चार सौ आदमियों ने ज़ोर लगाया और रथ अपनी जगह से एक बालिश्त भी नहीं हिला। चैत्र की सुबह थी और सड़क पर पानी छिड़का जा चुका था।

हम्पी में रथोत्सव साल का सबसे बड़ा दिन होता है। रथ लकड़ी का है, तीन मंज़िल ऊँचा, और उसके पहिये आदमी से बड़े हैं। उसे मंदिर के सामने से खींचकर सड़क के दूसरे सिरे तक ले जाया जाता है और शाम को वापस लाया जाता है।

खींचने का काम नगर की श्रेणियों का है।

बुनकर, तेली, लोहार, कुम्हार, बढ़ई, माली। हर श्रेणी अपने आदमी भेजती है और यह उनका हक़ भी है और उनकी ज़िम्मेदारी भी। बदले में उन्हें उत्सव के दिन बाज़ार में सबसे आगे की जगह मिलती है, और वह जगह साल भर की कमाई तय करती है। इसीलिए कोई श्रेणी अपना नाम इस सूची से कटवाती नहीं।

उस बरस रस्सी पर चार सौ से ऊपर हाथ थे। पहली बार ढोल बजा और सब चिल्लाए, और रथ नहीं हिला। दूसरी बार भी नहीं।

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तीसरी बार में पहिये के नीचे की मिट्टी थोड़ी दबी, इतनी कि दो उँगली का गड्ढा बन गया, और उसके बाद कुछ नहीं हुआ। रस्सी तनी रही और फिर ढीली पड़ गई।

दोपहर तक कोशिश चलती रही। बीच-बीच में पहियों के नीचे लकड़ी के गुटके लगाए गए और हटाए गए, और एक बार सड़क पर दोबारा पानी छिड़का गया, क्योंकि गीली मिट्टी पर लकड़ी का पहिया कम अटकता है।

फिर पुजारी आगे आए।

उनका कहना था कि रथ रुक गया है और यह ऊपर की बात है। उन्होंने कहा कि नगर में इस बरस कोई चूक हुई है और उसका प्रायश्चित करना पड़ेगा। प्रायश्चित का हिसाब भी उन्होंने बता दिया।

हर घर से एक पण, नगर के सब सुनारों से सोने का एक-एक तोला, और चालीस दिन का लगातार हवन। यह मिलाकर उतना बैठता था जितना उस बरस दो गाँवों का लगान।

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कृष्णदेव राय दोपहर बाद वहाँ पहुँचे।

उन्होंने रथ देखा, पहिये देखे, और फिर पुजारियों की बात सुनी। तेनालीराम भीड़ के किनारे खड़े थे और रस्सी को देख रहे थे। राय उन्हीं के पास चले गए। 'तुम्हें क्या दिख रहा है?' 'रस्सी दिख रही है, महाराज।' 'उसमें क्या है?'

'उस पर हाथ बहुत हैं।' राय ने कहा कि हाथ तो होने ही चाहिए। 'हाथ होने चाहिए, महाराज। ज़ोर भी होना चाहिए। हाथ और ज़ोर एक चीज़ नहीं हैं।'

इसके बाद उन्होंने जो माँगा वह चार पुड़िया रंग था।

रस्सी उस रथ की सत्तर हाथ लंबी थी और उसमें मूँज के तीन बल थे। वह हर बरस नई नहीं बनती, चार-पाँच बरस चलती है, और उसे मंदिर के भंडार में लपेटकर रखा जाता है। तेनालीराम ने उसे श्रेणियों की गिनती के हिसाब से हिस्सों में बाँटा और हर हिस्से के दोनों सिरों पर एक अलग रंग की पट्टी बँधवा दी।

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बुनकरों का हिस्सा लाल। तेलियों का पीला। लोहारों का काला। कुम्हारों का सफ़ेद। फिर उन्होंने मंदिर के मुनीम से कहा कि यह लिखकर पढ़ दो। मुनीम ने पढ़ा।

उसमें बस इतना था कि उत्सव के बाद रस्सी काटकर हिस्सों में अलग कर दी जाएगी और हर हिस्सा उसी श्रेणी के नाम से मंदिर के भंडार में रखा जाएगा, ताकि आने वाले बरसों में देखा जा सके कि किस श्रेणी की रस्सी कितनी घिसी है।

इतना ही था और इससे ज़्यादा कुछ नहीं था। पढ़ने के बाद भीड़ में कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर श्रेणियों के मुखिया अपने-अपने लोगों की तरफ़ मुड़े। वेंकटप्पा बुनकरों का मुखिया था और उसने सबसे पहले अपने आदमी गिनवाए। गिनती में सत्तर निकले और श्रेणी की तरफ़ से भेजे जाने थे एक सौ बीस।

बाक़ी पचास किराए के थे, जिन्हें रोज़ी देकर बुलाया गया था और जो सुबह से रस्सी पकड़े खड़े थे।

यही सब जगह था।

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बोम्मण्णा के तेलियों में अस्सी की जगह चालीस थे। लोहारों में साठ की जगह पैंतीस। बाक़ी सब जगह पर वे लोग थे जो पकड़े हुए थे और खींच नहीं रहे थे, क्योंकि खींचने का पैसा नहीं मिलता।

अगली एक घड़ी में नगर से आदमी आते रहे। कोई काम छोड़कर आया, कोई खाना छोड़कर, और कई तो दौड़ते हुए आए, क्योंकि रस्सी पर जगह बची हुई थी और जगह भरनी थी। बुनकरों की गली से पचास और आए। तेलियों की तरफ़ से अड़तीस। किसी ने किसी को हुक्म नहीं दिया और किसी ने वजह नहीं पूछी।

शाम ढलने से पहले ढोल दोबारा बजा। रथ पहली ही बार में हिला।

वह इतनी आसानी से चला कि आगे वाले लोग लड़खड़ा गए और उन्हें रस्सी ढीली करनी पड़ी। सड़क के दूसरे सिरे तक वह उस दिन पहुँच गया, हालाँकि अँधेरा हो चुका था और दीये जलाने पड़े। प्रायश्चित की बात दोबारा नहीं उठी।

पुजारियों ने बाद में कहा कि रुकावट दूर हो गई थी, और यह ग़लत भी नहीं था।

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उत्सव के बाद रस्सी काटी गई और चारों हिस्से मंदिर के भंडार में रख दिए गए। वे आज भी वहीं हैं, चारों, अपनी-अपनी रंग की पट्टी समेत, और चारों की बटाई एक जैसी खुली हुई है और रेशे एक जैसे उभरे हुए हैं। अगले बरस से रस्सी पर रंग लगाना बंद कर दिया गया, क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी।