क़स्बे में सात घड़ियाँ ऐसी थीं जिन्हें हर हफ़्ते चाबी देनी पड़ती थी। सातों झूठ बोलती थीं। मोहन के पास एक कॉपी थी जिसमें लिखा रहता था कि कौन कितना झूठ बोलती है। तहसील वाली रोज़ दो मिनट आगे भागती। स्कूल वाली आठ दिन में डेढ़ मिनट पीछे। धर्मशाला वाली मौसम के हिसाब से बदलती थी और उसका कोई भरोसा नहीं था। तेल मिल के दफ़्तर वाली घड़ी हफ़्ते में चार मिनट खोती थी, हमेशा चार, ग्यारह साल से। हर महीने की पहली तारीख़ को मोहन उसे मिलाकर आता था।
क़स्बे में समय पर किसी की सहमति नहीं थी। स्टेशन की घंटी अपनी कहती, मिल का भोंपू अपनी, अज़ान अपनी, और स्कूल की घंटी उस चपरासी के हिसाब से बजती थी जिसकी कलाई पर घड़ी थी ही नहीं। पूस में कोहरा इतना गिरता कि सूरज का भी ठीक पता न चलता। एक ही चीज़ थी जिस पर पूरा क़स्बा एकमत था। रात की मालगाड़ी। वह नौ बजकर चालीस मिनट पर पुल पार करती थी और उसकी आवाज़ से पुरानी बस्ती के दरवाज़े हिल जाते थे। मालगाड़ी लेट नहीं होती।
जनवरी की एक सुबह एक औरत दुकान पर आई और बोली कि वह अपने आदमी की घड़ी लेने आई है। नाम शांति था। तीन महीने पहले रामखेलावन कलाई घड़ी का पट्टा बदलवाने आया था और उसे लेने कभी लौटा नहीं। मोहन ने दराज़ से घड़ी निकालकर काउंटर पर रखी और पैसे लेने से मना कर दिया। शांति ने पैसे रख दिए। फिर उसने बताया कि फ़ाइल में क्या लिखा है। रामखेलावन मिल का फिटर था, रात सवा नौ बजे मशीन के ऊपर वाले चबूतरे से गिरा, दुर्घटना, मुआवज़ा कुछ नहीं, क्योंकि लिखा है कि वह छुट्टी के बाद अकेला ऊपर चढ़ा था और पिए हुए था। मैनेजर के बयान में है कि वह साढ़े नौ बजे ताला लगाकर निकल चुका था। शांति ने घड़ी दुपट्टे के कोने में बाँधी और चली गई। उसने मोहन से कुछ नहीं माँगा।
सबसे करीबी शक के घेरे में
सवा नौ। यह संख्या मोहन के भीतर अटक गई। रात में उसने कॉपी निकाली और पीछे के पन्ने पलटे। पहली पूस के आगे कुछ लिखा ही नहीं था। उसे याद आया। उस दिन मिल का मुंशी गेट पर ही मिल गया था और हँसकर बोला था कि इस बार ज़रूरत नहीं है, बाद में बुला लेंगे। ग्यारह साल में पहली बार। अगले महीने भी नहीं बुलाया गया। मोहन ने पेंसिल से जोड़ा। हफ़्ते के चार मिनट, नौ हफ़्ते, छत्तीस मिनट। जिस रात रामखेलावन गिरा, उस घड़ी में सवा नौ बज रहे थे तो बाहर पौने दस बज चुके थे।
पहली माघ को वह अपने राउंड पर मिल गया। गेट पर ताला था। मुंशी ने बाहर ही निपटा दिया, बहुत मीठा बोलकर, कि मिल बिक गई है और दफ़्तर ख़ाली हो रहा है, अब चाबी देने की ज़रूरत नहीं। मोहन ने गरदन उठाकर दफ़्तर की खिड़की से अंदर देखा। घड़ी अब भी दीवार पर टँगी थी, बंद, काँटे किसी पुराने वक़्त पर रुके हुए। उसने घड़ी के बारे में एक शब्द नहीं कहा। साइकिल मोड़ी और लौट आया।
बुधई मिल का चौकीदार था और अब पान की दुकान पर बैठकर दिन काटता था। मोहन ने उससे मौसम की बात की, फिर बीड़ी की, फिर एक सवाल पूछा। उस रात मालगाड़ी निकल गई थी क्या। बुधई ने बिना सोचे कहा कि हाँ, निकल गई थी, वह चाय पीने बैठा ही था कि ऊपर से आवाज़ आई। फिर वह रुक गया। बीड़ी बुझ गई। उसका हाथ उसे उठाने तक गया और वहीं रुका रहा। फिर उसने मोहन की तरफ़ देखकर धीरे से कहा कि मेरा नाम मत लेना, मेरे चार बच्चे हैं।
तीन दिन बाद स्कूल से ख़बर आई कि घड़ी का काम अब किसी दूसरे आदमी को दे दिया गया है। हफ़्ते भर में तहसील का काम भी चला गया। एक दोपहर एक आदमी दुकान के सामने वाली बेंच पर आकर बैठ गया, कुछ ख़रीदा नहीं, कुछ पूछा नहीं, बस बैठा रहा, और उठते हुए उसने मोहन की बेटी के स्कूल का नाम लेकर पूछा कि वह वहीं पढ़ती है न। कोई धमकी नहीं थी। मोहन ने उस रात दुकान का शटर दो बार जाँचा। दूसरी बार बिना वजह।
सबूत घड़ी के भीतर था। लकड़ी के पिछले तख़्ते पर पेंसिल से तारीख़ें लिखी जाती हैं, हर बार जब कोई उसे खोलकर तेल देता है। उस तख़्ते पर सबसे ऊपर की लिखावट मोहन के पिता के हाथ की थी, सन सत्तर की, और उसके नीचे लगभग हर महीने की एक लाइन, ग्यारह साल मोहन के हाथ की। और फिर आख़िरी दो महीने ख़ाली। वह ख़ालीपन काग़ज़ पर नहीं, लकड़ी पर था। मकर संक्रांति के दिन मिल का कबाड़ नीलाम होना था। घड़ी वज़न से बिकती।
एक नाम, जो बार-बार लौटा
शांति के वकील ने साफ़ कहा था कि सुनी सुनाई बात से कुछ नहीं होगा, घड़ी सामने चाहिए। नीलामी सबके सामने होती है। बोली लगाने का मतलब था अपना नाम खड़ा करके पूरे क़स्बे को बता देना कि घड़ीसाज़ को वह घड़ी क्यों चाहिए। मोहन की पत्नी ने उसे रोका नहीं। उसने बस यह पूछा कि बुधई का क्या होगा। मोहन के पास जवाब नहीं था। उस रात उसने कॉपी में कुछ नहीं लिखा।
संक्रांति की सुबह मिल के अहाते में कोहरा था और ऊपर पतंगें उड़ रही थीं। कबाड़ ढेरों में लगा था। पंखे, लोहे की अलमारी, टूटी कुर्सियाँ, और उन्हीं के बीच दीवार घड़ी, काँच चटका हुआ। बोली पाँच सौ से शुरू हुई। मोहन ने हाथ उठाया और अहाते के आधे लोग मुड़कर उसे देखने लगे। सामने से एक आदमी बोली बढ़ाता गया, बिना रुके, बहुत आगे तक, जहाँ उस लोहे की कोई क़ीमत नहीं बचती। मोहन ने ग्यारह हज़ार में घड़ी ली। इतने पैसे उसके पास थे ही नहीं। घड़ी कंधे पर रखकर वह कोहरे में पैदल घर लौटा, और वह भारी थी।
आगे जो हुआ वह काग़ज़ पर हुआ और उसमें छह महीने लगे। वकील ने तख़्ते की तस्वीरें लगाईं, कॉपी के पन्ने लगाए, और मिल की तरफ़ से अदालत के बाहर सुलह हो गई। शांति को पैसा मिल गया। किसी पर मुक़दमा नहीं चला। मैनेजर का परिवार गर्मियों से पहले कानपुर चला गया। और नीलामी के अगले ही हफ़्ते बुधई का क्वार्टर ख़ाली करा लिया गया। मोहन दो बार वहाँ गया। दूसरी बार दरवाज़े पर मिट्टी जमी हुई थी। किसी को उसके गाँव का नाम नहीं मालूम था।
घड़ी अब मोहन के कमरे में टँगी है। काँच वैसा ही चटका हुआ है और वह अब भी हफ़्ते में चार मिनट खोती है। हर महीने की पहली तारीख़ को वह उसे मिलाता है, हालाँकि उस कमरे में उसका सही समय किसी के काम नहीं आता। पूस में क़स्बे पर वैसा ही कोहरा गिरता है और लोग वैसे ही अंदाज़े से बताते हैं कि कितने बजे होंगे। रात को मालगाड़ी पुल पार करती है। दरवाज़े हिलते हैं। मोहन जागा हुआ होता है।