दूध की सबसे बड़ी दुश्मन गर्मी नहीं है, वक़्त है। कैन में भरने के बाद हर घंटा उसे थोड़ा और आगे धकेलता है, और एक जगह आकर वह पलट जाता है। यह बात रामकिशन को पहले ही हफ़्ते में बता दी गई थी। दूध इंतज़ार नहीं करता। वह अपने गाँव का दूध केंद्र चलाता था, साठ घरों का दूध रोज़ सुबह तौलता था, और उसे इसके छह हज़ार रुपये महीने और हर लीटर पर तीस पैसे मिलते थे।

चिलिंग वैन चौदह गाँवों का चक्कर लगाती थी। वह सुबह पौने पाँच बजे संघ के डेरे से निकलती और साढ़े नौ बजे तक लौट आती थी। जो गाँव पहले पड़ता है, उसका दूध वैन के ठंडे टैंक में सबसे जल्दी पहुँचता है। जो आख़िर में पड़ता है, उसका दूध कैन में चार घंटे बैठकर आता है। यही पूरा खेल है। रास्ते का यह क्रम कोई भी बदल सकता था, बशर्ते वह रामकिशन न हो।

उनका गाँव बरसों से तीसरे नंबर पर था। वैन सवा पाँच पर आ जाती थी। किसी ने इसे कभी सोचा नहीं था। फिर एक साल संघ ने बड़ी वैन ख़रीदी और चौदह गाँवों का पूरा क्रम नए सिरे से बना दिया, इस बार मात्रा के हिसाब से, जिसमें सबसे ज़्यादा दूध वाला गाँव पहले पड़ता है। उनके गाँव में उन्हीं सालों में बत्तीस भैंसें बिक चुकी थीं। नए क्रम में वे ग्यारहवें पर आ गए। यह ख़बर गाँव तक किसी ने पहुँचाई भी नहीं।

वैन अब पौने नौ बजे आती थी। पहले जेठ में तीन-चार कैनें लौटती थीं। उस जेठ में सत्रह लौटीं। लौटी हुई कैन का मतलब है कि उस दिन का दूध किसी काम का नहीं। संघ पैसे नहीं देता और गाँव उसे फेंकता भी नहीं, बस पूरे घर उस दिन दही और मट्ठे पर आ जाते हैं। दूसरे महीने का हिसाब रामकिशन ने ख़ुद जोड़ा। जोड़ आसान था। साठ घरों का नुक़सान अड़तालीस हज़ार रुपये महीना था।

वह संघ के दफ़्तर गया। रोशनलाल ने उसे बिठाया, चाय पिलाई, और वह सब समझाया जो कहने को था। वैन एक है। गाँव चौदह हैं। बड़े गाँव का दूध पहले न उठे तो वहाँ रोज़ चालीस कैनें बैठी रहेंगी। रामकिशन ने कहा कि किसी को तो ग्यारहवें नंबर पर होना ही है, और रोशनलाल ने कहा कि हाँ, यही तो बात है।

📚 यह भी पढ़ें बोलती हुई लाश
बोलती हुई लाश

उस दिन रामकिशन को वह चीज़ समझ आई जिससे लड़ना सबसे मुश्किल होता है। सामने कोई बेईमान आदमी नहीं था। कोई रिश्वत नहीं। कोई दुश्मनी नहीं। एक वैन थी, चौदह गाँव थे, और एक हिसाब था जो हर तरफ़ से सही बैठता था। हिसाब से बहस नहीं की जा सकती।

लौटते वक़्त बस में उसने वह चीज़ पकड़ी जो उसके हाथ में थी। वैन का वक़्त उसके बस में नहीं था। दुहाई का वक़्त था। गाँव में भैंसें साढ़े चार बजे दुही जाती थीं, बरसों से, और पौने नौ तक वह दूध सवा चार घंटे पुराना हो जाता था। अगर गाँव सात बजे दुहे, तो वही दूध पौने दो घंटे का होगा।

यह कहने में एक वाक्य है। करने में एक पूरा गाँव है। साढ़े चार बजे की दुहाई से पूरे दिन का ढाँचा बँधा हुआ था। दुहाई के बाद औरतें चारा काटती थीं, फिर रोटी, फिर बच्चे स्कूल, फिर आदमी खेत। ढाई घंटे पीछे खिसकाने का मतलब था कि हर काम ढाई घंटे पीछे खिसके, और स्कूल की घंटी अपनी जगह से नहीं हिलती।

पहले महीने ग्यारह घर माने। साठ में से ग्यारह। बाक़ी उनतालीस ने या तो मना कर दिया या हाँ कहकर नहीं बदला। सबसे ज़्यादा विरोध उन घरों से आया जिनके पास दो या तीन भैंसें थीं, यानी जिनका नुक़सान सबसे ज़्यादा था, क्योंकि उन्हीं के घर की औरत पर काम भी सबसे ज़्यादा था। एक बुज़ुर्ग ने चौपाल पर कहा कि यह लड़का हमें अपनी नौकरी बचाने के लिए घुमा रहा है, और यह बात लोगों को ठीक लगी।

रामकिशन ने फिर बहस नहीं की। उसने गिनती दिखाना शुरू कर दिया। जिन ग्यारह घरों ने वक़्त बदला था, उनकी कैनें लौटना बंद हो गईं। यह बात दो महीने में साफ़ दिखने लगी और उसे किसी समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। तीसरे महीने इक्कीस घर हो गए। फिर चौंतीस। भादों तक अड़तालीस।

📚 यह भी पढ़ें दूसरा चेहरा
दूसरा चेहरा

बाक़ी बारह कभी नहीं बदले। एक भी नहीं। उनमें से आठ ने अगले साल भैंसें बेच दीं और दूध लगाना ही छोड़ दिया, और गाँव में इसकी वजह दूध का भाव बताई गई, जो पूरी तरह ग़लत भी नहीं थी। रामकिशन को इसका हिसाब कभी ठीक से नहीं बैठा और वह इस पर बात नहीं करता।

इस पूरे मामले में रामकिशन का अपना हिसाब भी था, जो उसने गाँव के सामने कभी नहीं रखा। तीस पैसे प्रति लीटर उसी दूध पर मिलते हैं जो संघ लेता है, इसलिए लौटी हुई हर कैन उसकी अपनी जेब से भी कटती थी। और जिन आठ घरों ने भैंसें बेचीं, उनका दूध दोबारा कभी नहीं लौटा। दो साल पहले वह रोज़ चार सौ लीटर तौलता था। अब तीन सौ दस तौलता है, और यह संख्या फिर कभी चार सौ नहीं हुई।

दो साल बाद संघ ने एक और वैन ली और चौदह गाँवों का क्रम फिर बदला। इस बार उनका गाँव तीसरे नंबर पर आ गया। वैन दोबारा सवा पाँच बजे आने लगी। अब सात बजे दुहने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

गाँव ने वक़्त वापस नहीं बदला। दो साल में दिन ने अपने आप को नए हिसाब से बाँध लिया था। चारा शाम को कट जाता है, रोटी बच्चों के जाने के बाद बनती है, और आदमी खेत पर सात के बजाय नौ बजे जाते हैं। अब उस गाँव का दूध वैन में सबसे ताज़ा जाता है, और यह बात वहाँ किसी के लिए ख़ास नहीं है।