वेदपाल के पिता की दुकान इतनी छोटी थी कि उसमें बैठने के लिए एक ही स्टूल आता था। माँ घर से सिलाई करती थीं, ज़्यादातर पेटीकोट और बच्चों के कपड़े, चौदह रुपये के हिसाब से। घर में तीन लोग कमाते थे और तीनों की कमाई मिलाकर भी वह रक़म नहीं बनती थी जिसे लोग तनख़्वाह कहते हैं।

इसीलिए भर्ती एक ही चीज़ थी जिसका मतलब समझ आता था। पुलिस की भर्ती में दो हिस्से होते हैं। पहला शरीर का, यानी दौड़, ऊँचाई, छाती और कूद। दूसरा लिखित। पहला निकल जाए तो दूसरा देने को मिलता है, और दोनों निकल जाएँ तो नौकरी पक्की है, और उसके बाद ज़िंदगी में तारीख़ें आनी बंद हो जाती हैं।

दौड़ वेदपाल की चीज़ थी। पहली बार उसने उन्नीस की उम्र में दी और चार मिनट सैंतीस सेकंड में पूरी की, जबकि चाहिए चार पचास थे। उस दिन मैदान से लौटते हुए उसे लगा कि बस, हो गया।

लिखित में वह उस बार बाईस नंबर से रह गया।

अगले साल फिर। दौड़ चार अड़तीस। लिखित में इस बार सत्रह नंबर से। तीसरी बार ग्यारह से। यह हर बार थोड़ा-सा रहता था, इतना कि हर बार यह लगता कि अगली बार हो जाएगा, और इसी ने सबसे ज़्यादा नुक़सान किया।

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लिखित में जो अटकता था वह गणित नहीं था। जोड़-घटाना वह ज़ुबानी कर लेता था, बाक़ी लड़कों से जल्दी। अटकता तर्कशक्ति वाला हिस्सा था, जिसमें आकृतियाँ और क्रम पूछे जाते हैं और जिसे हल करने का एक तरीक़ा होता है, और वह तरीक़ा किसी को बताना पड़ता है। उसके स्कूल में गणित और विज्ञान का पद चार साल ख़ाली रहा था। यह वजह वह किसी को नहीं बताता था, क्योंकि यह बहाने जैसी सुनाई देती है।

बीच के इन बरसों का हिसाब पिता की दुकान से जाता था। कोचिंग शहर में थी, अठारह किलोमीटर, और उसकी फ़ीस आठ सौ महीना थी। किताबें अलग। बस का ख़र्च अलग। माँ ने उन बरसों में सिलाई का काम बढ़ा दिया और रात में भी करने लगीं, और इसके लिए उनसे कहना नहीं पड़ा था।

कोचिंग एक हॉल में चलती थी जिसमें एक सौ बीस लड़के बैठते थे और पीछे वालों को बोर्ड दिखता नहीं था। वेदपाल आगे बैठने के लिए एक घंटा पहले पहुँचता था। पढ़ाने वाला ख़ुद तीन बार भर्ती दे चुका था और उसकी भी उम्र निकल चुकी थी। यह बात वह पहले दिन ही बता देता था, हँसकर, और लड़के हँस देते थे।

वेदपाल सुबह चार बजे उठता था। दस किलोमीटर, हर रोज़, जाड़ा हो या बरसात। यह उसने ग्यारह साल की उम्र में शुरू किया था और छब्बीस तक जारी रखा। इन पंद्रह बरसों में वह मुश्किल से बीस-पच्चीस दिन नहीं दौड़ा होगा, और उनमें भी ज़्यादातर बुख़ार वाले दिन थे।

भर्ती हर साल नहीं निकलती। कभी दो साल छोड़कर, कभी मुक़दमे की वजह से रुककर, और एक बार तो निकलकर रद्द हो गई। यह इंतज़ार तैयारी से ज़्यादा भारी पड़ता है, क्योंकि तैयारी में कम से कम कुछ करने को होता है।

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उसने कुल ग्यारह बार दौड़ दी और ग्यारहों बार निकाली। लिखित उसने आठ बार दी। सबसे क़रीब वह पाँचवीं बार पहुँचा, जब चार नंबर रह गए।

छब्बीस पर उम्र ख़त्म हो गई। ढाई साल की छूट के साथ अट्ठाईस तक चला, और अट्ठाईस के बाद कुछ नहीं बचा। आख़िरी बार उसे यह भी नहीं मालूम था कि वह आख़िरी है, क्योंकि उस साल छूट बढ़ने की बात चल रही थी और नहीं बढ़ी।

इसके बाद कुछ महीने ऐसे थे जिनके बारे में वह अब भी बात नहीं करता। उसने पिता की दुकान पर बैठना शुरू किया, उसी एक स्टूल पर, और दो महीने में उसे यह साफ़ हो गया कि उस दुकान में दो आदमियों के लायक़ काम नहीं है।

दौड़ना उसने फिर भी नहीं छोड़ा, क्योंकि चार बजे की आदत छोड़ने से भी वक़्त लगता है। मैदान पर उन दिनों पाँच-छह लड़के आने लगे थे जो अगली भर्ती की तैयारी कर रहे थे। वे उससे पूछने लगे। पहले साँस के बारे में, फिर जूतों के बारे में, फिर इस बारे में कि आख़िरी दो सौ मीटर में क्या करना चाहिए।

एक लड़के के पिता ने एक दिन उसे तीन सौ रुपये दिए और कहा कि लड़के को देख लिया करो। वेदपाल ने मना किया। दूसरे ने भी दिए। तीसरे के बाद उसने लेना शुरू कर दिया।

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अब उसके पास इकतीस लड़के हैं और महीने का नौ-दस हज़ार बन जाता है। यह तनख़्वाह नहीं है और इसमें कोई पेंशन नहीं है। पर यह उस दुकान से ज़्यादा है और घर में इस पर अब बहस नहीं होती। पिछले चार बरसों में उसके सात लड़के भर्ती हो चुके हैं, जिनमें से चार लिखित में उससे कम पढ़े थे।

मैदान के चारों तरफ़ की लकीर उसने ख़ुद नापी थी और चूने से डाली थी। वह ठीक उतनी ही है जितनी असली में होती है, क्योंकि वह असली वाली ग्यारह बार दौड़ चुका है और उसे मालूम है कि आख़िर के सौ मीटर में साँस कैसा लगना चाहिए। बरसात में चूना बह जाता है। हर साल भादों के बाद वह उसे दोबारा डालता है, अकेले, सुबह की दौड़ के बाद, और उसमें उसे दो दिन लगते हैं। नाप वह हर बार नए सिरे से करता है और पिछली लकीर पर भरोसा नहीं करता, क्योंकि लकीर दो फ़ुट छोटी पड़ जाए तो लड़का यहाँ तेज़ लगता है और असली मैदान में पिछड़ जाता है।