वररुचि नाम का वह आदमी विजयनगर में पंद्रह दिन से था। इस बीच उसने बाज़ार देखे थे, मंदिर देखे थे, पाठशालाएँ देखी थीं, और दरबार में वह माघ की एक सुबह पहली बार पहुँचा। आया वह किसी उत्तर के राज्य से था, अकेला, बिना दल-बल के। उमर पचास के आसपास थी और बोलते हुए वह हाथ बिलकुल नहीं हिलाता था।

उसने राजा कृष्णदेव के सामने एक कपड़े की पोटली खोली। उसमें तीन गुड़ियाँ थीं। लकड़ी की थीं, एक ही नाप की, एक ही रंग की, और इतनी एक जैसी कि उन्हें आगे-पीछे कर देने पर कोई नहीं बता सकता था कि पहले कौन सी कहाँ थी।

"इनमें से एक सबसे क़ीमती है," उसने कहा। "कौन सी, यह बता दीजिए। तीन दिन।"

राजा का सवाल

राजा ने पूछा कि अगर न बता पाए तो। वररुचि ने कहा कि तो कुछ नहीं, वे तीनों गुड़ियाँ लेकर लौट जाएँगे और आगे जहाँ भी जाएँगे यही सवाल रखेंगे। उसने यह बात बिना किसी धमकी के कही, और शायद इसीलिए वह चुभी।

तीसरे दिन तक का वक़्त था, इसलिए पहले दिन किसी को घबराहट नहीं हुई। पंडितों ने गुड़ियों को उठाकर बजाया, कान के पास ले जाकर हिलाया, और धूप में रखकर देखा कि कहीं कोई दरार तो नहीं है। फिर गुड़ियाँ तौली गईं। तीनों का वज़न बराबर निकला। नाप लिया गया, वह भी बराबर। सुनार बुलाया गया। उसने नीचे से ज़रा सा खुरचकर देखा और बताया कि लकड़ी तीनों में एक ही है।

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दूसरे दिन दरबार में लोग कम बोल रहे थे। इसकी एक वजह गुड़ियाँ थीं। दूसरी वजह पुरानी थी।

दो महीने पहले नागय्या नाम के एक दरबारी ने कर के एक फ़ैसले पर अपनी राय एक साथी से कही थी, अकेले में, चलते-चलते। वह बात उसी शाम राजा तक पहुँच गई थी। उसकी राय ग़लत भी नहीं थी और उसमें राजा के लिए कुछ बुरा भी नहीं था। बात सिर्फ़ इतनी थी कि वह अकेले में कही गई थी और किसी और की ज़बान से राजा तक पहुँची। नागय्या को कुछ कहा नहीं गया, कोई सज़ा नहीं हुई, बस अगले दिन से उसकी जगह अगली पंक्ति से हटकर पीछे कर दी गई। वह रोज़ दरबार में हाज़िर होता था और पीछे बैठता था।

उसके बाद दरबार की बातचीत बदल गई थी। लोग अब वही बोलते थे जो सबके सामने बोला जा सकता है, और बाक़ी वक़्त चुप रहते थे। यह चुप्पी सुविधाजनक थी और किसी को अच्छी नहीं लग रही थी। दरबार का काम पहले जैसा ही चल रहा था, फ़ैसले हो रहे थे, काग़ज़ बन रहे थे। बस अब किसी फ़ैसले से पहले कोई किसी से यह नहीं पूछता था कि तुम्हें क्या लगता है।

महल के बाहर

तीसरे दिन सुबह तेनालीराम ने एक चीज़ माँगी। सुनार के यहाँ से महीन तार, एक बालिश्त लंबा, इतना पतला कि कान में जा सके।

किसी ने पूछा कि तार का क्या करेंगे, और उन्होंने कहा कि अभी बताते हैं। दरबार उस सुबह भरा हुआ था, क्योंकि तीसरा दिन था और सबको मालूम था कि आज कुछ न कुछ होगा। तार आ गया। तेनालीराम ने पहली गुड़िया उठाई और तार उसके दाहिने कान में डाला। तार भीतर गया। बाएँ कान से निकल आया।

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उन्होंने दूसरी गुड़िया उठाई। तार दाहिने कान में गया। मुँह से बाहर आ गया।

तीसरी गुड़िया में तार कान से भीतर गया और बाहर कहीं नहीं निकला। तेनालीराम ने उसे उलटा किया, हिलाया, दोबारा डाला। तार भीतर ही रहा। उन्होंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया भी, और भीतर से कोई आवाज़ नहीं आई, जैसे तार वहाँ पहुँचकर रुक गया हो और उसे कहीं जाना ही न हो।

"यह सबसे क़ीमती है, जहाँपनाह," उन्होंने तीसरी गुड़िया राजा के सामने रख दी।

दरबार में किसी की आवाज़ नहीं निकली। वररुचि कुछ देर तीसरी गुड़िया को देखता रहा, फिर उसने सिर झुकाकर हाथ जोड़ लिए। उसने बहस नहीं की और यह उसकी सबसे अच्छी बात थी। जाते हुए उसने इतना ज़रूर कहा कि यह सवाल वह चार दरबारों में रख चुका है और जवाब उसे पहली बार मिला है।

राजा ने तेनालीराम से पूछा कि उनके दरबार में किस तरह के लोग ज़्यादा हैं।

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सवाल भारी था। दरबार में हर आदमी को यह मालूम था। पीछे की पंक्ति में नागय्या ने सिर नहीं उठाया।

"मैं दूसरी वाली गुड़िया हूँ, जहाँपनाह," तेनालीराम ने कहा। "जो कान में जाता है वह मुँह से निकल आता है। इसीलिए मैं विदूषक हूँ और मंत्री नहीं। बाक़ी लोगों का हिसाब आप ख़ुद लगा लीजिए, पर एक बात है। तीसरी गुड़िया सबसे क़ीमती है, और तीनों में सबसे कम बोलती भी वही है।"

दरबार हँसा और सवाल वहीं ख़त्म हो गया। नागय्या की जगह उस दिन भी नहीं बदली और अगले महीनों में भी नहीं बदली। तीनों गुड़ियाँ दरबार के बाएँ ताक में रख दी गईं और वहीं रहीं। उसके बाद बरसों तक जो भी नया आदमी दरबार में आता, उसे पहले दिन वह ताक दिखा दिया जाता था, और कोई उसे समझाता नहीं था।