बाज़ार के उस कोने पर दही की तीन दुकानें थीं और तीनों का दही एक जैसा था। फ़र्क़ सिर्फ़ यह था कि सबसे किनारे वाली मटकी के पास एक लड़की बैठती थी, बारह-तेरह की, और उसका नाम गौरम्मा था। मटकी उसके बाप की थी और बाप दो बरस पहले चल बसा था। माँ घर पर दही जमाती थी और भोर में लड़की उसे उठाकर बाज़ार ले आती थी। बैसाख की दोपहरों में भी वह वहीं बैठी मिलती थी।
तेनालीराम हफ़्ते में दो बार वहाँ से गुज़रते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि लड़की से ज़रा मज़ाक किया जाए। उस दिन दरबार जल्दी उठ गया था और उनके पास वक़्त था, और ख़ाली वक़्त उन्हें कभी रास नहीं आया था।
उन्होंने एक कटोरी दही माँगा। गौरम्मा ने भर दिया। उन्होंने दाम पूछा और उसने बताया। उन्होंने आगे कहा कि उनके पास खुले पैसे नहीं हैं, बड़ा सिक्का है, और उससे यह दही ख़रीदा नहीं जा सकता क्योंकि बाक़ी लौटाने में उसका पूरा गल्ला चला जाएगा। यह बहाना वे पहले कई दुकानों पर आज़मा चुके थे और हर बार सामने वाला बहस पर उतर आया था।
एक अजीब शर्त
"तो रहने दीजिए," गौरम्मा ने कहा। "पर दही तो मैं ले चुका।" "कटोरी वापस रख दीजिए।" "कटोरी मेरी अपनी है।"
यह वह जगह थी जहाँ ज़्यादातर लोग उलझ जाते हैं। लड़की उलझी नहीं। उसने मटकी से एक और कटोरी निकाली, उसमें उतना ही दही डाला, और उसे तेनालीराम की कटोरी के बग़ल में रख दिया। यह सब करते हुए उसने न जल्दी की, न चेहरा बदला। ऐसे सवाल उसके सामने पहले भी आ चुके थे।
"अब दो कटोरी हो गईं," उसने कहा। "बड़े सिक्के में इतना ही आता है। बाक़ी नहीं लौटाना पड़ेगा।"
तेनालीराम को दो कटोरी दही नहीं चाहिए था और यह बात दोनों जानते थे। उन्होंने कहा कि इतना दही वे खा नहीं पाएँगे। "तो एक रख जाइए," गौरम्मा बोली। "शाम तक कोई न कोई आ ही जाएगा। दाम आपसे ले लिया, दही किसी और ने खाया। मेरा क्या घटा?"
बात में कोई कड़वाहट नहीं थी। वह हिसाब बता रही थी, बहस नहीं कर रही थी, और तेनालीराम ने ग़ौर किया कि यह फ़र्क़ बड़े-बड़े दरबारियों को नहीं आता। उन्होंने उस दिन दाम पूरा चुकाया और लौटते हुए दो बार पीछे मुड़कर देखा।
जब सब देख रहे थे
अगली बार उन्होंने दूसरा रास्ता लिया। कटोरी हाथ में लेते ही, चखने से पहले ही, उन्होंने कह दिया कि दही खट्टा है और वे इसका दाम नहीं देंगे। जल्दी इसलिए की ताकि लड़की के पास सोचने का वक़्त कम रहे।
गौरम्मा ने कटोरी उठाकर सूँघी, फिर एक चम्मच ख़ुद चखा, और सिर हिला दिया। "सही कह रहे हैं। आज का नहीं है, कल का है।" तेनालीराम रुक गए। "पर कल का दही कल के दाम पर मिलता है, आज के दाम पर नहीं। आपने आज का दाम पूछा था और मैंने कल का बताया था। आधा। गिनकर देख लीजिए।"
उन्होंने गिना। दाम सचमुच आधा था, और वह आधा उसने पहले दिन ही बता दिया था, जब उन्होंने ध्यान नहीं दिया था।
तीसरी बार जाने से पहले उन्होंने रास्ते भर सोचा। उन्होंने तय किया कि इस बार तर्क का इस्तेमाल नहीं करेंगे, हैसियत का करेंगे, क्योंकि तर्क में वे दो बार हार चुके थे। पहुँचकर उन्होंने कहा कि दही वे मुफ़्त में लेंगे, क्योंकि वे राजा के आदमी हैं और बाज़ार राजा का है।
गौरम्मा ने कटोरी भरी और आगे बढ़ा दी। मुफ़्त में। कुछ पूछा नहीं।
तेनालीराम ने पूरा दही पिया और फिर वहीं बैठ गए, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आया कि यह कैसे हुआ। "तुमने बहस क्यों नहीं की?" "आप राजा के आदमी हैं। बाज़ार राजा का है। तो मैं भी राजा की हूँ, और मेरा दही भी। राजा का आदमी राजा का दही ले गया। इसमें बहस क्या है?"
बाज़ार में उनके आस-पास लोग आते-जाते रहे और किसी ने यह नहीं देखा कि विजयनगर का सबसे तेज़ दिमाग़ एक दही की मटकी के सामने बैठा हुआ है। कुछ देर बाद उन्होंने जेब से पूरा दाम निकालकर मटकी के पास रख दिया, तीनों बार का, और तीनों दिन का हिसाब उन्हें ठीक-ठीक याद था।
दरबार में यह बात उन्होंने ख़ुद सुनाई। राजा कृष्णदेव ने पूछा कि यह उन्होंने बताया ही क्यों, जब किसी को मालूम नहीं था। "क्योंकि हारने की ख़बर आदमी ख़ुद न दे तो कोई और देता है, जहाँपनाह, और तब तक वह ख़बर बड़ी हो चुकी होती है।"
उस पर दरबार में ख़ूब हँसी हुई और बात आगे नहीं बढ़ी। पर दो दिन बाद राजा ने चुपचाप पता लगवाया कि लड़की कौन है और किस हाल में है। उन्होंने इसका ज़िक्र किसी से नहीं किया, और अगले महीने की एक सूची में एक छोटा सा नाम जुड़ गया जिसे किसी ने पढ़ा नहीं।
गौरम्मा अब भी उसी कोने पर बैठती है और अब उसके पास दो मटकियाँ हैं। दुकान बड़ी करने का पैसा कहाँ से आया, यह उसने कभी किसी को नहीं बताया। तेनालीराम अब भी हफ़्ते में दो बार वहाँ से गुज़रते हैं और अब मोल-भाव नहीं करते।