हस्ताक्षर बारहवीं बार भी ठीक नहीं आया। राघव ने काग़ज़ पलटा और फिर से लिखा: अनिल कुलकर्णी। ‘ल’ की गाँठ हर बार थोड़ी बड़ी बन जाती थी। ग्यारह महीने हो गए थे इस नाम को लिखते हुए, और उँगलियाँ अब भी इसे अपना नहीं मान रही थीं। उसने पूरा पन्ना फाड़ा, जलाया, राख नल के नीचे बहा दी। फिर दफ़्तर के लिए निकला।
नासिक में वह पंचवटी के पीछे एक साइकिल की दुकान के ऊपर वाले कमरे में रहता था। किराया अठारह सौ, बिजली अलग। दफ़्तर में उसका काम अनाज के सौदों की बही रखना था, और वह यह काम अच्छा करता था, क्योंकि अच्छा काम करने वाले से कोई सवाल नहीं पूछता। नागपुर से वह सिर्फ़ एक चीज़ लाया था: हरे रंग की एक फ़ाइल, जो पलंग के नीचे टीन के बक्से में पड़ी थी। ग्यारह महीने में उसने उसे एक बार भी नहीं खोला था।
दशहरे के बाद सेठ ने उसे बुलाया। ‘दिवाली से पहले बही बंद करनी है,’ सेठ ने कहा। ‘नागपुर वाली शाखा का हिसाब गड़बड़ है। तू ग्यारह तारीख़ को निकल जा।’ राघव ने सिर हिला दिया। बाहर आकर उसने दीवार पर टँगे कैलेंडर को देखा। ग्यारह दिन बचे थे।
गलत आदमी, सही सवाल
नागपुर में वह अनिल कुलकर्णी नहीं था। वहाँ वह राघव देशमुख था, और ‘सुयश निधि’ नाम की एक कंपनी में सबसे छोटा क्लर्क। कंपनी लोगों से पैसा जमा करवाती थी और ब्याज देती थी, जब तक देती रही। तीन साझेदार थे। एक सुबह तीनों नहीं आए, और उनके साथ चौदह सौ लोगों का पैसा भी नहीं आया। जो काग़ज़ पीछे रह गए, उन पर सबसे नीचे राघव के दस्तख़त थे।
वह मासूम नहीं था, और यह बात उसे तीन साल से रोज़ याद आती थी। आख़िरी आठ महीने उसने जो रसीदें काटीं, उन पर तारीख़ें पीछे की थीं। हर महीने चार हज़ार अलग से मिलते थे और उसने कभी नहीं पूछा कि किस बात के। बाक़ी सब जो उसके नाम पर लिखा गया, वह उसने नहीं किया था। पर अदालत में यह फ़र्क़ समझाने के लिए वकील चाहिए, और वकील के लिए पैसा।
आठवें दिन, चाय की टपरी पर, किसी ने पीछे से कहा, ‘देशमुख।’ राघव ने पलटकर नहीं देखा। यही उसकी सबसे बड़ी ग़लती थी, क्योंकि न पलटना भी एक जवाब है। आदमी उसके बग़ल में आकर खड़ा हो गया। पैंतालीस के आसपास, इस्त्री की हुई कमीज़, हाथ में कुछ नहीं। ‘चाय पिला दो,’ उसने कहा। ‘फिर बात करते हैं।’
आदमी ने अपना नाम नहीं बताया और राघव ने पूछा भी नहीं, क्योंकि उसे लगा कि पूछने से हालत और ख़राब होगी। आदमी ने बताया कि वह तीन महीने से नासिक में है। उसने राघव के कमरे का पता बोला, साइकिल की दुकान समेत। फिर उसने कहा, ‘चार हज़ार महीना। आठ महीने। बत्तीस हज़ार।’ राघव के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा। यह आँकड़ा किसी काग़ज़ पर नहीं था।
राघव ने मान लिया कि आदमी जासूस है। शायद किसी बैंक का, शायद अदालत का। यह मान लेना आसान था, और आसान चीज़ें उस वक़्त बहुत अच्छी लगती हैं। जाते-जाते आदमी ने कहा, ‘एक सलाह। थाने मत जाना। वहाँ गए तो जो थोड़ा बचा है, वह भी नहीं बचेगा।’ राघव ने इसे धमकी समझा। रात भर वह यही सोचता रहा कि धमकी में इतनी नरमी क्यों थी।
राज़ गहराता गया
अगली सुबह उसने सेठ से कहा कि तबीयत ठीक नहीं, कोई और चला जाए। सेठ ने चश्मे के ऊपर से देखा। नागपुर की बही ग्यारह महीने से वही आदमी लिख रहा है जो जा रहा है, सेठ ने याद दिलाया। ‘तू नहीं जाएगा तो मुझे जाना पड़ेगा,’ उसने कहा, ‘और मैं गया तो लौटकर तुझसे सवाल पूछूँगा।’ राघव ने और ज़ोर नहीं डाला। तीन दिन बचे थे।
उस शाम राघव पहली बार टीन का बक्सा खोलकर बैठा। हरी फ़ाइल में वह सब था जो वह भागते वक़्त उठा लाया था: असली बही की चौदह फ़ोटोकॉपी, जिन पर तीनों साझेदारों के दस्तख़त थे। साथ में एक पुराना अख़बार भी था, जिसमें कंपनी के उद्घाटन की तस्वीर छपी थी। वह तस्वीर उसने तीन साल से नहीं देखी थी। अब उसने लालटेन पास खींचकर देखी।
तस्वीर में सात लोग थे। बीच में तीनों साझेदार। सबसे दाईं तरफ़ वाला उस वक़्त दुबला था और अब भर गया था, पर कान वैसे ही थे। कमीज़ भी वैसी ही इस्त्री की हुई। राघव देर तक उसे देखता रहा। जासूस थाने जाने से नहीं रोकता। साझेदार रोकता है।
उसी रात दरवाज़े पर दस्तक हुई। राघव ने कुंडी नहीं खोली। बाहर से आवाज़ आई, ‘फ़ाइल मेरे पास आ जाए तो तुम्हारा नाम कहीं नहीं आएगा। दो लाख भी मिलेंगे, और नए काग़ज़ भी। सोच लो।’ बाहर कुछ पल कोई आवाज़ नहीं आई। फिर वही आदमी, अब थोड़ी नीची आवाज़ में, ‘और अगर काग़ज़ नागपुर पहुँचे, तो तुम भी उन्हीं के साथ अंदर जाओगे। दस्तख़त तुमने भी किए हैं। यह मत भूलना।’
राघव ने सुबह तक हिसाब लगाया, वैसे ही जैसे वह बही में लगाता था। दो लाख और नए काग़ज़ लेने का मतलब था कि चौदह सौ लोगों को कुछ नहीं मिलेगा, कभी नहीं। फ़ाइल नागपुर ले जाने का मतलब था कि सज़ा उसे भी होगी, क्योंकि रसीदों की तारीख़ें उसी ने बदली थीं। दोनों तरफ़ नुक़सान था। फ़र्क़ बस इतना था कि एक नुक़सान अकेले उसका था।
ग्यारह तारीख़ को वह सुबह की बस से निकला। हरी फ़ाइल कंधे के थैले में थी और थैला उसने गोद में रखा। बस अड्डे पर टिकट लेते वक़्त क्लर्क ने नाम पूछा, रजिस्टर में चढ़ाने के लिए। राघव ने तीन साल बाद अपना नाम ज़ोर से बोला। क्लर्क ने बिना सिर उठाए टिकट काटा और अगले आदमी को आवाज़ लगा दी।