दशहरे की भीड़ में शहर में कौन आया और कौन गया, इसका हिसाब कोई नहीं रखता। स्वामी भैरवानंद उन्हीं दिनों आया। वह किसी के साथ नहीं आया। दो हफ़्ते तक उसने कुछ नहीं किया। वह नदी के घाट पर बैठा रहता था और लोगों से बात तक नहीं करता था, और शायद इसीलिए लोग उसके पास जाने लगे।
तीसरे हफ़्ते उसने पहली बार कुछ किया। घाट पर पंद्रह-बीस लोगों के सामने उसने अपनी झोली से एक छोटी घड़िया निकाली, उसमें कोयला भरा, ताँबे का एक सिक्का डाला, और आग सुलगा दी। घड़िया छोटी थी, हथेली में आ जाने लायक़, और उसका ढक्कन भी उसी मिट्टी का था। थोड़ी देर बाद उसमें से एक पीला धुआँ उठा। गंध तेज़ थी। लोग पीछे हट गए। धुआँ बैठने पर उसने घड़िया उलटी की, और उसमें से जो गिरा वह ताँबे का नहीं था।
बात शहर में उसी शाम फैल गई। अगली सुबह घाट पर दो सौ लोग थे। तीसरी सुबह और ज़्यादा।
जब पोल खुली
उसने किसी से कुछ माँगा नहीं। यही उसकी सबसे मज़बूत चाल थी। लोग ख़ुद देने लगे, इसलिए कि जो माँगता नहीं उस पर शक भी नहीं होता। किसी ने उसे टोका नहीं।
कामाक्षी उसी मोहल्ले में रहती थी जहाँ धोबी बैठते हैं। उसका पति नौ बरस से नहीं है और उसने अकेले दो बच्चे खड़े किए थे। बड़ी बेटी की शादी अगले साल थी और उसके लिए उसने नौ साल में जो जोड़ा था, वह एक कपड़े की गठरी में बँधा रखा था। उसमें चाँदी के कुछ सिक्के थे, दो पीतल के बरतन, और एक जोड़ी झुमके जो उसकी अपनी शादी के थे। गठरी भारी नहीं थी।
उसने वह गठरी घाट पर रख दी। स्वामी ने उसे छुआ भी नहीं। उसने गिना भी नहीं। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि माघ की पूर्णिमा के बाद वह जो लौटाएगा, उसे गिनने के लिए बड़ा बरतन लाना पड़ेगा।
बात दरबार तक पहुँची। मंत्री तिम्मन्ना ने उसे बुलाने का प्रस्ताव रखा और कहा कि अगर यह विद्या सच है तो राज्य को इससे बड़ा लाभ और क्या होगा। दरबार में इस पर आधा दिन बहस हुई, और बहस में सबसे ज़्यादा वही लोग बोले जिन्होंने घाट पर कुछ देखा ही नहीं था। राजा कृष्णदेव ने बुलावा भेज दिया।
स्वामी दरबार में आया और वही किया जो घाट पर करता था। घड़िया, कोयला, ताँबे का सिक्का। वही धुआँ। दरबार में जो निकला उसे सुनार ने कसौटी पर घिसकर जाँचा, फिर तौला, और दोनों बार सिर हिला दिया।
आख़िरी दाँव
तिम्मन्ना ने उसी दिन कोष से एक बड़ी रक़म का प्रस्ताव रख दिया, ताकि यह काम बड़े पैमाने पर हो सके। बहुत से लोगों ने हामी भरी। तेनालीराम कुछ नहीं बोले।
राजा ने उन्हें देखा और पूछा कि वे चुप क्यों हैं।
"एक छोटी सी बात है, जहाँपनाह," उन्होंने कहा। "स्वामी जी कल यही काम दोबारा कर दें। घड़िया रसोई से आएगी, कोयला भंडार से, और सिक्का मेरी जेब से। तीनों चीज़ें स्वामी जी आज पहली बार देखेंगे।"
उन्होंने यह बात इतनी सादगी से कही कि पहले किसी को इसमें कुछ लगा ही नहीं। फिर दरबार में हलचल हुई। तिम्मन्ना ने कहा कि यह अपमान है। स्वामी ने बहस नहीं की। उसने बस इतना कहा कि उसकी घड़िया वर्षों की साधना से सिद्ध है और किसी और बरतन में विद्या काम नहीं करेगी।
"तो विद्या घड़िया में है," तेनालीराम बोले, "स्वामी जी में नहीं। फिर हम स्वामी जी को नहीं, घड़िया को दक्षिणा दें।"
राजा ने अगले दिन का समय तय कर दिया। स्वामी ने कहा कि कल का दिन शुभ नहीं है और उसने तीन दिन बाद का मुहूर्त बताया। राजा मान गए, क्योंकि इनकार करने की कोई वजह नहीं थी। तारीख़ तय हो गई।
स्वामी उसी रात शहर से निकल गया। कोई नहीं देख पाया। उसके साथ जो गया वह सिर्फ़ उसकी झोली नहीं थी।
दरबार ने अगले हफ़्ते सूची बनवाई कि किसने कितना दिया था। सूची भरे दरबार में पढ़ी गई। सूची लंबी थी। जिन नामों के आगे रक़म सबसे बड़ी थी, वे नाम सबसे ग़रीब मोहल्लों के थे, क्योंकि जो सबसे कम रखता है वह सबसे ज़्यादा उम्मीद करता है। तिम्मन्ना उस दिन दरबार में नहीं आया और उसके बाद भी कई दिन नहीं आया।
कामाक्षी को उसका पैसा वापस नहीं मिला। उसकी बेटी की शादी अगले साल हुई, तय समय पर, पर उतनी बड़ी नहीं जितनी होनी थी। इस बारे में उसने किसी से शिकायत नहीं की, और यह बात सबसे बुरी थी। किसी ने मदद नहीं की।
उस साल के बाद विजयनगर में एक नियम चला। नियम मामूली था और उसे लिखने में दो लाइनें लगीं। जो कोई कुछ कर दिखाने का दावा करे, वह पहले वही काम रसोई के बरतन और भंडार के कोयले से करके दिखाएगा, और उसके बाद ही उसकी बात सुनी जाएगी। दो बरस बाद ऐसा ही एक आदमी शहर में आया। उसने घाट पर बैठकर तीन दिन इंतज़ार किया, फिर किसी से यह नियम सुना, और उसी शाम की गाड़ी से लौट गया।