नागपुर के उस सरकारी अस्पताल में नियम काग़ज़ पर एक लाइन का था। जितनी बोतल ख़ून लगेगा, उतने दानी लाकर दो। रणवीर के बेटे के दिल का ऑपरेशन था और चार बोतल लिखी गई थीं। तारीख़ मिली थी, इकतीस अगस्त। दानी उसे ख़ुद जुटाने थे।

गाँव से चार आदमी लाना आसान नहीं होता। मज़दूरी छूटती है, आना-जाना है, और ख़ून देने को लेकर डर अलग है। रणवीर ने पंद्रह दिन में तीन जुटा लिए। दो चचेरे भाई और एक पड़ोसी। चौथा नहीं मिला।

अस्पताल के बाहर, चाय की दुकान के पास खड़े एक आदमी ने उसे देखा और ख़ुद बात शुरू की। उसने कहा कि आदमी का इंतज़ाम हो जाएगा, बारह सौ में, और वह ख़ुद ले आएगा। रणवीर ने पूछा कि कौन आदमी। उसने कहा कि उससे मतलब नहीं, ख़ून तो ख़ून है। रणवीर ने पैसे दे दिए।

खेल पलटने लगा

चौथा दानी अगले दिन आया। दुबला, बीस-बाईस का, और उसकी बाँह के मोड़ पर सुई के निशान इतने थे कि नर्स ने दो बार जगह बदली। रणवीर ने उसे देखा और फिर नहीं देखा। पर लौटते वक़्त उस लड़के ने उससे पानी माँगा और पानी पीते वक़्त उसका हाथ काँपा।

रात में रणवीर को नींद नहीं आई। बात सुई के निशान की नहीं थी। बात यह थी कि लड़का बहुत जल्दी तैयार हो गया था और उसने अपना नाम दो बार अलग बताया था, एक बार पर्ची पर और एक बार नर्स के पूछने पर।

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सुबह उसने पूछताछ की, अस्पताल के भीतर नहीं, बाहर। चाय वाले ने बताया कि लड़का हर हफ़्ते आता है। हर हफ़्ते। ख़ून देने में तीन महीने का अंतर रखना पड़ता है, यह बात रणवीर को अपने गाँव के डॉक्टर ने कभी बताई थी, और यही एक बात उसे याद रह गई थी।

इसका मतलब यह था कि लड़के का ख़ून किसी काग़ज़ में जाँचा नहीं जा रहा था, या जाँच का नतीजा किसी और का लगाया जा रहा था। रणवीर पढ़ा-लिखा नहीं था, पर यह हिसाब सीधा था। और वह ख़ून उसके बेटे में जाना था।

उसने ब्लड बैंक की खिड़की पर बात करने की कोशिश की। उससे कहा गया कि हर यूनिट की जाँच होती है और वह बेकार में डर रहा है। उसने पूछा कि जाँच की पर्ची दिखा दीजिए। उससे कहा गया कि पर्ची मरीज़ के तीमारदार को नहीं दी जाती।

कड़ी से कड़ी जुड़ी

उस रात उसने अपने गाँव के डॉक्टर को फ़ोन किया, जो असल में डॉक्टर नहीं, कंपाउंडर था। उसने पूरी बात सुनी और कहा कि अगर पर्ची पर नाम अलग है तो बोतल भी अलग हो सकती है, और यह पूछना तीमारदार का हक़ है। रणवीर ने पूछा कि पूछने से ऑपरेशन रुक तो नहीं जाएगा। कंपाउंडर ने हाँ कहा।

इकतीस तारीख़ में चार दिन थे। ऑपरेशन की तारीख़ का मतलब सिर्फ़ तारीख़ नहीं होता। मशीन का नंबर, डॉक्टर का नंबर, और बिस्तर, तीनों एक साथ मिलते हैं। तारीख़ छूटती है तो अगली तीन महीने बाद मिलती है। रणवीर के बेटे को डॉक्टर ने छह महीने के भीतर का कहा था और चार महीने बीत चुके थे।

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उसने डॉक्टर के सामने जाकर वह बोतल दिखाने को कहा जो उसके बेटे के लिए रखी थी, और उसके साथ लगी पर्ची पर जो नाम था, वह पढ़वाया। नाम वही था जो लड़के ने नर्स को बताया था, पर्ची वाला नहीं। रणवीर ने कहा कि यह ख़ून उसके बेटे को मत चढ़ाइए।

यह कहने का नतीजा वही हुआ जो होना था। यूनिट हटा दी गई, चार की जगह तीन बचीं, और ऑपरेशन इकतीस को नहीं हुआ। रणवीर बाहर बरामदे में बैठा रहा और उस दिन किसी से नहीं बोला।

वह उसी रात बस पकड़कर गाँव गया और ग्यारह दिन में चार लोगों को राज़ी करके लौटा। तीन उसके अपने ख़ानदान से थे और एक वह पड़ोसी था जो पहले भी आ चुका था और दोबारा नहीं दे सकता था, इसलिए उसने अपने साले को भेजा। इन ग्यारह दिनों का किराया, खाना और मज़दूरी का नुक़सान, यह सब उन पैसों से गया जो ऑपरेशन के बाद की दवाई के लिए रखे थे।

ऑपरेशन सत्रह सितंबर को हुआ। लड़का बच गया। दवाई के लिए रणवीर ने भैंस बेची, जो उसने ऑपरेशन से पहले नहीं बेची थी क्योंकि वही दूध देती थी। अब दूध ख़रीदकर आता है, और बेटे को रोज़ चाहिए।

उस लड़के का, जिसकी बाँह पर निशान थे, आगे क्या हुआ, यह रणवीर को नहीं मालूम। चाय वाले ने बाद में इतना कहा कि वह अब नहीं आता। रणवीर ने उन बारह सौ रुपयों के बारे में किसी से कभी शिकायत नहीं की। वह पर्ची, जिस पर दो अलग नाम लिखे थे, उसने सँभालकर रख ली है, बेटे के काग़ज़ों के साथ वाले लिफ़ाफ़े में। लिफ़ाफ़ा उसने खोलकर आज तक किसी को नहीं दिखाया।