बंदर पेड़ पर रहता था और कछुआ तालाब के किनारे। दोनों की दोस्ती की सबसे बड़ी दिक़्क़त यही थी। बंदर एक डाल से दूसरी डाल तक उतनी देर में पहुँच जाता, जितनी देर में कछुआ मुड़ भी नहीं पाता। फिर भी दोनों रोज़ मिलते थे। बंदर नीचे उतर आता, कछुए के पास बैठ जाता, और घंटों बातें होती रहतीं। बंदर ऊपर की बातें बताता, कि आज किस पेड़ पर कौन सा फल पका है। कछुआ नीचे की बातें बताता, कि पानी किस तरफ़ से गंदला आ रहा है। दोनों को दूसरे की दुनिया की ख़बर इसी तरह मिलती थी।
यह कोई छोटी बात नहीं थी। कछुए ने आज तक कोई पेड़ नहीं देखा था, ऊपर से। बंदर ने आज तक तालाब का तला नहीं देखा था। जंगल में ज़्यादातर जानवर सिर्फ़ अपनी ऊँचाई वाली दुनिया जानते हैं, और उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि वे कितना कम जानते हैं।
इस बातचीत का एक तरीक़ा बन चुका था। बंदर पहले बोलता, कछुआ बाद में। बंदर डाल पर बैठकर बोलता और कछुआ नीचे से सुनता, और दोनों को यह ठीक लगता था।
इसमें बंदर की कोई अकड़ नहीं थी। नीचे उतरने में वक़्त लगता है और ऊपर से बोलना आसान है। कछुए ने इस पर कभी एतराज़ नहीं किया, क्योंकि उसे भी यह कोई बात नहीं लगती थी।
दोनों बताते बहुत थे। पूछता कोई नहीं था। एक बार भी नहीं।
यह फ़र्क़ छोटा लगता है और है नहीं। बताने वाला वही बताता है जो उसे ज़रूरी लगे। पूछने वाला वह निकलवाता है जो उसे चाहिए। दोनों दोस्त बरसों से सिर्फ़ पहला काम कर रहे थे।
उस बरस जेठ में कछुए ने कहा कि पानी उत्तर वाले कोने से गंदला आ रहा है। उसने यह तीन बार कहा, तीन अलग दिनों में, क्योंकि उसे यह अजीब लगा था। जेठ में पानी गिरता है, चढ़ता नहीं, और गंदला होने की कोई वजह नहीं होती।
कछुए के लिए यह मामूली बात नहीं थी। वह पानी में रहता है और पानी का बदलना उसे उसी तरह लगता है जैसे किसी को अपने घर में गंध का बदलना लगे। उसने तीनों बार यह इसी लहजे में कहा, बिना घबराए, पर दोहराकर।
बंदर ने हर बार सुना और हर बार अपनी बात कह दी। उस हफ़्ते उसने बताया कि जामुन पक गए हैं और ऊपर वाली मेड़ पर मधुमक्खियों ने छत्ता बना लिया है।
यह दोनों बातें काम की थीं। जामुन की ख़बर से कछुए को पता चल जाता कि किन दिनों में गिरे हुए फल किनारे तक आएँगे। मधुमक्खियों की ख़बर से यह कि उधर जाना नहीं है। बंदर ग़लत नहीं बोल रहा था। वह बस अपनी बात बोल रहा था।
बंदर ने यह नहीं पूछा कि उत्तर वाला कोना कहाँ पड़ता है।
अगर पूछता तो कछुआ बता देता। और अगर वह जान लेता कि उत्तर वाला कोना उसी ढलान के नीचे है जिस पर वह रोज़ चढ़ता है, तो शायद वह ऊपर जाकर देख लेता।
ऊपर एक हिरन मरा पड़ा था, दो हफ़्ते से, ढलान के बीच वाले गड्ढे में। बारिश नहीं हो रही थी, इसलिए वह बहा नहीं। पर नीचे की तरफ़ पानी का रिसाव होता रहता है और वह उत्तर वाले कोने से तालाब में आ रहा था।
वह गड्ढा रास्ते से हटकर है और उसमें झाँकने की किसी को ज़रूरत नहीं पड़ती। बंदर उस ढलान पर रोज़ चढ़ता था। गड्ढे से दस क़दम दूर से।
तालाब में उस महीने मछलियाँ मरीं। बहुत नहीं, पर मरीं। और दो कछुए के बच्चे भी।
कछुए के बच्चे पानी के किनारे रहते हैं, जहाँ पानी उथला और गरम होता है, और वही हिस्सा सबसे पहले ख़राब हुआ। बड़े कछुए गहरे में थे और उन्हें कुछ नहीं हुआ। यह बात भी उसने बंदर को नहीं बताई।
कछुआ इस पर बहुत दिन चुप रहा। बंदर को उसने नहीं बुलाया।
बंदर को यह बात एक महीने बाद पता चली, तब जब वह ख़ुद ऊपर से आते हुए उस गड्ढे के पास से गुज़रा और उसे गंध आई।
वह उसी दिन नीचे उतरा और उसने कछुए से पूछा कि उसने जो बताया था वह किस कोने की बात थी।
यह उसका पहला सवाल था। बरसों में पहला। और वह भी उसने तब पूछा जब जवाब का कोई फ़ायदा नहीं बचा था।
कछुए ने बता दिया। फिर दोनों चुप रहे। बहुत देर तक।
इसके बाद उन्होंने एक-दूसरे से लड़ाई नहीं की। लड़ाई की कोई वजह भी नहीं थी। कछुए ने बताया था और बंदर ने सुना था। दोनों ने अपना-अपना काम किया था।
जो नहीं हुआ था वह यह था कि किसी ने दूसरे से एक सवाल नहीं किया था।
बताना आसान है। बताने में सामने वाले पर कोई ज़िम्मा नहीं आता और अपने ऊपर भी नहीं। सवाल पूछने का मतलब है कि जवाब का कुछ करना पड़ेगा। इसीलिए बताया बहुत जाता है और पूछा कम।
वे अब भी रोज़ मिलते हैं और अब भी घंटों बातें होती हैं। दो चीज़ें बदली हैं।
पहली यह कि जो पहले बोल चुका हो, वह आख़िर में एक सवाल पूछता है। कोई भी सवाल। ज़्यादातर बार उसका कोई काम नहीं निकलता। कभी-कभी निकल आता है।
दूसरी यह कि बंदर अब डाल पर बैठकर नहीं बोलता। वह पहले नीचे उतरता है। उतरने में वक़्त लगता है। उतने वक़्त में उसे हर बार यह याद आ जाता है कि नीचे कोई बैठा है।