उस बरस पानी नहीं गिरा और आषाढ़ ख़ाली निकल गया। सावन के पहले हफ़्ते तक यह साफ़ हो गया कि फ़सल नहीं होगी। अकाल में राज्य के पास एक ही असली काम होता है। लोगों को मज़दूरी देना।

अनाज बाँटने से पेट भरता है और आदमी टूट जाता है। काम देने से पेट भी भरता है और उसके बदले में कुछ बन भी जाता है। विजयनगर में इसीलिए हर बुरे बरस में तालाब खुदते थे और दीवारें उठती थीं।

उस बार ग्यारह काम तय हुए।

सात तालाब, दो नहरें, एक सड़क, और नगर के दक्षिण में एक दीवार। इनसे लगभग चौदह हज़ार लोगों को चार महीने का काम मिलता।

काग़ज़ बन गए, ठेके बँट गए, और मज़दूर आने लगे। जो गाँव सबसे बुरी हालत में थे, उनसे लोग पहले ही चल पड़े थे, क्योंकि ख़बर काग़ज़ से तेज़ चलती है।

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फिर मुहूर्त देखा गया।

यह हमेशा होता है और इसमें कोई नई बात नहीं थी। राज्य का कोई भी नया काम बिना मुहूर्त के शुरू नहीं होता, चाहे मंदिर हो या तालाब।

नरहरि दरबार के ज्योतिषी थे।

उन्होंने गणना की और जो बताया वह किसी को अच्छा नहीं लगा। आने वाले चार महीनों में कोई नया काम शुरू करने का मुहूर्त नहीं था। एक भी नहीं। अगला अच्छा दिन कार्तिक की दूसरी तिथि को पड़ता था। कार्तिक चार महीने दूर था। और चार महीने अकाल में बहुत लंबा वक़्त होता है।

दरबार में जो हुआ वह भी अंदाज़े का था।

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आधे लोगों की राय थी कि यह अंधविश्वास है और अकाल में इसे छोड़ देना चाहिए। बाक़ी आधे इसके ख़िलाफ़ थे, क्योंकि जो काम बिना मुहूर्त के शुरू होगा उस पर आगे चलकर हर दरार का ठीकरा उसी बात पर फूटेगा।

नरहरि साठ के आसपास के थे और तीस बरस से यही काम कर रहे थे। उन्होंने अपनी तरफ़ से कुछ नहीं जोड़ा। उन्होंने बस इतना कहा कि गणना उन्होंने की है और वह ग़लत नहीं है, और आगे राजा जो तय करें।

कृष्णदेव राय दो दिन कुछ नहीं बोले।

उन्हें दोनों बातें दिख रही थीं। चौदह हज़ार लोग चार महीने बाद उस हालत में नहीं होंगे कि टोकरी उठा सकें। और दूसरी तरफ़, अपने ही ज्योतिषी की बात काटकर काम शुरू करने का मतलब यह होता कि आधे नायक उसमें हाथ ही न लगाएँ।

तीसरे दिन तेनालीराम ने नरहरि से एक सवाल पूछा। सिर्फ़ एक। उन्होंने यह दरबार में नहीं पूछा। वे उनके घर गए और वहीं बैठकर पूछा। 'जो मुहूर्त नहीं है, वह किस चीज़ का नहीं है?' नरहरि ने कहा कि आरंभ का।

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'सिर्फ़ आरंभ का?' 'हाँ। जो काम चल रहा हो उस पर कोई रोक नहीं है। रोक शुरू करने पर है।'

तेनालीराम ने यह बात दोबारा पूछी, उन्हीं शब्दों में, और नरहरि ने वही जवाब दिया, और तब तेनालीराम ने उनसे कहा कि यही बात वे कल दरबार में कह दें।

अगले दिन उन्होंने वही कहा। और उसी दिन तेनालीराम ने राय के सामने अपनी बात रखी। 'तो महाराज, ग्यारहों काम आज ही शुरू कर दिए जाएँ।' 'आज मुहूर्त नहीं है।' 'आज नहीं है। कल भी नहीं है। पर परसों तक जो आख़िरी अच्छी घड़ी बची है, वह आज सूरज ढलने से पहले है।'

नरहरि ने गणना दोबारा देखी और सिर हिला दिया। एक घड़ी बची थी, उसी शाम की। 'तो उसी एक घड़ी में ग्यारहों जगह काम शुरू हो जाए।' ख़ज़ाने वालों ने कहा कि ग्यारह जगहों पर एक साथ चौदह हज़ार आदमी उतारना उस एक घड़ी में मुमकिन नहीं है।

'चौदह हज़ार की ज़रूरत नहीं है,' तेनालीराम ने कहा। 'ग्यारह आदमी चाहिए।'

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उस शाम ग्यारह जगहों पर, एक ही घड़ी में, एक-एक आदमी ने एक-एक टोकरी मिट्टी उठाकर एक-एक जगह डाल दी। घोड़े पर सवार हरकारे तीन दिन पहले भेजे गए थे और हर जगह पर एक आदमी और एक टोकरी तैयार खड़ी थी।

ग्यारहों काम शुरू हो चुके थे। उसके बाद के चार महीने वे काम चलते रहे, क्योंकि चलते हुए काम पर कोई रोक नहीं थी।

किसी ने इसे चालाकी नहीं कहा और ख़ास तौर पर नरहरि ने नहीं कहा। उन्होंने ख़ुद उस शाम की घड़ी निकालकर दी थी और बाद में यह भी कहा कि जो नियम उन्होंने बताया था, तेनालीराम ने उसे तोड़ा नहीं, पूरा माना है।

चौदह हज़ार लोगों को उस चौमासे में काम मिला। सात तालाब उसी बरसात के बाद वाली बरसात में भर गए और उनमें से पाँच आज भी भरते हैं। ग्यारहों जगहों पर एक चीज़ छूट गई।

जिस आदमी ने पहली टोकरी डाली थी, उसकी वह मिट्टी वहीं की वहीं रह गई, क्योंकि बाक़ी काम उसके आसपास से शुरू हुआ था और किसी ने उसे हटाने की बात नहीं सोची। ग्यारहों जगहों पर आज भी एक कोने में मिट्टी का एक छोटा-सा ढेर है, जिस पर घास उग आई है। उस इलाक़े के राजमिस्त्री नया काम शुरू करते वक़्त अब भी पहली टोकरी अलग डालते हैं और उसे बाद में मिलाते नहीं, और उनसे पूछो तो वे बता नहीं पाते कि ऐसा क्यों करते हैं।