नहर पर पानी छोड़ने का वक़्त तय रहता है और शिवराज को वह ज़बानी याद था।
वह नहर विभाग में था, सबसे नीचे वाले दर्जे पर। उसका काम पुल के पास वाले फाटक तक जाना, चढ़ी हुई चाबी घुमाना, और रजिस्टर में समय लिखना था। इसके अलावा उसका एक और काम था जो किसी काग़ज़ में नहीं लिखा।
वह लड़कों को पुल से भगाता था। रोज़।
गर्मियों में उस पुल पर हर दोपहर आठ-दस लड़के रहते थे। खेल यह था कि कौन ऊपर से कूदकर सबसे देर तक नीचे रहता है।
पुल की ऊँचाई पानी से चौदह फुट है और नहर की गहराई उस जगह आठ फुट। यह ख़तरनाक नहीं है, अगर पानी उतना ही रहे।
पानी उतना नहीं रहता। कभी नहीं।
ऊपर बैराज से जब पानी छोड़ा जाता है, तो उस पुल तक पहुँचने में उसे लगभग चालीस मिनट लगते हैं। पहुँचने पर गहराई आठ से बारह हो जाती है और यह ठीक है। जो ठीक नहीं है वह धार है। धार उस मोड़ पर दीवार से टकराकर घूमती है और नीचे खिंचाव बनाती है।
डूबने वाला उसमें ऊपर नहीं आ पाता, इसलिए नहीं कि वह तैरना नहीं जानता, बल्कि इसलिए कि वह जिस तरफ़ तैरता है उस तरफ़ पानी उसे नहीं जाने देता।
शिवराज ने यह बात लड़कों को कई बार कही थी।
उसने एक बार करके भी दिखाया था। उसने एक ख़ाली प्लास्टिक का डिब्बा, जिसमें आधा पानी भरा था, पानी छूटने के बाद उसी मोड़ पर डाला। डिब्बा नीचे गया और तीस क़दम आगे जाकर ऊपर आया।
लड़कों को यह अच्छा लगा। उन्होंने तालियाँ बजाईं और अगले दिन फिर आए।
यह उनकी बेवक़ूफ़ी नहीं है। तेरह-चौदह बरस की उम्र में ख़तरे का मतलब यह होता है कि कुछ हो सकता है, और उस उम्र में हो सकता है का मतलब निकलता है कि शायद नहीं होगा।
लड़के सुनते थे और अगले दिन फिर वहीं होते थे। उन्हें छोड़ने का वक़्त भी मालूम था। पानी सुबह नौ बजे छूटता था और साढ़े नौ तक पुल पर पहुँच जाता था, इसलिए वे दोपहर में आते थे, जब सब निकल चुका होता है।
यह हिसाब सही था और सात बरस से चल रहा था।
उस बरस जेठ में हिसाब बदल गया।
ऊपर के ज़िले में बिजली का काम चल रहा था और उसकी वजह से बैराज पर पंप का समय बदला। छोड़ने का समय सुबह नौ से हटाकर दोपहर दो कर दिया गया।
इसकी सूचना विभाग के भीतर गई। चिट्ठी उपखंड कार्यालय तक पहुँची और वहाँ से आगे उसी दिन नहीं गई, क्योंकि जिस बाबू को भेजनी थी वह छुट्टी पर था।
शिवराज को यह उसी दिन दोपहर सवा एक बजे मालूम हुआ, और फ़ोन पर मालूम हुआ, और बताने वाले ने बात करते-करते बताया।
पानी दो बजे छूटना था। पुल पर पहुँचने में चालीस मिनट। यानी दो चालीस।
लड़के दो बजे से पुल पर होते हैं।
शिवराज उस वक़्त फाटक पर था और फाटक पुल से चार किलोमीटर दूर है।
बीच का रास्ता नहर की पटरी वाला है और वह कच्चा है। जेठ में वह सूखा रहता है और उस पर साइकिल चलती है, पर उस पर तेज़ नहीं चलती, क्योंकि पहिया रेत में बैठता है।
उसके पास साइकिल थी।
पहला ख़याल फ़ोन का आया और वह ठीक ख़याल था। उस बस्ती में फ़ोन एक ही जगह था, राशन की दुकान पर, और वह नंबर उसके पास नहीं था। जिनके पास था, उनमें से किसी ने उठाया नहीं। दोपहर में दुकान बंद रहती है।
उसने साइकिल उठाई। और कोई रास्ता नहीं था।
चार किलोमीटर में उसे इक्कीस मिनट लगे और उन इक्कीस मिनटों में उसने एक बात सोची, जो उसे बाद में भी याद रही। वह यह कि अगर वह पहुँच गया और लड़के वहाँ नहीं हुए, तो उसे कभी पता नहीं चलेगा कि उसने कुछ बचाया या नहीं।
वह दो बजकर छब्बीस पर पहुँचा। चौदह मिनट बचे थे।
पुल पर दो लड़के थे। सिर्फ़ दो।
बाक़ी नहीं थे, और इसकी वजह उस दिन का बाज़ार था। बृहस्पतिवार को पास के क़स्बे में हाट लगती है और आधी बस्ती उधर चली जाती है।
दोनों में से एक उस वक़्त पानी में था।
शिवराज ने उसे चिल्लाकर बाहर निकाला और दूसरे को पुल से उतारा और दोनों को पकड़कर किनारे से हटा दिया।
पानी दो बजकर बयालीस पर आया। दो मिनट देर से।
उन्होंने उसे आते हुए देखा। पहले नहर का पानी हिला, फिर किनारे की घास बैठी, और फिर सतह ऊपर उठ गई।
दोनों लड़के डरे नहीं। उन्हें यह अच्छा लगा, क्योंकि पानी आते हुए देखना अपने आप में देखने लायक़ चीज़ है और वे इतने पास से पहले कभी नहीं देख पाए थे।
शाम को शिवराज ने बस्ती में जाकर बताया कि समय बदल गया है।
बस्ती नाराज़ हुई। नाराज़गी उस पर नहीं थी, विभाग पर थी, और वह जायज़ थी। दो-तीन लोग अगले दिन उपखंड कार्यालय भी गए।
नई सूचना दो हफ़्ते बाद काग़ज़ पर आई। तब तक विभाग ने समय दोबारा बदलकर सुबह कर दिया था।
अगली गर्मी में लड़के फिर उसी पुल पर थे और उसी वक़्त पर थे।
शिवराज को इससे हैरानी नहीं हुई। होनी भी नहीं चाहिए थी।
उन दो में से एक अब उसी फाटक पर है। शिवराज पाँच बरस पहले सेवानिवृत्त हो गया।
चाबी वही है और रजिस्टर वही है। पुल से लड़कों को भगाने वाला काम अब भी किसी काग़ज़ में नहीं लिखा है।