राजगुरु अच्युत जब दरबार में आते थे तो एक ख़ास तरह की चुप्पी साथ आती थी। वह डर की चुप्पी नहीं थी और आदर की भी नहीं। वह उस तरह की चुप्पी थी जो तब होती है जब लोगों को मालूम हो कि कोई बात कहने लायक़ नहीं रह गई। किसी ने उन्हें कभी टोका नहीं। राजगुरु बीस बरस से उस पद पर थे और राजा की माँ के सारे संस्कार उन्हीं के हाथों हुए थे।
उनकी एक आदत थी। वे हर बात के आगे यह जोड़ देते थे कि यह उन्होंने स्वप्न में देखा है। ज़मीन का बँटवारा हो या मंदिर की मरम्मत, फ़ैसला उनके स्वप्न से निकलता था और उस पर बहस नहीं होती थी।
पूस की एक सुबह दरबार में सिंचाई की नहर पर बात हो रही थी। राजगुरु ने कहा कि नहर पूरब से जाएगी, क्योंकि उन्हें स्वप्न में यही दिखा है। बात सीधी थी।
दरबार का हुक्म
तेनालीराम ने हाथ जोड़कर कहा कि उन्हें भी कल रात स्वप्न आया था, और स्वप्न में राजगुरु जी आए थे, और उन्होंने बताया था कि नहर पश्चिम से जाएगी। फिर उन्होंने पूछा कि अब दो स्वप्नों में से किसे मानें, और क्या स्वप्नों की भी कोई वरिष्ठता होती है।
दरबार हँस पड़ा। हँसी छोटी थी और जल्दी बंद हो गई, पर वह हो चुकी थी।
राजगुरु ने कुछ नहीं कहा। वे उठे और चले गए। शाम को उनका आदमी राजा के पास संदेश लेकर आया। संदेश में एक ही बात थी। या तो वे रहेंगे या तेनालीराम।
कोंडय्या नाम का एक दरबारी बरसों से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था। उसने राजा से कहा कि बात अब हँसी की नहीं रही, राजगुरु का अपमान राज्य का अपमान है, और अगर इसे छोड़ दिया गया तो कल कोई किसी को नहीं छोड़ेगा। तीन और लोगों ने सिर हिलाया।
राजा फँस गए। रास्ता कोई नहीं था। उनकी माँ का वार्षिक श्राद्ध डेढ़ महीने बाद था और वह राजगुरु के बिना नहीं हो सकता था। उस रात उन्होंने किसी से बात नहीं की।
इनाम किसे मिला
अगली सुबह हुक्म निकला। तेनालीराम को मृत्युदंड।
ख़बर दोपहर तक शहर में पहुँच गई। उनके घर के बाहर कुछ देर भीड़ रही, फिर छँट गई, क्योंकि ऐसे मौक़ों पर भीड़ ज़्यादा देर नहीं टिकती। फिर सन्नाटा हो गया।
उन्होंने वे दिन बहुत सादे तरीक़े से गुज़ारे। उन्होंने किसी से सिफ़ारिश नहीं करवाई। दो लोगों का उधार चुकाया, एक आदमी से अपना उधार माँगा और न मिलने पर छोड़ दिया, और खेत का काम पड़ोसी को समझा दिया। काम निपट गया। पत्नी से उन्होंने इस बारे में एक बार भी बात नहीं की और वह भी चुप रही, और दोनों रात को देर तक जागते रहे।
पहरे पर वीरन्ना था, जो बीस साल से सिपाही था और जिसने तेनालीराम को हँसते हुए बहुत बार देखा था। वह दरवाज़े के बाहर बैठता था और भीतर देखने से बचता था। बीस साल की नौकरी में उसने ऐसा पहरा पहले कभी नहीं दिया था। तीसरे दिन उसने पूछ ही लिया कि क्या वे कुछ करेंगे। "क्या करूँ?" "आप कुछ न कुछ तो कर ही लेते हैं।" "इस बार सामने राजा हैं, वीरन्ना। और राजा ने कोई ग़लती नहीं की। उन्होंने वही किया जो उन्हें करना पड़ा।"
जिन लोगों ने उनके मज़ाक़ों पर सबसे ज़्यादा हँसा था, उनमें से कोई उन दिनों उनके घर नहीं आया। कोई नहीं आया। यह बात उन्होंने बाद में कभी किसी को ताने की तरह नहीं कही, पर उन्हें वे नाम याद रहे।
भोर ठंडी थी। सातवें दिन राजा ख़ुद आए, बिना किसी को बताए, दो सिपाहियों के साथ। उन्होंने कहा कि हुक्म वापस नहीं हो सकता, क्योंकि हुक्म भरे दरबार में दिया गया था और उसे पलटने का मतलब राजगुरु को हटाना होता। फिर उन्होंने कहा कि इतना वे कर सकते हैं कि मरने का तरीक़ा तेनालीराम ख़ुद चुन लें, और यह छूट लिखकर दे दी जाएगी।
तेनालीराम ने हाथ जोड़े और कहा, "बुढ़ापे से, जहाँपनाह।"
राजा कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर वे हँसे, और वह हँसी उस तरह की नहीं थी जो दरबार में आती है। हुक्म में लिखा था कि तरीक़ा तेनालीराम चुनेंगे, और लिखा हुआ लिखा हुआ था। बात यहीं तय हो गई।
राजगुरु ने इस पर आपत्ति नहीं की, क्योंकि आपत्ति करने का मतलब यह मान लेना था कि उन्हें सज़ा से मतलब था, न्याय से नहीं। कोंडय्या ने ज़रूर कोशिश की और उसे किसी ने आगे नहीं बढ़ने दिया। श्राद्ध डेढ़ महीने बाद ठीक समय पर हुआ और राजगुरु ने ही कराया। कोंडय्या को उसके बाद कोई बड़ा काम नहीं सौंपा गया, और इसकी वजह कभी किसी ने नहीं बताई।
तेनालीराम कुछ महीनों तक कम बोले। दरबार ने यह नोट किया और किसी ने इसका ज़िक्र नहीं किया। इसके बाद उन्होंने फिर मज़ाक़ करने शुरू कर दिए, पहले जैसे ही, बस एक फ़र्क़ के साथ। राजगुरु अच्युत पर उन्होंने ज़िंदगी में दोबारा कभी कोई मज़ाक़ नहीं किया, और दरबार में इसे सबने देखा और किसी ने कुछ नहीं कहा।