कार्तिक के मेले की आख़िरी रात थी। सरोज की दुकान झूले वाली गली के मोड़ पर थी, दो फ़ुट ऊँचे तख़्ते पर, और उस पर चूड़ियों की सोलह ट्रे सजी थीं। लाल सबसे आगे रखी थीं, क्योंकि लाल सबसे पहले बिकती है। लाउडस्पीकर पर वही गाना चौथी बार बज रहा था।
साल भर में यही चार रातें उसके काम की थीं। माल उसने ब्याज पर उठाया था, फ़िरोज़ाबाद से, और आख़िरी रात का हिसाब ही तय करता था कि अगले बरस दुकान बड़ी होगी या छोटी। वह सुबह से खड़ी थी। पैर सूज गए थे, इसलिए चप्पल उसने तख़्ते के नीचे सरका दी थी।
सात बजे के आसपास एक औरत अपनी बेटी को लेकर आई। लड़की चार-पाँच बरस की रही होगी, दुबली, और ट्रे तक पहुँचने के लिए उसने अपनी चप्पलों पर पंजे उठाए। उसे लाल ही चाहिए थी। सरोज ने नाप देखा और कहा कि यह छोटी पड़ेगी।
तस्वीर अधूरी थी
"बदल दो न," औरत ने कहा। सरोज ने रेती निकाली और चूड़ी के भीतरी हिस्से को थोड़ा घिसा। फिर उसने लड़की का हाथ अपनी हथेली पर रखा, अँगूठा दबाया, और चूड़ी चढ़ा दी। कलाई पतली थी, इसलिए वह ऊपर की तरफ़ खिसक गई। लड़की ने हाथ घुमाकर उसे देखा और हँस दी। दस रुपये मिले और दोनों भीड़ में चली गईं।
इसके बाद तीन घंटे सिर उठाने की फ़ुर्सत नहीं मिली। जलेबी की कढ़ाई की गंध हवा में जमी हुई थी। झूला हर बार ऊपर जाकर एक साथ चीख़ता था। सरोज ने चालीस से ऊपर लाल चूड़ियाँ बेचीं और गल्ला दो बार भरकर नीचे की टोकरी में उलटा।
दस बजे के बाद भीड़ पतली होने लगी। तभी उसकी नज़र गली के बीच से गुज़रते एक आदमी पर पड़ी, जिसके साथ एक छोटी लड़की थी। चेहरा उसने नहीं देखा। सिर्फ़ पीठ देखी, और कलाई पर ऊपर की तरफ़ खिसकी हुई एक लाल चूड़ी।
उसने ख़ुद को समझाया कि आज रात इस मेले में चालीस कलाइयों पर लाल चूड़ी है। उसने सिर झुकाकर अगले ग्राहक का पैसा गिना। पर हाथ गिनती पर था और आँख गली पर। लड़की रो नहीं रही थी। बोल भी नहीं रही थी।
फिर उसने वह चीज़ देखी जिसने उसके भीतर कुछ ठंडा कर दिया। पैरों में चप्पल नहीं थी। मेले की मिट्टी पर वह नंगे पैर चल रही थी, और तेज़ चल रही थी क्योंकि आदमी का क़दम बड़ा था। सात बजे उसी लड़की ने अपनी चप्पलों पर पंजे उठाकर ट्रे तक हाथ बढ़ाया था। सरोज को वह पंजा याद था।
एक चूक, जो भारी पड़ी
उसने गली के दोनों सिरों पर नज़र दौड़ाई। वह औरत कहीं नहीं थी। लाउडस्पीकर पर गाना अब भी बज रहा था और उसके बीच-बीच में खोया-पाया वाला कुछ बोल रहा था, पर उतनी दूर से सिर्फ़ आवाज़ आती थी, शब्द नहीं।
बग़ल की दुकान बिसराम की थी। सरोज ने उसे इशारे से बुलाया और दो लाइन में बात बताई। "अपने काम से काम रखो," बिसराम ने कहा। "तुम अकेली औरत हो। और दुकान छोड़ोगी तो लौटकर ख़ाली तख़्ता मिलेगा।" सरोज ने घड़ी नहीं देखी। उसने चप्पल पैरों में डाली और तख़्ते से नीचे उतर गई।
भीड़ में चलना तैरने जैसा था। कंधे टकराते थे, कोई गुब्बारा आँख के आगे आ जाता था, और झूले की चीख़ हर बार सिर के ऊपर से गुज़रती थी। भीड़ ने उन्हें दो बार ढका। दो बार वे फिर दिखे। तीसरी बार वह उनसे दस क़दम पीछे थी। आदमी लंबा था, हल्के रंग की क़मीज़ में, और उसने लड़की को कलाई से पकड़ रखा था, हथेली से नहीं।
सरोज ने आगे बढ़कर लड़की का दूसरा हाथ पकड़ लिया। "यह चूड़ी छोटी है, बदलनी है," उसने कहा, और आवाज़ ऐसी रखी जैसे वह यह रोज़ कहती हो। "दुकान यहीं है। दो मिनट।"
आदमी रुक गया। उसने शोर नहीं किया। हाथ भी नहीं छोड़ा। वह मुस्कुराया और बोला कि बच्ची उसकी बहन की है और उन्हें देर हो रही है। फिर उसने कलाई पर पकड़ थोड़ी कस दी। लड़की ने दोनों तरफ़ देखा और चुप रही। भीड़ उनके दोनों तरफ़ से बहती रही और किसी ने मुड़कर नहीं देखा।
सरोज का गला सूखा था। अपनी आवाज़ उसे गले में अटकती हुई महसूस हुई। वह लड़ नहीं सकती थी, और चिल्लाकर चोर भी नहीं कह सकती थी, क्योंकि साबित करने को उसके पास कुछ नहीं था। इसलिए उसने वह किया जो वह पंद्रह बरस से करती आई थी। उसने पूरी आवाज़ में हाँक लगाई, "लाल चूड़ी दस की, लाल चूड़ी दस की।"
मेले में हाँक सुनने की आदत होती है। दस-बारह सिर एक साथ उधर घूम गए। कोई दाम पूछने लगा, कोई सिर्फ़ देखने लगा। आदमी की पकड़ ढीली पड़ी। सरोज ने लड़की को अपनी तरफ़ खींच लिया। जब उसने दोबारा नज़र उठाई, वह आदमी भीड़ में कहीं नहीं था।
वह लड़की को गोद में उठाकर अपनी दुकान लौट चली। रास्ते भर लड़की उसके कंधे पर सिर रखे रही और एक बार भी नहीं रोई। मोड़ पर वह औरत मिल गई, जो उलटी दिशा में दौड़ती आ रही थी और जिसका दुपट्टा गले में उलझ गया था। उसने बेटी का नाम पुकारा। चंपा।
सरोज तख़्ते पर लौटी तो ट्रे वैसी ही रखी थीं। नीचे की टोकरी ख़ाली थी। रात भर का गल्ला उसी में था। बिसराम ने कहा कि वह एक ग्राहक को माल दिखा रहा था और उसकी पीठ इधर थी। सरोज ने जवाब में सिर हिला दिया। उस आदमी को उसने दोबारा नहीं देखा, न उस रात, न कभी।
अगले बरस भी वह उसी मेले में गई। दुकान इस बार छोटी थी, तख़्ता नीचा था, और ट्रे सोलह की जगह ग्यारह। लाल चूड़ियाँ उसने फिर सबसे आगे रखीं।