जंगल के बीचोंबीच जो तालाब था, उसी के सहारे सब जीते थे। गर्मियाँ आते ही हर पक्षी अपने हिस्से का काम सँभाल लेता; कोई पानी की ख़बर लाता, कोई घोंसले ऊँचे करता, कोई दाना जमा करता। सिर्फ़ एक था जो कुछ नहीं करता। करिया कव्वा हर सुबह सबसे ऊँची डाल पर बैठकर यह सब देखता रहता, और शाम को कहता कि आज तो बहुत थक गया।
यह बात इतनी पुरानी हो चुकी थी कि अब इसमें कोई मज़ा भी नहीं रह गया था। कोई उसे टोकता भी नहीं था। जंगल में कुछ बातें तय हो जाती हैं और फिर उन पर बहस नहीं होती।
असल में हुआ यह था कि करिया उस तालाब पर बाद में आया।
कौवे एक जगह टिककर नहीं रहते। वे जहाँ खाना मिले वहाँ चले जाते हैं और मौसम बदलने पर जगह बदल लेते हैं। करिया चार बरस पहले उधर आया था, एक जाड़े में, और फिर वहीं रह गया।
काम का बँटवारा उससे बहुत पहले का था। सरला ने वह बँटवारा किया था और वह ठीक ही किया था। हर पक्षी का एक काम था और हर काम पर एक पक्षी था। जब करिया आया तो न कोई काम ख़ाली था और न किसी ने यह सोचा कि एक और आदमी के लिए कुछ निकाला जाए।
पहले बरस उसने दो-तीन बार पूछा। हर बार उसे यह जवाब मिला कि सब सँभला हुआ है।
यह जवाब झूठा नहीं था। सब सचमुच सँभला हुआ था। दाना जमा करने वाले चार थे और उतने ही चाहिए थे। पानी की ख़बर लाने वाली मैना थी और वह अच्छी थी। घोंसले ऊँचे करने का काम तोतों के पास था और वे उसे बरसों से कर रहे थे। किसी काम में एक और हाथ की ज़रूरत नहीं थी, और जहाँ ज़रूरत न हो वहाँ आदमी घुसाया नहीं जाता।
दूसरे बरस उसने पूछना छोड़ दिया।
तीसरे बरस उसने वह बात कहनी शुरू की। आज तो बहुत थक गया।
यह कहना आसान था। यह कहने से कोई आगे नहीं पूछता। अगर वह कहता कि मुझे कोई काम नहीं दिया गया, तो बात लंबी होती और उसमें किसी को दोष देना पड़ता, और वह उस जंगल में नया था।
चौथे बरस तक यह मज़ाक़ बन गया। पाँचवें तक स्वभाव।
उस गर्मी में पानी उतरा और इस बार जल्दी उतरा।
सरला ने वही किया जो वह हमेशा करती थी। उसने सबको इकट्ठा किया और काम बाँटे। मिट्टी हटाने वाले, दाना जमा करने वाले, घोंसले ऊँचे करने वाले। सब अपने-अपने काम पर लग गए और दस दिन तक लगे रहे।
दस दिन बाद तालाब और नीचे था। पहले से हाथ भर नीचे।
तब जो सवाल उठा, उसका जवाब किसी के पास नहीं था। सवाल यह था कि पानी और कहाँ है।
यह किसी का काम नहीं था। किसी को यह काम दिया ही नहीं गया था, क्योंकि यह काम है ही नहीं। इसमें कुछ बनता नहीं, कुछ जमा नहीं होता, और लौटकर हो सकता है कि आप ख़ाली हाथ आएँ।
बाँटने के लिए वही चीज़ें होती हैं जिनका कोई नतीजा गिना जा सके।
करिया दूसरे दिन भोर में उड़ा। किसी ने नहीं देखा।
उसने किसी से कहा नहीं और इसकी वजह यह नहीं थी कि वह नाराज़ था। बात सिर्फ़ इतनी थी कि उसे ख़ुद भरोसा नहीं था कि कुछ मिलेगा।
वह दिन भर उड़ता रहा। कौवा ऊँचा उड़ता है और उसे रास्ता याद रहता है, और यह कोई हुनर नहीं है, यह उसकी बनावट है। इसके अलावा एक बात और है। कौवे को कोई नहीं मारता। उसका माँस कोई नहीं खाता। इसलिए वह वहाँ भी उतर सकता है जहाँ बाक़ी पक्षी नहीं उतरते।
उसने पहले दक्षिण देखा, क्योंकि उधर ढलान है और पानी ढलान की तरफ़ जाता है। उधर कुछ नहीं मिला। फिर उसने पश्चिम वाला हिस्सा देखा, जहाँ पिछले बरस बारिश ज़्यादा हुई थी। वहाँ भी नहीं। दोपहर में वह एक बार बैठा और उसे लगा कि लौट जाना चाहिए।
शाम को वह लौटा। उसने कुछ नहीं बताया, क्योंकि पहले दिन उसे कुछ नहीं मिला था।
तीसरे दिन उसने पूरब की तरफ़ का नाला देखा।
नाला ऊपर से सूखा दिखता है। रेत है और उस पर धूप है। करिया नीचे उतरा और उसने रेत में वहाँ चोंच मारी जहाँ रेत का रंग गहरा था, और गीली रेत निकली, और थोड़ा और खोदने पर पानी निकल आया।
यह उसने चार जगह जाँचा। चारों जगह वही निकला।
वह उसी शाम लौटा। उसने सरला को बताया।
अगले दिन पूरा झुंड उधर गया। पानी उस बरस उसी नाले से चला। पूरी गर्मी।
किसी ने उससे यह नहीं पूछा कि उसने यह कैसे सोचा, और यह अच्छा भी था, क्योंकि उसने सोचा नहीं था। वह बस उड़ा था। उड़ना उसे आता था और उड़ने का कोई काम उस सूची में नहीं था।
सूची में वे काम होते हैं जिन्हें बाँटा जा सके। जो चीज़ किसी के पास पहले से हो, उसके लिए सूची में जगह नहीं बनती, और वह चीज़ तब तक किसी के काम नहीं आती जब तक कोई मुसीबत न आए।
अगली गर्मी आई तो तालाब फिर उतरने लगा। इस बार सबसे पहले ख़बर लेकर आने वाला करिया ही था। वह भोर में ही उड़ा, तीनों तरफ़ का पानी देखा, और लौटकर सबको बताया कि पूरब वाले नाले में अभी धार बाकी है। किसी ने उसे शाबाशी नहीं दी। करिया ने उम्मीद भी नहीं की। वह चुपचाप बाकी पक्षियों के साथ दाना ढोने लगा, और शाम तक किसी ने यह नहीं कहा कि आज वह थक गया होगा। सबसे बड़ा बदलाव यही था।