छपरा में लगन के मौसम में सुभाष के पास सोने का वक़्त नहीं होता था। वह शादियों की वीडियो बनाता था, अकेले, एक कैमरे और एक तिपाई के साथ। बीस साल में उसने गिनना छोड़ दिया था कि कितनी शादियाँ। पर एक चीज़ वह हर शादी में एक जैसी करता था। वह द्वार पर पूरे दस मिनट कैमरा टिकाकर रखता था।

इसकी वजह पैसे वाली थी। घरवाले बाद में वीडियो इसीलिए देखते हैं कि कौन आया और कौन नहीं आया। जो नहीं आया, उसकी बात साल भर होती है। सुभाष यह जानता था और इसलिए द्वार वाला हिस्सा वह कभी नहीं काटता था, चाहे बाक़ी कितना भी काटना पड़े।

फागुन में एक शादी की एडिटिंग करते हुए उसे एक चेहरा जाना-पहचाना लगा। हरे कुरते वाला अधेड़ आदमी, कंधे पर शॉल, जो द्वार पर रुककर किसी से हाथ मिलाता है। सुभाष ने आगे बढ़ा दिया। दो दिन बाद, दूसरी शादी की फ़ुटेज में, वही आदमी था। दूसरा कुरता, वही शॉल।

कड़ी से कड़ी जुड़ी

दोनों परिवारों का आपस में कोई रिश्ता नहीं था। एक बनिया परिवार था, एक राजपूत। एक शादी सिवान में हुई थी, दूसरी छपरा में। सुभाष ने पुरानी हार्ड डिस्क निकाली और पीछे जाना शुरू किया।

तीन साल में वह आदमी नौ शादियों में था। हर बार द्वार पर, हर बार पहले घंटे में, और हर बार अकेले नहीं। उसके साथ दो और चेहरे बार-बार आते थे, एक औरत और एक लड़का। तीनों कभी खाने की पंगत में नहीं दिखते थे। सुभाष ने यह भी देखा कि तीनों में से कोई भी कभी सीधे कैमरे की तरफ़ नहीं देखता।

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उसने उन नौ परिवारों में से चार को फ़ोन किया, बहाने से, कि पुरानी फ़ाइल का बैकअप चाहिए। बातचीत में उसने पूछा कि शादी में कोई गड़बड़ तो नहीं हुई थी। चारों घरों में कुछ न कुछ गया था। एक जगह नक़दी का लिफ़ाफ़ा, एक जगह गहनों की डिबिया, दो जगह मोबाइल और घड़ियाँ। चारों ने पुलिस में नहीं लिखवाया था। शादी में चोरी की रिपोर्ट लिखवाने से रिश्ता ख़राब होता है, क्योंकि शक हमेशा किसी अपने पर जाता है।

सुभाष के पास अब नौ शादियों की फ़ुटेज थी और उसमें एक चेहरा था। यह अदालत में क्या होता, उसे नहीं मालूम था। पर उसे इतना मालूम था कि उसका काम भरोसे पर चलता है। वीडियो वाला घर के भीतर तक जाता है, औरतों के कमरे तक, गहने पहनते वक़्त तक। जिस दिन उसने किसी बारात के मेहमान पर उँगली उठाई, उस दिन के बाद उसे कोई अंदर नहीं बुलाएगा।

बैसाख में एक बड़ी शादी थी। तीन भाइयों के घर की, एक साथ, एक ही पंडाल में। छह सौ लोग। सुभाष को यह काम पंद्रह हज़ार में मिला था, जो उसका उस साल का सबसे बड़ा काम था। और यह वैसी ही शादी थी जैसी बाक़ी नौ थीं। भीड़ भरी, मिली-जुली, जहाँ कोई किसी से नहीं पूछता कि आप किधर से हैं।

जो सबूत सामने नहीं था

थाने में वह गया। दारोगा ने फ़ुटेज देखी, दो मिनट, और पूछा कि आदमी का नाम क्या है। सुभाष ने कहा कि नाम नहीं मालूम। दारोगा ने पूछा कि किस केस में। सुभाष ने कहा कि कोई केस दर्ज नहीं है। इस पर दारोगा ने कहा कि शादी में बुला लेना, देख लेंगे, और चाय के लिए पूछा।

सुभाष घर लौटा और रात भर फ़ुटेज देखता रहा। नौ शादियाँ। एक ही चेहरा। इसके अलावा उसके पास कुछ नहीं था। दारोगा ग़लत नहीं था। चेहरा सबूत नहीं होता।

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शादी के दिन सुभाष ने अपनी तिपाई द्वार पर लगाई, हमेशा की तरह। फिर उसने वह किया जो उसने पहले कभी नहीं किया था। पंडाल वाले से उसने वह बड़ा परदा माँगा जो आम तौर पर स्टेज के पीछे लगता है, और उसे द्वार के सामने लगवाकर उस पर कैमरे का सीधा प्रसारण चला दिया। जो भी भीतर आता, वह ख़ुद को नौ फ़ुट के परदे पर देखता।

लोगों को यह अच्छा लगा। बच्चे परदे के आगे कूदते रहे और औरतें रुककर आँचल ठीक करती रहीं। द्वार पर भीड़ लगी रही और पूरे तीन घंटे लगी रही। हरे शॉल वाला आदमी उस शाम पंडाल के बाहर तक आया। सुभाष ने उसे परदे के किनारे पर एक झलक देखा, बस एक बार। वह भीतर नहीं आया।

उस शादी में कुछ नहीं गया। पर घर के बड़े बेटे को यह पसंद नहीं आया। उसने कहा कि शादी थी, तमाशा नहीं, और लोग यह पूछ रहे थे कि द्वार पर सिनेमा क्यों लगा है। पंद्रह हज़ार में से सुभाष को नौ मिले। बाक़ी पर बात नहीं हुई।

छपरा छोटी जगह है और बात फैलती है। अगले लगन में उसे चार काम मिले, पिछले साल ग्यारह मिले थे। लोग कहते हैं कि सुभाष अब कुछ अजीब करता है। किसी ने चोरी वाली बात नहीं की, क्योंकि वह बात किसी को मालूम ही नहीं है।

वह अब भी द्वार पर पूरे दस मिनट कैमरा टिकाता है। हार्ड डिस्क वह अब मिटाता नहीं, चाहे जगह कम पड़े। हरे शॉल वाला आदमी उसे तीन साल से किसी फ़ुटेज में नहीं दिखा। सुभाष हर शादी के बाद देखता ज़रूर है।