बिहारी एक सुबह काम पर गया और लौटा नहीं। उम्र उन्नीस थी। उस दिन कुछ भी अलग नहीं हुआ था, न झगड़ा, न पैसे की बात, और यही सबसे बुरा हिस्सा था, क्योंकि जिस दिन कुछ नहीं होता उस दिन को दोबारा पढ़ा नहीं जा सकता।
तलाश सत्यपाल ने सँभाली, क्योंकि वह बड़ा था और घर में और कोई नहीं था। पहले महीने वह उन सब जगहों पर गया जहाँ जाना ज़ाहिर था। फिर पहले साल में वह उन जगहों पर गया जहाँ कोई वजह नहीं थी। दूसरे साल से उसने एक तरीक़ा बना लिया। हर दूसरे मंगलवार को वह निकलता था और शुक्रवार तक लौट आता था।
ग्यारह साल में यह क्रम नहीं टूटा। मंगलवार वाला दिन घर में एक तयशुदा चीज़ हो गया, जैसे मंडी का दिन होता है। बाक़ी दिन वह खेत देखता था और शाम को दूध का काम, और उसी में से हर चक्कर के पंद्रह सौ से दो हज़ार निकलते थे।
तीसरे साल उसे हरनाम मिला। हरनाम बस अड्डे के पास चाय की दुकान चलाता था और उसका काम यह था कि वह लोगों को जोड़ता था। कहाँ किस ठेके पर बाहर के मज़दूर लगे हैं, कौन-सी फ़ैक्ट्री में लोग रखे जा रहे हैं, किस शहर में कौन गया है। उसके पास हर सवाल का एक सिरा होता था।
उसने कहा कि लड़का ज़िंदा है। यह उसने पहले ही महीने कह दिया था और सत्यपाल को उस बात ने वह चीज़ दे दी जो उसे चाहिए थी। उसके बाद हर तीसरे-चौथे चक्कर पर हरनाम के पास कुछ न कुछ निकलता था। कहीं किसी ने ऐसा लड़का देखा, कहीं किसी ठेके पर वैसा नाम चढ़ा। दो बार सत्यपाल छह सौ किलोमीटर गया और दोनों बार वह कोई और आदमी निकला।
पैसा हरनाम कभी माँगता नहीं था। ख़र्चा होता था। बस का किराया, फ़ोन, किसी को खिलाना-पिलाना, और कभी-कभी किसी बड़े आदमी तक पहुँचने के लिए कुछ। हर बार तीन सौ, कभी पाँच सौ, कभी दो हज़ार। सत्यपाल ने कभी हिसाब नहीं जोड़ा और यह जान-बूझकर नहीं जोड़ा।
इसी बीच घर घिसता रहा। माँ की आँखें गईं और ऑपरेशन दो साल टलता रहा। खेत का एक टुकड़ा गया। सत्यपाल की अपनी शादी उन्तीस की उम्र तक टली और फिर उसने ख़ुद ही मना कर दिया, क्योंकि जिस घर में कोई ढूँढ़ा जा रहा हो उस घर में शादी करने वाली लड़की के साथ ज़्यादती होती।
बारहवें साल की एक बात ने सब खोल दिया, और वह बहुत छोटी थी। एक मंगलवार सत्यपाल तय समय से एक दिन पहले लौट आया और उसने हरनाम को अड्डे पर एक औरत से बात करते देखा। बात लंबी नहीं थी, दो मिनट की भी नहीं। लौटते हुए हरनाम ने उससे कहा कि वह पीछे वाले शहर से आई है। पीछे वाला शहर वही था जहाँ सत्यपाल दो बार जा चुका था।
उसके बाद वह पहली बार हरनाम को बताए बिना, अकेले, उस शहर गया। वह न किसी ठेके पर गया, न किसी दफ़्तर। वह सिर्फ़ उस बस्ती में गया जहाँ बाहर के मज़दूर रहते हैं और सुबह पाँच बजे से शाम तक एक चाय की दुकान पर बैठा रहा। तीसरे दिन उसने अपने भाई को देखा।
बिहारी वहीं था। ग्यारह साल से वहीं था। एक कारख़ाने में काम करता था, दो कमरों में रहता था, और उसकी पत्नी और दो बच्चे थे, जिनमें बड़ा नौ साल का था। सत्यपाल दिन भर उसे देखता रहा और शाम को उसके रास्ते में जाकर खड़ा हो गया।
बिहारी ने वजह भी बताई और वह इतनी छोटी थी कि सत्यपाल को उस पर गुस्सा तक नहीं आया। उन्नीस की उम्र में उस पर घर का चौदह हज़ार का उधार चढ़ा दिया गया था, जो उसने नहीं लिया था, और तीन महीने तक हर शाम उसी की बात होती थी। एक सुबह वह चला गया, यह सोचकर कि दो-तीन साल में पैसा जोड़कर लौट आएगा। दो साल में वह इतना नहीं जोड़ पाया। पाँच साल में लौटना और मुश्किल हो गया, और नौ साल में असंभव, क्योंकि तब तक लौटने का मतलब यह होता कि पिछले नौ साल जान-बूझकर बीते थे।
जो बात निकली, वह यह थी। बिहारी ने घर छोड़ा था। वह खोया नहीं था। और तीसरे साल से हरनाम को यह मालूम था, क्योंकि हरनाम की अपनी बहन उसी बस्ती में ब्याही थी। उसने बिहारी से पैसे नहीं लिए थे। उसने सिर्फ़ यह किया था कि सत्यपाल को कभी ना नहीं कहा। एक तरफ़ से देखो तो वह चुप रहा था। दूसरी तरफ़ से देखो तो वह नौ साल एक आदमी की उम्मीद बेचता रहा था, तीन सौ और पाँच सौ में।
सत्यपाल लौटा और उसने पहला काम माँ को बताने का किया। पूरी बात, बिना कुछ छोड़े। माँ रोटी बना रही थीं और उन्होंने चूल्हे से हाथ नहीं हटाया। उन्होंने सिर्फ़ यह पूछा कि लड़के के बच्चों की उम्र क्या है। सत्यपाल ने बता दी। उसके बाद उस घर में यह बात दोबारा नहीं उठी, न उस साल, न बाद में।
हरनाम से उसने कुछ नहीं कहा और न कभी पैसे माँगे। ग्यारह साल का जोड़ उसने सिर्फ़ एक बार लगाया, लौटने के बाद, और वह एक लाख नब्बे हज़ार के आसपास बैठा। यह रक़म खेत के उस टुकड़े से थोड़ी ही कम थी जो बिक गया था।
जो चीज़ उसने सोची नहीं थी, वह अगले मंगलवार आई। उस सुबह उठकर उसे समझ नहीं आया कि करना क्या है। ग्यारह साल से हर दूसरा मंगलवार भरा हुआ था। झोला। बस। नाम और पते। अब वह सुबह पूरी की पूरी ख़ाली पड़ी थी। सत्यपाल ने उस दिन भैंसों वाला कोठा साफ़ किया, जो बरसों से नहीं हुआ था, और उसमें उसे दोपहर तक लग गई।
दूसरी बात हरनाम की थी और वह तीसरे साल से यह जानता था, क्योंकि उसकी अपनी बहन उसी बस्ती में ब्याही थी। उसने बिहारी से पैसे नहीं लिए थे। उसने सिर्फ़ इतना किया था कि सत्यपाल को कभी ना नहीं कहा। एक तरफ़ से देखो तो वह चुप रहा था। दूसरी तरफ़ से देखो तो वह नौ साल एक आदमी की उम्मीद बेचता रहा था, तीन सौ और पाँच सौ में।
हरनाम के पास वह दोबारा नहीं गया और पैसे भी कभी नहीं माँगे। ग्यारह साल का जोड़ उसने सिर्फ़ एक बार लगाया, लौटने के बाद, और वह एक लाख नब्बे हज़ार के आसपास बैठा। यह रक़म खेत के उस टुकड़े से थोड़ी ही कम थी जो बिक गया था।