मंडप में आठ आसन थे और वे एक सीधी क़तार में रखे थे। पहला आसन सिंहासन के सबसे पास था और आठवाँ दरवाज़े के सबसे पास।
आठ कवि दरबार का सबसे बड़ा गहना माने जाते थे और यह बात राज्य के बाहर तक जाती थी। दूसरे दरबारों में इसी बात पर ईर्ष्या होती थी और वहाँ से लोग सुनने आते थे।
वे साथ बैठते थे, साथ सुनाते थे, और साल में दो बार बड़ा आयोजन होता था जिसमें दूर-दूर से लोग आते थे। उस आयोजन में जो कवि अच्छा सुना देता, उसके पद अगले छह महीने नगर में गाए जाते थे।
पर आसनों का क्रम कभी लिखा नहीं गया था। शुरू में यह अपने आप बैठ गया था। जो पहले आया वह आगे बैठा। फिर उम्र से चलने लगा। फिर जिसकी रचना ज़्यादा गाई जाती हो, उससे। और उसी दिन से झगड़ा शुरू हो गया। हर बार नए सिरे से।
पिछले तीन बरस में यह बढ़ता चला गया था।
एक कवि ने कहलवा दिया था कि वह चौथे आसन पर नहीं बैठेगा। दो कवियों ने आना ही बंद कर दिया था और उनके आसन खाली रहने लगे थे। एक बड़े आयोजन में मंडप में छह आदमी थे और लोगों ने पूछा भी।
कृष्णदेव राय ने कहा कि क्रम तय कर दिया जाए। यहीं असली दिक़्क़त थी।
किसी भी क्रम की कोई न कोई वजह होगी, और हर वजह किसी न किसी को नीचे बिठाएगी, और जो नीचे बैठेगा वह उसे मानेगा नहीं। कविता में ऊँच-नीच नापने का कोई पैमाना नहीं है और जो लोग यह नापने बैठते हैं वे कवि नहीं होते।
दरबार में तीन तरीक़े सुझाए गए।
उम्र से, जिस पर सबसे छोटे दो ने आपत्ति की। राजा की पसंद से, जिससे राजा ने मना कर दिया। और रचनाओं की गिनती से, जिस पर सबने एक साथ आपत्ति की, क्योंकि गिनती से कविता का कोई लेना-देना नहीं।
आख़िर में राय ने तेनालीराम की तरफ़ हाथ कर दिया। तेनालीराम भी उन्हीं आठ में से एक थे और यह बात सबसे भारी थी। जो आदमी ख़ुद क़तार में खड़ा हो, वह क़तार का क्रम बनाए तो कोई उसे नहीं मानता।
उन्होंने तीन दिन माँगे और उन तीन दिनों में किसी कवि से बात नहीं की। चौथे दिन उन्होंने दरबार में एक ही वाक्य कहा। 'आसन कोस से तय हों।' किसी को समझ नहीं आया। एक को भी नहीं।
उन्होंने खोलकर बताया। हर कवि का अपना गाँव है। उस गाँव से हम्पी की दूरी कोस में नापी जाए। जिसका गाँव सबसे पास है वह पहले आसन पर, और जिसका सबसे दूर है वह आठवें पर। मंडप में कुछ देर चुप्पी रही।
फिर एक कवि ने हँसकर पूछा कि इसका कविता से क्या संबंध है। 'कुछ नहीं,' तेनालीराम ने कहा। 'तो फिर?' 'इसका कविता से कोई संबंध नहीं है, और यही इसकी सबसे अच्छी बात है। जिस पैमाने का कविता से संबंध होगा, उस पर हम आठ कभी राज़ी नहीं होंगे।'
इसके बाद उन्होंने दूसरी बात कही, जो असल में उन्हीं के काम की थी। कोस का हिसाब लगाया गया तो उनका अपना गाँव सबसे दूर पड़ता था। यानी वे ख़ुद आठवें आसन पर जाते, दरवाज़े के सबसे पास, और यह उन्हें पहले से मालूम था।
राय ने यही जानना चाहा। 'तुम्हें आख़िरी आसन क़बूल है?' 'महाराज, जो सबसे दूर से चलकर आता है, वह रास्ते में सबसे ज़्यादा देर तक अपनी कविता के साथ रहता है। आठवाँ आसन उसी का होना चाहिए।' इस पर दरबार हँसा, और वह हँसी वैसी नहीं थी जैसी तीन बरस से मंडप में नहीं हुई थी।
क्रम उसी दिन बना। किसी ने आपत्ति नहीं की, इसलिए नहीं कि सब ख़ुश थे, बल्कि इसलिए कि आपत्ति करने के लिए भी कोई बात चाहिए होती है।
दूरी नापने का काम राज्य के उन्हीं आदमियों ने किया जो सड़कों के कोस-पत्थर लगाते थे, और उसमें किसी की राय नहीं ली गई। उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि नाप किस काम के लिए है। जो दो कवि नहीं आ रहे थे, वे अगले आयोजन में आ गए। किसी ने उन्हें बुलाया नहीं था।
उनमें से एक को दूसरा आसन मिला और दूसरे को सातवाँ, और दोनों ने इस पर कुछ नहीं कहा, क्योंकि कहने को कुछ था नहीं। सड़क किसी की तरफ़दारी नहीं करती। बाद के बरसों में उस दरबार में कवि बदलते रहे और आठ की गिनती वैसी ही रही।
कोई गुज़र गया, कोई चला गया, नए आए। हर बार आसन दोबारा तय हुए और हर बार उसी तरीक़े से तय हुए, और किसी नए आदमी ने कभी यह नहीं पूछा कि यह तरीक़ा क्यों है। आठों आसन आज भी वहीं हैं। उसी क़तार में।
वे पत्थर के हैं और मंडप के फ़र्श में गड़े हुए हैं, इसलिए उन्हें हिलाया नहीं जा सकता। उन पर कोई नाम नहीं खुदा है और न कभी खुदा था। आठवाँ आसन दरवाज़े से इतना पास है कि बरसात में उस पर छींटें पड़ती हैं, और यही एक बात है जिसकी शिकायत तेनालीराम ने आगे चलकर की, और उस पर भी कुछ नहीं हुआ।