अनवरी का काम रोज़ सुबह आठ बजे एक नाप लेना था।

ब्लॉक कार्यालय के अहाते में वर्षामापी लगा है। एक पीतल का सिलेंडर, ज़मीन में गड़ा हुआ, और उसके भीतर एक बोतल। सुबह आठ बजे बोतल निकालो, नापने वाले गिलास में उँडेलो, मिलीमीटर पढ़ो, रजिस्टर में लिखो, बोतल वापस रखो।

इसमें चार मिनट लगते हैं और अनवरी यह नौ बरस से कर रही थी।

उन नौ बरसों में वह चार बार नहीं जा पाई। दो बार बीमारी में, एक बार बेटे की शादी में, और एक बार तब जब उसकी माँ गुज़री थीं। चारों बार उसने किसी और से नाप लिवाई और चारों बार उसने बाद में जाकर ख़ुद जाँचा कि बोतल ठीक से रखी गई थी या नहीं। यह उसकी सनक मानी जाती थी।

यह काम मामूली लगता है और नहीं है।

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फ़सल बीमा का पैसा उसी नाप से तय होता है। किसान का अपना खेत कितना सूखा, इससे किसी को मतलब नहीं। ब्लॉक की बारिश अगर सामान्य से बीस प्रतिशत कम हो, तो पूरे ब्लॉक का दावा बनता है। न हो, तो किसी का नहीं बनता।

वह नाप एक ही जगह से आती है और उस जगह पर अनवरी खड़ी होती है।

उस बरस बारिश कम थी। यह किसी को बताने की ज़रूरत नहीं थी।

जुलाई में धान की रोपाई दो हफ़्ते पिछड़ी। अगस्त में दो हफ़्ते बिलकुल सूखे गए। सितंबर में कुछ हुआ, पर देर से हुआ और उससे कुछ नहीं बना।

अक्तूबर में जब आँकड़े गए, तो ब्लॉक की बारिश सामान्य से नौ प्रतिशत कम निकली।

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नौ पर कुछ नहीं मिलता। एक रुपया भी नहीं।

किसान कार्यालय आए और उन्होंने वही किया जो किया जाता है। शोर, फिर काग़ज़, फिर एक अर्ज़ी। किसी ने अनवरी पर उँगली नहीं उठाई, क्योंकि आँकड़े ऊपर से तय होते हैं, ऐसा सबका ख़याल था।

एक आदमी ने ज़रूर एक बात कही और वह चलते-चलते कही। उसने कहा कि उसके खेत में इस बरस मेड़ें फटी हुई हैं और काग़ज़ कह रहा है कि बारिश ठीक हुई, तो या तो काग़ज़ झूठा है या उसका खेत झूठा है। यह कहकर वह चला गया। अनवरी ने उसे रोका नहीं। उसे रोकने का कोई मतलब भी नहीं था, क्योंकि जवाब उसके पास नहीं था।

अनवरी ने उस हफ़्ते अपने रजिस्टर के पिछले बरस निकाले।

वह यह देखना चाहती थी कि नौ प्रतिशत कहाँ से आया, क्योंकि उसे ख़ुद यह ज़्यादा लग रहा था।

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जो उसे मिला वह यह था। पिछले तीन बरसों में उसकी नापें आसपास के दो ब्लॉकों से हमेशा थोड़ी ज़्यादा रहीं। थोड़ी, यानी छह से नौ प्रतिशत।

उससे पहले के बरसों में ऐसा नहीं था। एक बार भी नहीं।

तीन बरस पहले कार्यालय की नई इमारत बनी थी। यही तारीख़ थी।

पुरानी इमारत अहाते के उत्तर में थी। नई दक्षिण में बनी और उसी वक़्त वर्षामापी उखाड़कर दोबारा गाड़ा गया, क्योंकि वह नींव के रास्ते में आ रहा था।

नई जगह इमारत की दीवार से नौ फुट दूर है। सिर्फ़ नौ।

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वर्षामापी के लिए नियम है कि उसके चारों तरफ़ इतनी खुली जगह हो जितनी आसपास की सबसे ऊँची चीज़ की ऊँचाई का दोगुना। नई इमारत बारह फुट ऊँची है।

अनवरी को यह नियम मालूम नहीं था। उसे नाप लेना सिखाया गया था, जगह चुनना नहीं।

जो हो रहा था, वह यह था। नई इमारत की छत ढलवाँ है और उसका पानी दक्षिण की तरफ़ गिरता है, और गिरते हुए हवा उसका छींटा वर्षामापी की तरफ़ ले जाती है। हर बारिश में थोड़ा-सा ज़्यादा।

तीन बरस से रजिस्टर में जो लिखा जा रहा था, वह ग़लत था और उसे अनवरी ने लिखा था।

अब यह उसका मामला बन चुका था।

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दावे की तारीख़ पंद्रह नवंबर थी। जाँच बैठाने की अर्ज़ी उससे पहले जानी थी और उस अर्ज़ी में यह लिखना पड़ता कि तीन बरस के आँकड़े ग़लत हैं।

इसका सीधा मतलब यह था कि नौ बरस से जो औरत रोज़ आठ बजे नाप लेती है, उसी के दस्तख़त तीन बरस से ग़लत काग़ज़ों पर हैं।

उसने पहले नापा। अर्ज़ी बाद में लिखी।

उसने पुरानी जगह पर, जहाँ अब सिर्फ़ एक गोल निशान बचा है, दूसरा सिलेंडर गड़वाया। यह उसने अपने पैसे से करवाया, क्योंकि माँगने में वक़्त लगता।

फिर वह ग्यारह दिन रोज़ आठ बजे दोनों नापती रही।

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ग्यारह में से चार दिन बारिश हुई। चारों दिन नई जगह वाला ज़्यादा निकला।

फ़र्क़ औसतन आठ प्रतिशत का था।

आठ प्रतिशत सुनने में छोटा है। उस बरस का हिसाब इस तरह बैठता है कि नौ और आठ मिलकर सत्रह होते हैं और सीमा बीस की है, इसलिए ठीक करने पर भी उस बरस का दावा नहीं बनता। यह भी अनवरी ने ख़ुद जोड़ा और इसके बाद उसने कुछ देर तक अर्ज़ी नहीं लिखी।

उसने अर्ज़ी भेज दी। उसमें अपना नाम लिखा।

जाँच हुई। वर्षामापी अगले बरस पुरानी जगह पर वापस गाड़ा गया और मामला वहीं ख़त्म हो गया, क्योंकि किसी को इसमें दिलचस्पी नहीं थी। अनवरी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और उसे कुछ मिला भी नहीं।

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उस बरस के दावे नहीं बने। पुराने आँकड़े दोबारा नहीं खोले जाते।

अगला बरस भी सूखा गया। उससे भी ज़्यादा।

इस बार नाप सही जगह से ली गई और वह ईमानदारी से ली गई और उसमें कोई ग़लती नहीं थी।

बारिश सामान्य से अठारह प्रतिशत कम रही। सीमा बीस की है।