कंबाइन में बैठकर आदमी को पूरा खेत एक साथ दिखता है और यही उसका नशा है। चंद्रभान सत्रह घंटे तक उस कुर्सी पर बैठ सकता था, और सीज़न में बैठता भी था। मशीन गेहूँ काटती है, गाहती है, भूसा पीछे फेंकती है और दाना टंकी में डालती है, सब एक साथ चलते हुए। एक एकड़ में उसे पैंतीस से चालीस मिनट लगते थे, ज़मीन के हिसाब से।

मशीन अट्ठाईस लाख की पड़ी थी। बीस लाख फ़ाइनेंस से आए और आठ लाख दोनों ने आधे-आधे डाले, यानी चार-चार। चंद्रभान के चार लाख उसकी ज़मीन के एक टुकड़े से आए थे, जो बिक गया, और वह नक़द दिए गए थे।

साझा हाथ मिलाकर हुआ था। महिपाल बुकिंग और पैसा देखता था, डीज़ल भरवाता था और मालिकों से भाव तय करता था। चंद्रभान मशीन चलाता था और उसकी मरम्मत करता था। किश्त सवा लाख महीने की थी और वह सीज़न की कमाई से पूरे साल भरी जाती थी।

दोनों एक ही गाँव के थे और महिपाल चंद्रभान से छह साल बड़ा था। पहले वे दोनों दूसरों की मशीन पर चलते थे, महिपाल मुंशी और चंद्रभान चालक, और नौ सीज़न साथ निकाले थे। अपनी मशीन लेने की बात चंद्रभान ने छेड़ी थी और पैसे का जुगाड़ महिपाल ने किया था। इसमें किसी ने किसी को फँसाया नहीं था। शुरू में वह एक अच्छा साझा था और दोनों को यही लगता था।

सीज़न चार महीने का होता है। मार्च के आख़िर में मध्य प्रदेश से शुरू, फिर हरियाणा, फिर पंजाब और ऊपर तक। मशीन ट्रेलर पर चढ़ती है, रात में सड़क नापती है, और सुबह नए ज़िले में उतर जाती है। इन चार महीनों में सब कुछ नक़द चलता है और किसी चीज़ की रसीद नहीं बनती।

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दूसरे साल महिपाल ने रात की बुकिंग अलग से लेनी शुरू कर दी। उसने एक और चलाने वाला रख लिया, दिहाड़ी पर, और कहा कि चंद्रभान दिन में इतना चला लेता है कि रात में उसे आराम मिलना चाहिए। यह ठीक भी लगा।

चंद्रभान डीज़ल ख़ुद भरता था, क्योंकि टंकी मशीन के ऊपर है और उस तक चढ़ना पड़ता है। कंबाइन एक घंटे में क़रीब बारह लीटर पीती है और यह हिसाब उसके हाथ में था। जून के पहले हफ़्ते में उसने बिना किसी वजह के जोड़ लगाया। उस पखवाड़े का डीज़ल उन घंटों से लगभग सत्तर घंटे ज़्यादा का था जितने की बुकिंग बताई गई थी।

सत्तर घंटे यानी लगभग एक सौ दस एकड़। एक सौ दस एकड़ के पैसे कहीं थे और हिसाब में कहीं नहीं थे।

दूसरी चीज़ मशीन के अगले हिस्से पर मिली। जिस पट्टी से फ़सल काटी जाती है, उस पर उँगलियों जैसे लोहे के गार्ड लगे रहते हैं, और पथरीली ज़मीन में वे मुड़ जाते हैं। एक सुबह चंद्रभान ने दो गार्ड ताज़ा मुड़े हुए पाए। पिछली रात मशीन उसके पास नहीं थी।

तीसरी चीज़ ऐसी थी जो अच्छी लगती थी। महिपाल किश्त महीने के पहले हफ़्ते में भरने लगा, जबकि तारीख़ बीस की थी। समय से पहले भरना अच्छी बात मानी जाती है।

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जून के तीसरे हफ़्ते में चंद्रभान फ़ाइनेंस के दफ़्तर गया, किसी और काम से। वहाँ उसे वह बात मालूम हुई जो शुरू से मालूम थी और जिस पर उसने कभी सोचा नहीं था। मशीन महिपाल के नाम है। क़र्ज़ भी उसी का है। किश्त भी उसी के खाते से जाती है। चंद्रभान के चार लाख नक़द थे और नक़द का कोई नाम नहीं होता।

सत्तर घंटे किसी चोरी के नहीं थे। वे इसलिए थे कि जिन मालिकों के खेत रात में कटे, वे महिपाल को जानते थे और चंद्रभान को नहीं। दो सीज़न में ऐसे मालिकों की संख्या काफ़ी हो जाती है, और जब कभी यह पूछा जाए कि मशीन किसकी है, तो जवाब देने वाले वही लोग होते हैं।

सीज़न ख़त्म होने में उन्नीस दिन बचे थे। इसके बाद मशीन आठ महीने खड़ी रहती है, और वह जिसके अहाते में खड़ी होगी, उसी की मानी जाएगी। यह क़ानून नहीं है, पर आठ महीने कोई चीज़ किसी के अहाते से निकालना क़ानून से नहीं होता।

आख़िरी दिन ऊपर सहारनपुर की तरफ़ था। काम शाम को ख़त्म हुआ और महिपाल ने कहा कि मशीन सीधे उसके अहाते ले चलो, रास्ते में पड़ता है। चंद्रभान ने कहा ठीक है। ट्रेलर पर चढ़ाने में डेढ़ घंटा लगता है। चढ़ाई उसी ने। ट्रैक्टर भी उसी ने चलाया, क्योंकि चलाता वही था।

मोड़ पर वह मुड़ा नहीं। महिपाल पीछे वाली गाड़ी में था और उसे यह बीस मिनट बाद पता चला। कंबाइन ट्रेलर पर उन्नीस किलोमीटर प्रति घंटे से ज़्यादा नहीं चलती और मोटरसाइकिल कुछ भी चल सकती है। इसके बावजूद उसे रोका नहीं गया, क्योंकि सड़क पर उसे रोकने का कोई तरीक़ा नहीं था जो झगड़ा न बने, और झगड़े में मशीन का नाम बाहर आता।

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मशीन उस रात चंद्रभान के अहाते में खड़ी हुई और उसके बाद कहीं नहीं गई। मुक़दमा दो महीने बाद शुरू हुआ और अब चौथे साल में है। तारीख़ें पड़ती हैं। आगे बढ़ जाती हैं। मशीन पर अदालत की रोक है, इसलिए न वह चल सकती है, न बिक सकती है।

अहाते में वह अब भी खड़ी है। तिरपाल ओढ़े। चार सीज़न बीत गए और चार सीज़न की क़ीमत उससे निकल गई। ब्लेड जंग खा चुके हैं। टायर बैठ गए हैं। उसके नीचे की छाँव में गर्मियों में मुर्गियाँ बैठती हैं। किश्त अब भी जा रही है, महिपाल के खाते से, हर महीने की बीस तारीख़ को।