछे उत्तर तक चले गए थे।