प्लांट रूम में बात करना मुश्किल है, इसलिए वहाँ कोई बात नहीं करता। मुरारी अंदर घुसा, दोनों कंप्रेसरों के सामने से गुज़रा और सक्शन का गेज देखा। सुई वहीं थी जहाँ उसे नहीं होना चाहिए था। उसने कान लगाया। बड़े वाले की आवाज़ में वह भारीपन नहीं था जो जून में होना चाहिए। अमोनिया की हल्की गंध हमेशा की तरह थी, न कम न ज़्यादा।

फ़र्रुख़ाबाद के उस शीत गृह में चार चैंबर थे और काग़ज़ पर साठ हज़ार बोरे की जगह थी। मुरारी वहाँ बीस साल से प्लांट देख रहा था। बंसल मालिक था। उससे पहले उसके पिता मालिक थे, और मुरारी दोनों के साथ काम कर चुका था।

आलू मरा हुआ नहीं होता। बोरे में बंद रहकर भी वह साँस लेता है और साँस लेने में गरमी छोड़ता है। इसीलिए भरा हुआ चैंबर ठंडा होने में वक़्त लेता है और आधा भरा चैंबर जल्दी बैठ जाता है। मुरारी को किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कंप्रेसर कितनी देर चलता है, इसी से उसे अंदाज़ा हो जाता था कि भीतर कितना माल है।

उस साल फ़रवरी में भराई सामान्य से ज़्यादा हुई। बंसल ने किसानों को जगह दी, दलालों को दी, और दो दिन तो ट्रैक्टर रात दो बजे तक लगे रहे। किसी को इसमें कुछ बुरा नहीं लगा। जगह मिलना अच्छी बात है, और जिसे जगह मिल जाए वह यह नहीं पूछता कि और किसे मिली।

जून में चैंबर दो ठंडा होना बंद कर दिया। मुरारी ने थर्मोस्टेट बदला। फिर सेंसर बदला। फिर उसने कंडेंसर की सफ़ाई कराई और पंखे की बेल्ट कसी। इसके बाद भी तापमान वहीं का वहीं रहा, और कंप्रेसर लगातार चलता रहा, जैसे वह ठंडक भीतर डाल रहा हो और भीतर उसे ले ही नहीं रहा हो।

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उसने बंसल को बिजली का बिल दिखाया, जो पिछले जून से इकतालीस हज़ार ज़्यादा था। बंसल ने बिल देखा। उसे रख दिया। बीस साल में यह पहली बार था। बिल पर बंसल हमेशा लड़ता था, कभी मुरारी से, कभी विभाग से, और एक बार तो उसने पूरा दिन इसी में लगा दिया था।

जुलाई में मुरारी चैंबर दो के भीतर गया। तह दर तह बोरे लगे थे। ऊपर तक। लकड़ी की पट्टियों के बीच हवा के लिए जो जगह छोड़ी जाती है, वह इस बार छोड़ी ही नहीं गई थी। हर ख़ाली जगह में बोरे ठूँसे हुए थे। ठंडी हवा को भीतर घुसने का रास्ता नहीं मिल रहा था, इसलिए बाहर की परतें ठंडी थीं और भीतर वाली गरम।

और तब उसे पूरा हिसाब समझ आया। साठ हज़ार की जगह में अड़सठ हज़ार की पर्चियाँ कट चुकी थीं। यह इस साल की बात नहीं थी। यह हर साल होता था, और हर साल चल जाता था, क्योंकि अगस्त तक भाव चढ़ते हैं और पाँच में से एक किसान अपना माल निकालकर बेच देता है। जगह अपने आप बन जाती है और गरमी निकल जाती है।

उस साल भाव नहीं चढ़े। अगस्त में वही रहे। सितंबर में गिर गए। किसी ने माल नहीं निकाला। सब यही सोचकर बैठे रहे कि दिवाली तक कुछ बनेगा, और भीतर तह दर तह बोरों के बीच जो गरमी थी, वह वहीं रही।

मुरारी ने यह सब कल नहीं जाना था। पर्चियाँ हर साल उसके सामने कटती थीं और वह हर साल उसी माल को ठंडा करता था। वह इसमें था। यह बात उसने ख़ुद से कभी छिपाई नहीं और किसी और से कभी कही भी नहीं।

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अठारह सितंबर, इतवार। वह दोपहर में प्लांट रूम गया। चैंबर दो का सेट पॉइंट बदला हुआ था। दो डिग्री से हटाकर सात कर दिया गया था और लॉगबुक में उस दिन की लाइन किसी और की लिखावट में भरी थी। सात डिग्री पर चार दिन में जो होता है उसे कोई भी देखकर बता देता है, और उसके बाद कोई पर्ची या हिसाब देखने नहीं बैठता। ख़राब माल ख़राब माल होता है और उसकी वजह प्लांट होती है।

उसने सेट पॉइंट वापस दो पर कर दिया। फिर वह ताला लगाकर बाहर निकला और साइकिल उठाई। शाम पाँच बजे से रात ग्यारह बजे तक वह उन गाँवों में गया जिनका माल चैंबर दो में था। कमालगंज, नवाबगंज, और नहर के उस पार तीन और। उसने हर जगह एक ही बात कही। कल आ जाओ, सुबह ही आ जाओ, और सब एक साथ आना।

सोमवार को गेट पर तीन सौ से ऊपर लोग थे और उनतीस ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ थीं। बंसल ने पहले दो घंटे यही कहा कि निकासी की तारीख़ आगे की है। साढ़े ग्यारह बजे किसी ने चैंबर का दरवाज़ा खुलवा लिया। बाहर की परत के बोरे ठीक निकले। तीसरी तह के बाद से जो निकलना शुरू हुआ वह काला था और उसकी गंध गेट तक गई।

उसके बाद जो हुआ वह मुरारी के हाथ में नहीं था। मुक़दमा हुआ, शीत गृह सील हुआ, और दो साल बाद किसानों को उनके नुक़सान का लगभग चालीस पैसे प्रति रुपया मिला। बंसल पर मामला अब भी चल रहा है और उसकी तारीख़ें पड़ती रहती हैं। वह शीत गृह दोबारा नहीं खुला।

मुरारी इक्यावन का था। उसे एक ही काम आता था। ज़िले में तीन और शीत गृह हैं और तीनों में मालिक आपस में जानते हैं। किसी ने उसे नहीं रखा, और किसी ने वजह भी नहीं बताई। जाड़ों में उसे बर्फ़ की फ़ैक्ट्री में काम मिल गया, जहाँ एक ही छोटा प्लांट है, कम तनख़्वाह है, और आवाज़ हर रोज़ एक जैसी रहती है।

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शीत गृह की ज़मीन बिक गई और उस पर एक मैरिज लॉन बन गया, जिसका फ़र्श वही पुराना फ़र्श है। मई में वहाँ रोज़ शादियाँ होती हैं और बर्फ़ की सिल्लियाँ जाती हैं, और मुरारी ही लेकर जाता है। सिल्ली रखने के लिए वह हमेशा वही कोना चुनता है, क्योंकि पानी वहीं इकट्ठा नहीं होता। फ़र्श का ढाल अब भी उसी नाली की तरफ़ है।