जंगल में सबसे पहले उठने वाले पक्षी थे, और सबसे बाद में उठने वाला चिंटू ख़रगोश। जब बाकी सब दाना-पानी ढूँढ़कर लौट आते, तब चिंटू अपनी बिल से बाहर निकलता, अँगड़ाई लेता, और सबसे पूछता कि आज कुछ ख़ास हुआ क्या। उसे यह पूछना अच्छा लगता था। करना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। जंगल के बाकी जानवरों ने उससे उम्मीद करना कब का छोड़ दिया था, और चिंटू को इससे कोई तकलीफ़ नहीं थी। उसका मानना था कि जो काम टाला जा सकता है, उसे टालना ही समझदारी है।
उस बरस पानी जल्दी उतर गया। जेठ आते-आते नाले में सिर्फ़ गीली रेत बची और तालाब का किनारा दो हाथ पीछे हट गया। ऐसा हर साल थोड़ा-बहुत होता है। उस साल ज़्यादा हुआ।
दंतीराम ने कहा कि वह दूसरी तरफ़ जाकर देख आएगा। उसने भाषण नहीं दिया। उसने बस इतना कहा कि जो साथ चलना चाहे चल ले, क्योंकि रास्ता किसी न किसी को याद रखना पड़ेगा।
चिंटू पास ही बैठा था। उसने अँगड़ाई ली और कहा, "दंतीराम भाई, तुम हो आओ। तुम्हारे पैर लंबे हैं, मेरे छोटे। और वैसे भी, पानी तुम्हें मिलेगा तो जंगल को मिलेगा, और जंगल में मैं भी तो हूँ।" कुछ जानवर हँस पड़े। दंतीराम नहीं हँसा। उसने इतना ही पूछा, "रास्ता कौन देखेगा, चिंटू?" चिंटू ने यह बात सुनी और उसी वक़्त भूल भी गया। वह अपनी बिल में लौट गया।
दंतीराम अकेला गया। लौटने में उसे दो दिन लगे। लौटकर उसने बताया कि उत्तर की तरफ़, जहाँ ज़मीन ढलती है, एक झील है और उसमें अभी पानी है। रास्ता सीधा नहीं था, इसलिए उसने उसे दो बार चलकर पक्का किया था।
चिंटू सबके साथ झील तक गया। रास्ता उसने नहीं देखा, क्योंकि देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। आगे-आगे दंतीराम था, बीच में हिरन, और सबसे पीछे चिंटू, जो चलते-चलते आधा सो रहा था। झील पर उसने जी भर पानी पिया और वापसी में भी किसी के पीछे-पीछे लौट आया। उस रात उसे लगा कि उसका तरीक़ा ठीक है। जो काम कोई और कर देता है, उसे ख़ुद क्यों करना।
अगले कुछ हफ़्ते ऐसे ही बीते। जानवर रोज़ भोर में झील की तरफ़ निकलते और दोपहर से पहले लौट आते। रास्ता अब पिटा हुआ था, पर सीधा नहीं था। बीच में एक जगह वह दो हिस्सों में बँट जाता था, और बायाँ वाला एक सूखे नाले पर जाकर ख़त्म हो जाता था। यह बात जंगल में सब जानते थे। चिंटू नहीं जानता था, क्योंकि वह हमेशा किसी के पीछे चलता था।
रोज़ की उस चाल में चिंटू का काम सिर्फ़ इतना था कि आगे वाले से पाँच क़दम की दूरी बनाए रखे। वह ज़मीन नहीं देखता था। वह हिरन की पूँछ देखता था, जो चलते हुए हल्की-हल्की हिलती रहती है, और उसे देखते रहने से चलना अपने आप हो जाता था। कई बार वह पूरा रास्ता इसी तरह तय कर लेता और झील पहुँचकर उसे यह भी याद नहीं रहता कि बीच में कोई मोड़ आया था।
फिर एक रात आँधी आई। पेड़ गिरने लगे और उत्तरी हिस्से में एक सूखे पेड़ पर बिजली गिरी और वह जल उठा। जानवर अँधेरे में ही निकल पड़े, झील की तरफ़, क्योंकि आग वहाँ तक नहीं पहुँच सकती थी। किसी ने चिंटू को नहीं जगाया। जगाता भी कौन। सब भाग रहे थे, और चिंटू की बिल रास्ते में पड़ती भी नहीं थी।
आँधी में आग की एक ख़ूबी होती है, कि वह सीधी नहीं चलती। वह छलाँग लगाती है। उत्तरी हिस्से से निकलकर वह बीच वाले सूखे बाँस के झुंड तक कैसे पहुँची, यह किसी ने नहीं देखा। जब तक धुआँ नीचे बैठा, तब तक जानवर आधा रास्ता तय कर चुके थे।
चिंटू की नींद धुएँ से खुली। बाहर निकला तो जंगल ख़ाली था। उसने पुकारा और जवाब में सिर्फ़ आँधी की आवाज़ आई। इतना उसे पता था कि सब झील गए होंगे। रास्ता उसे नहीं पता था। वह पिटे हुए रास्ते पर दौड़ा, अँधेरे में, और उस जगह पहुँचकर रुक गया जहाँ रास्ता दो हिस्सों में बँटता था। दोनों बिलकुल एक जैसे दिख रहे थे।
उसने याद करने की कोशिश की। वह इस मोड़ से हफ़्तों गुज़रा था, रोज़, दोनों वक़्त। उसे याद आया कि यहाँ एक टूटा हुआ ठूँठ है। ठूँठ दिख भी गया। पर यह याद नहीं आया कि उस दिन ठूँठ दाएँ था या बाएँ, क्योंकि उस दिन वह ठूँठ नहीं देख रहा था। वह आगे वाले हिरन की पूँछ देख रहा था, और पूँछ अब वहाँ नहीं थी।
उसने बायाँ चुना। बायाँ सूखे नाले पर ख़त्म होता था। वहाँ से लौटकर उसने दायाँ पकड़ा और झील तक पहुँचते-पहुँचते सुबह हो गई। तब तक सारा जंगल पानी पी चुका था और किनारे की मिट्टी सैकड़ों पैरों से घुलकर पानी में मिल गई थी। चिंटू ने वही गँदला पानी पिया। किसी ने ताना नहीं मारा। दंतीराम ने भी नहीं, जो पास ही खड़ा था और जिसने उसे दूर से आते हुए देख लिया था। उस दिन के बाद चिंटू जंगल में सबसे पहले उठने वालों में गिना जाने लगा। वजह उसने कभी नहीं बताई। पूछने की किसी को सूझी भी नहीं।
सूखे नाले तक पहुँचकर भी उसे यह नहीं लगा कि वह ग़लत आया है। पता तब चला जब आगे रास्ता ही नहीं बचा, सिर्फ़ पत्थर थे और उनके बीच सूखी रेत। उसने वहाँ खड़े होकर आवाज़ दी। जवाब में कुछ नहीं आया। और अब उसे यह भी नहीं पता था कि झील किस तरफ़ है।