एक समय की बात है, एक घना जंगल था, जहाँ तरह-तरह के पक्षी और जानवर रहते थे। उस जंगल में एक आलसी कव्वा भी रहता था। वह दिनभर इधर-उधर उड़ते रहते हुए बस आराम करता और कभी किसी काम में हाथ नहीं डालता। वह किसी भी काम को न तो पूरी मेहनत से करता था और न ही उसे सही समय पर पूरा करता था।

जंगल के बाकी पक्षी और जानवर अपनी-अपनी मेहनत में लगे रहते थे। एक दिन, जंगल में एक बड़ी समस्या उत्पन्न हुई। जंगल के तालाब का पानी सूखने लगा था और सभी जानवरों और पक्षियों के लिए पानी की कमी हो रही थी। बाकी पक्षियों ने सोचा कि अगर तालाब में पानी नहीं रहेगा, तो वे सब कहाँ से पानी पियेंगे।

तब जंगल के सबसे बुद्धिमान और जिम्मेदार पक्षी, बुलबुल ने सबको एकजुट किया और एक योजना बनाई। उसने कहा, "हमें तालाब के पास एक नया जलाशय बनाना चाहिए, जिससे हमें हमेशा पानी मिलता रहे।" सभी पक्षी और जानवरों ने इस योजना को स्वीकार किया, और काम शुरू कर दिया।

बुलबुल ने सभी को अपने-अपने काम में लगा दिया। कुछ पक्षी मिट्टी खोदने लगे, कुछ पानी लाने के लिए दौड़ने लगे, और कुछ जलाशय की दिशा में सहायता करने लगे। लेकिन आलसी कव्वा हमेशा आराम करता और कहता, "मुझे थकावट हो रही है, मैं कल से काम करूंगा।" वह काम में कोई मदद नहीं कर रहा था।

जैसे-जैसे काम बढ़ता गया, बाकी पक्षियों ने अपना काम पूरी लगन से किया, लेकिन कव्वा एक भी बार हाथ नहीं बटाया। उसने सोचा, "मैं हमेशा की तरह आराम करूंगा, यह सब काम दूसरों को करना है।" समय बीतता गया, और एक दिन जलाशय का निर्माण पूरा हुआ। सभी पक्षी और जानवर खुशी से झूम उठे क्योंकि अब उनके पास पानी था, लेकिन कव्वा तब भी काम से दूर था।

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एक दिन, अचानक जंगल में एक बड़ा सूखा आ गया। तालाब और जलाशय का पानी धीरे-धीरे सूखने लगा। सभी जानवरों और पक्षियों को पानी की बहुत सख्त जरूरत थी। सभी परेशान थे, लेकिन आलसी कव्वा को कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। वह आराम से अपनी जगह पर बैठा रहा और कहता रहा, "मैंने तो कभी काम किया नहीं, अब दूसरों की तरह परेशान क्यों होऊं?"

जैसे ही जलाशय का पानी सूखने लगा, बाकी पक्षी और जानवर इकट्ठे हुए और उन्होंने मिलकर जलाशय से कुछ पानी इकट्ठा करने की कोशिश की। कुछ समय बाद, जब वे पानी लाने में सफल हो गए, तो उन्हे एहसास हुआ कि यदि कव्वा भी पहले मदद करता, तो जलाशय अधिक पानी से भरा होता और अब इस कठिन समय में सभी को और आसानी से पानी मिल सकता था।

इस स्थिति को देखकर कव्वा को बहुत पछतावा हुआ। उसने सोचा, "अगर मैंने पहले मेहनत की होती, तो आज मुझे यह सब नहीं देखना पड़ता। मैंने अपनी आलसी आदतों से न सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया, बल्कि दूसरों का भी समय और मेहनत बर्बाद किया।"

अब कव्वा ने ठान लिया कि वह भविष्य में मेहनत से काम करेगा। उसने सबको बताया कि "मैंने अपनी गलती समझी है, और अब मैं किसी भी काम को टालने का प्रयास नहीं करूंगा। मैं पूरी मेहनत से काम करूंगा, ताकि किसी को भी किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े।"

बाकी पक्षियों और जानवरों ने उसे माफ कर दिया और कहा, "यह बात समझना कि मेहनत का महत्व क्या है, यह सबसे बड़ी सीख है। अब तुम्हारे साथ हम और भी बेहतर तरीके से काम करेंगे।"

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इस प्रकार आलसी कव्वा ने अपनी गलती से बहुत कुछ सीखा और बाकी सभी जानवरों को भी यह सिखाया कि मेहनत और कड़ी मेहनत से ही जीवन में सफलता मिलती है, आलस्य से कुछ भी हासिल नहीं होता।

इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि आलस्य से दूर रहकर मेहनत और दृढ़ निश्चय से ही जीवन की कठिनाइयों को पार किया जा सकता है। अगर हम समय पर काम करें, तो किसी भी समस्या का हल आसान हो जाता है। यह हिंदी पञ्चतंत्र की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि हर किसी को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और अपने कार्यों में सुधार लाना चाहिए।