तलवे पहले गरम होते हैं, फिर सुन्न हो जाते हैं, और उसके बाद आदमी को यह याद नहीं रहता कि वह किसके ऊपर चल रहा है। धनेसर के पैरों में लकड़ी के तले बँधे थे और कंधे पर कोयले की टोकरी थी। नीचे राख थी, राख के नीचे ईंटें, और ईंटों के नीचे कहीं आग। ऊपर कुछ नहीं था। सिर्फ़ अँधेरा और चिमनी का धुआँ, जो अँधेरे में दिखता नहीं, सिर्फ़ सुँघाई देता है।
काम मुश्किल नहीं था। ढक्कन उठाओ, दो बेलचे कोयला डालो, ढक्कन वापस रखो, आगे बढ़ो। ढक्कन क़तार में लगे थे और क़तार पूरे भट्ठे के ऊपर एक बड़े अंडे की शक्ल में घूमती थी। एक चक्कर में चालीस मिनट लगते थे। रात में नौ चक्कर।
बड़ौत से आगे, यमुना की तरफ़ जाने वाली सड़क पर ऐसे ग्यारह भट्ठे थे। धनेसर गोंडा से आया था, दिवाली के आसपास, जब भट्ठे में आग दी जाती है, और उसे जून तक रहना था। पेशगी अठारह हज़ार थी और बहन की शादी में लग चुकी थी। बीच सीज़न में कोई जाए तो पैसा उसके साथ चलता है और आदमी पीछे रह जाता है।
जोखू पंद्रह साल से जलाई कर रहा था और उसने तीन बातें बताई थीं। ढक्कन कभी पूरा मत खोलो, वरना लपट मुँह पर आती है। जिस जगह मुंशी ने ईंट खड़ी करके रख दी हो, वहाँ पैर मत रखो। और तीसरी बात यह थी कि अगर पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आए तो रुकना मत।
पहली दो बातें साफ़ थीं। तीसरी की वजह जोखू ने नहीं बताई और धनेसर ने पूछी नहीं, क्योंकि जिस आदमी के साथ आपको छह महीने रहना है, उससे पहले हफ़्ते में ऐसी बातें नहीं पूछी जातीं।
दिसंबर की एक रात उसने वह आवाज़ सुनी। ढक्कन उठने की खनक, बेलचे की रगड़, फिर ढक्कन के बैठने की खनक। वही आवाज़ जो वह ख़ुद कर रहा था। फ़र्क़ एक था। वह सामने से आ रही थी, यानी कोई उल्टी तरफ़ से चक्कर लगा रहा था।
धनेसर को इसमें कुछ ग़लत नहीं लगा। रात में दो जलाई भी लग जाते हैं। उल्टी तरफ़ से चलने वाला आदमी उसे एक चक्कर में दो बार मिलना चाहिए था, एक बार चिमनी की तरफ़ और एक बार पीछे वाले सिरे पर। वह चलता रहा। इंतज़ार करता रहा।
वह पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गया जहाँ से चला था। कोई नहीं मिला। आवाज़ अब भी आ रही थी, उतनी ही दूर से, न पास आती हुई न दूर जाती हुई। नीचे उतरकर उसने जोखू से पूछा कि आज ऊपर उसके साथ कौन था। जोखू ने कहा कि कोई नहीं था, और अपनी खाट पर करवट बदल ली।
जनवरी में वह चीज़ हुई जिसका कोई जवाब नहीं था। धनेसर आठवें चक्कर में था और सामने वाले हिस्से में पहुँचा ही था कि उसे एक ढक्कन उठा हुआ मिला। ढक्कन एक तरफ़ रखा था। सूराख़ में ताज़ा कोयला पड़ा था, जो अभी जल भी नहीं रहा था। उस हिस्से में वह उस रात एक बार भी नहीं गया था।
उसने ढक्कन बंद किया और चलता रहा। बात यहाँ ख़त्म हो जाती अगर उसने अगली रात रुककर न देखा होता। उसने रुककर देखा। आवाज़ आती रही। रुकी नहीं, धीमी नहीं हुई, और अगले कुछ सेकंड में यह बात साफ़ हो गई कि वह पास आ रही है।
वह उस रात ऊपर से भागकर उतरा। जोखू ने उसे देखा और कहा कि इसीलिए मना किया था। मुंशी को बताने से कोई फ़ायदा नहीं था। मुंशी शाम को गिनती करके शहर चला जाता था और उसे भट्ठे की सबसे बड़ी फ़िक्र यह थी कि आग की चाल सही रहे।
फ़रवरी में चिमनी सरकाई गई। यह पूरे सीज़न का सबसे बड़ा काम होता है और उस रात सारे आदमी दूसरे सिरे पर थे, रस्सी और चादर के साथ। ऊपर सिर्फ़ धनेसर था और उसकी लालटेन थी। जलाई बंद नहीं की जा सकती, चाहे नीचे कुछ भी चल रहा हो, क्योंकि आग को खाना वक़्त पर चाहिए।
उसी रात आवाज़ सीढ़ी और उसके बीच आ गई। सीढ़ी सामने वाले सिरे पर थी। धनेसर के और सीढ़ी के बीच वह हिस्सा पड़ता था जहाँ पिछले हफ़्ते आग गुज़र चुकी थी और जहाँ मुंशी ने दो जगह ईंटें खड़ी करके रख दी थीं। पीछे लौटने का मतलब था आवाज़ की तरफ़ जाना। उसने लालटेन नीचे की और उस हिस्से पर पैर रखा।
छह क़दम ठीक गए। सातवें पर राख नीचे बैठ गई, जैसे कोई भरी हुई बोरी दब जाती है, और उसका बायाँ पैर घुटने तक भीतर चला गया। वह आगे की तरफ़ गिरा। यही उसे बचा गया। दोनों हाथों से उसने अपने को खींचा और घिसटता हुआ ठंडे हिस्से तक पहुँचा। जूता, तला और पिंडली का चमड़ा वहीं रह गए।
तीन हफ़्ते वह नीचे झोंपड़ी में पड़ा रहा। पेशगी वहीं की वहीं थी, इसलिए चौथे हफ़्ते वह काम पर लौट आया, पर ऊपर नहीं। अब वह अपनी घरवाली के साथ नीचे मिट्टी सानता है और साँचे में ईंट डालता है। यह जलाई से कम मज़दूरी का काम है। इसमें रात नहीं लगती।
रात में नीचे से भट्ठे का ऊपरी हिस्सा नहीं दिखता। सिर्फ़ लालटेनें दिखती हैं, जो उस अंडे जैसी शक्ल पर धीरे-धीरे घूमती रहती हैं। सब एक ही तरफ़ घूमती हैं, क्योंकि जलाई एक ही तरफ़ चलती है। धनेसर मिट्टी सानते हुए कभी-कभी उधर देख लेता है, बिना चाहे। और कभी-कभी उनमें एक होती है जो दूसरी तरफ़ जा रही होती है।