शाम के पौने आठ बजे वह आदमी काउंटर पर आया और पर्चा सरका दिया। रुखसाना ने पर्चा देखा, फिर दराज़ खोली और नींद की गोलियों का पत्ता निकाल दिया। आदमी ने पैसे गिनकर रखे। वह कभी मोल-भाव नहीं करता था।
रुखसाना की दुकान भोपाल में इब्राहिमपुरा की उस गली में थी, जहाँ शाम को सब्ज़ी वाले ठेले लग जाते हैं और आठ बजे के बाद गली ख़ाली हो जाती है। जून की उन शामों में सात बजे तक लू चलती रहती थी, इसलिए मोहल्ले के लोग अँधेरा उतरने के बाद ही घरों से निकलते थे। दुकान छोटी थी। उसने यह दुकान अपने अब्बा से ली थी और नौ साल से अकेली चला रही थी।
उसे तारीख़ें याद रखने की आदत थी। यह आदत दवा के धंधे में काम आती है। इसी आदत से उसे एक दिन ध्यान आया कि वह आदमी हर ग्यारहवें दिन आता है। कभी दसवें दिन नहीं, कभी बारहवें दिन नहीं।
कड़ी से कड़ी जुड़ी
पर्चा हर बार एक जैसा होता था। वही डॉक्टर की मुहर, थोड़ी टेढ़ी, बाईं तरफ़ को झुकी हुई। बाक़ी सब काली स्याही में और तारीख़ नीली स्याही में। मरीज़ का नाम भी वही रहता था। कमला देवी, उम्र इकहत्तर साल।
एक दोपहर एक बूढ़ी औरत दुकान पर आईं। उन्होंने घुटने के दर्द का मरहम माँगा और पर्स से खुल्ले पैसे निकालने लगीं। रुखसाना ने नाम पूछा तो उन्होंने कहा, कमला देवी। रुखसाना ने मरहम पकड़ाते हुए पूछा कि नींद की गोली से आराम मिल रहा है या नहीं।
बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ़ देखा। "कौन सी गोली, बेटा?" उन्होंने पूछा। "मैं तो नींद की कोई दवा नहीं खाती। मुझे तो वैसे ही नींद बहुत आती है आजकल। दिन में भी आ जाती है।"
वे चली गईं, और रुखसाना काउंटर के पीछे खड़ी रह गई। उसे लगा कि गली का शोर कहीं दूर चला गया है। उसने दराज़ से पुराने पर्चे निकाले। उसके अब्बा कहते थे कि पर्चा कभी मत फेंकना। उसने कभी नहीं फेंका था।
तेईस पर्चे थे। उसने तारीख़ें एक कागज़ पर लिखीं और गिनीं। ग्यारह, ग्यारह, ग्यारह, और एक बार भी चूक नहीं। फिर उसने मुहर वाले डॉक्टर का नाम पढ़ा और उसे याद आया कि वह क्लिनिक तीन साल पहले बंद हो चुका है। वह ख़ुद वहाँ मरीज़ भेजा करती थी।
जो सबूत सामने नहीं था
रात को उसे नींद नहीं आई। सुबह उसने दूध वाले से बात की, जो उसी मोहल्ले में जाता था। दूध वाले ने बताया कि कमला देवी का मकान उनके नाम है, बेटा नरेश उसी में रहता है, और महीने में तीन-चार बार बैंक वाला आदमी स्कूटर लेकर आता है। कागज़ पर दस्तख़त होते हैं।
रुखसाना ने कागज़ फिर से देखा। बैंक वाले के आने के दिन और गोली वाले दिन एक ही थे। कमला देवी को उन दिनों गहरी नींद आती थी। और उन दिनों उनके अँगूठे का निशान कागज़ पर लग जाता था।
उसी शाम नरेश दुकान पर आया, लेकिन पौने आठ बजे नहीं। वह साढ़े आठ बजे आया, जब गली ख़ाली थी। उसने पर्चा नहीं निकाला। उसने काउंटर पर दोनों हाथ रखे और कहा कि उसे पता चला है कि रुखसाना उसकी अम्मा से बातें कर रही थी।
"अकेली औरत की दुकान है," उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "लाइसेंस वगैरह का चक्कर बड़ा लंबा होता है। एक शिकायत भर से दुकान छह महीने बंद रहती है।" वह मुस्कुरा रहा था। रुखसाना ने काउंटर के नीचे रखा लोहे का पैमाना पकड़ लिया, फिर छोड़ दिया।
नरेश ने कहा कि कल ग्यारहवाँ दिन है और उसे दवा चाहिए। रुखसाना ने कहा कि पर्चा पुराना है और डॉक्टर से दुबारा लिखवाना पड़ेगा। नरेश कुछ देर खड़ा रहा। फिर वह चला गया, और जाते हुए उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया।
सारी रात रुखसाना यही सोचती रही कि उसका इससे क्या लेना-देना है। दुकान उसकी है। अब्बा की है। इकलौती है। वह अपने आप को समझाती रही कि जिस मोहल्ले में लोग अपने सगे बेटे के ख़िलाफ़ मुँह नहीं खोलते, वहाँ एक दुकानदार औरत के बोलने का कोई मतलब नहीं निकलेगा, और नुक़सान सिर्फ़ उसी का होगा। सुबह उसने दुकान खोली, दस मिनट बैठी, फिर शटर गिराया और ताला लगा दिया।
कमला देवी के मकान का दरवाज़ा खुला था। बैठक में बैंक वाला आदमी बैग खोले बैठा था और मेज़ पर तीन कागज़ रखे थे। नरेश स्याही की डिबिया लिए खड़ा था। कमला देवी सामने कुर्सी पर बैठी थीं, और वे जागी हुई थीं।
रुखसाना दरवाज़े पर रुक गई। उसने कुछ नहीं कहा। कमला देवी ने उसे देखा, फिर मेज़ पर रखे कागज़ों को देखा, फिर अपने बेटे को। "इसमें लिखा क्या है?" उन्होंने पूछा। नरेश ने कहा कि बस दस्तख़त की बात है। कमला देवी ने अपना हाथ पीछे कर लिया और कहा कि पहले कोई पढ़कर सुनाए।
सावन लग चुका था जब कमला देवी दुबारा दुकान पर आईं। वे अकेली आई थीं और घुटने का वही मरहम लिया। पैसे उन्होंने बहुत धीरे-धीरे गिने, एक-एक सिक्का काउंटर पर रखते हुए, जैसे गिनती में देर लगाने से बातचीत थोड़ी और खिंच जाएगी। फिर वे गली पार करके उस तरफ़ चली गईं, जहाँ बारिश के बाद की धूप पड़ रही थी, और रुखसाना शटर के पास खड़ी उन्हें जाते हुए देखती रही।