ताम्रपत्र में कोई खोट नहीं थी। दरबार के तीन जानकारों ने उसे अलग-अलग देखा और तीनों ने यही कहा। नागम्मा का आदमी दो बरस पहले गुज़र गया था। उसके बाद खेत उसके देवर के पास चला गया।
खेत साढ़े चार खंडुगा का था, नगर से नौ कोस दक्षिण, और उसमें गन्ना होता था। गन्ने वाली ज़मीन उस इलाक़े में सबसे महँगी मानी जाती थी, क्योंकि उसे साल भर पानी चाहिए और साल भर पानी हर जगह नहीं पहुँचता।
देवर का कहना था कि खेत उसका है और उसके पास काग़ज़ है। काग़ज़ सचमुच था।
विजयनगर में ज़मीन का दान ताम्रपत्र पर लिखा जाता था, तारीख़ समेत, गवाहों समेत, और उस पर मुहर लगती थी। उस पत्र पर देवर का नाम था और उसकी तारीख़ नागम्मा के आदमी की मौत से चौदह महीने पहले की थी।
यानी उसके आदमी ने ख़ुद, अपने जीते जी, खेत भाई के नाम कर दिया था।
नागम्मा का कहना था कि उसे इसका पता नहीं था। वह उस खेत में अठारह बरस से ख़ुद काम करती आई थी और गन्ने की पूरी फ़सल उसी के हाथ की थी। यह भी हो सकता था और इससे कुछ बदलता भी नहीं था।
दरबार में मामला तीन बार आया और तीनों बार वहीं अटका। नागम्मा हर बार आती थी, चुपचाप बैठती थी, और सुनकर लौट जाती थी।
काग़ज़ ठीक है तो खेत ठीक है। यही क़ानून है और यही उस राज्य की जड़ है, क्योंकि ताम्रपत्र पर भरोसा न रहे तो किसी की कोई ज़मीन नहीं रहेगी। कृष्णदेव राय ने चौथी बार उसे तेनालीराम के पास भेज दिया।
उन्होंने पत्र देखा और उसे रख दिया। उन्होंने उसे दोबारा नहीं उठाया, न उस दिन, न उसके बाद। फिर उन्होंने वह किया जो दरबार के किसी आदमी ने नहीं किया था। वे नौ कोस चलकर खेत देखने गए। वे वहाँ पूरा दिन रहे। सुबह से शाम तक, और लौटते वक़्त अँधेरा हो चुका था।
उन्होंने खेत नहीं नापा और गवाह भी नहीं बुलाए। उन्होंने बस यह देखा कि उस खेत में पानी कहाँ से आता है।
पानी नहर से आता था।
उस इलाक़े की नहर राज्य की बनवाई हुई थी और वह ऊपर के तालाब से निकलकर सात गाँवों में जाती थी। नहर से खेतों में पानी छोटी-छोटी मोरियों से जाता है, जो नहर की दीवार में बनी होती हैं। एक खेत, एक मोरी।
मोरी नहर की दीवार में है और नहर राज्य की है।
यह बात इतनी छोटी है कि कोई इसे लिखता भी नहीं। ताम्रपत्र में खेत की चौहद्दी लिखी होती है, फ़सल लिखी होती है, कर लिखा होता है। मोरी नहीं लिखी होती, क्योंकि वह खेत का हिस्सा नहीं है। वह नहर का हिस्सा है।
लौटकर तेनालीराम ने दरबार में तीन वाक्य कहे। पहला यह कि ताम्रपत्र बिलकुल सही है और खेत देवर का ही है। दूसरा यह कि खेत के साथ पानी नहीं आता, क्योंकि पानी उस पत्र में लिखा ही नहीं है। तीसरा यह कि उस मोरी की इजाज़त राज्य देता है और राज्य जिसे चाहे दे।
दरबार कुछ देर चुप रहा। फिर नहरों के दफ़्तर से बताया गया कि यह ठीक है, कि मोरियों की इजाज़त अलग से दर्ज होती है, हर बरस, और उन्हें बदला जा सकता है। 'इससे क्या होगा?' 'खेत उसी का रहेगा, महाराज। सूखा।'
हुक्म उसी दिन निकला।
उसमें कहीं देवर का नाम नहीं था और कहीं ताम्रपत्र का ज़िक्र नहीं था। बस एक पंक्ति थी: उस नहर की उस मोरी की इजाज़त इस बरस से नागम्मा के नाम दर्ज की जाती है। देवर के पास साढ़े चार खंडुगा ज़मीन थी और उस पर एक बूँद पानी का हक़ नहीं था।
उसने पहले दो महीने कुएँ से काम चलाने की कोशिश की। दो आदमी दिन भर पानी खींचते रहे और वह आधे खेत तक भी नहीं पहुँचा। गन्ना कुएँ से नहीं होता। उस बरस उसने बाजरा बोया और वह भी आधा निकला।
तीसरे महीने वह ख़ुद दरबार आया और उसने खेत लौटा देने की बात कही, इस शर्त पर कि उसे उसकी क़ीमत मिल जाए। क़ीमत नहीं मिली। राय ने साफ़ मना कर दिया। उसे सिर्फ़ इतना कहा गया कि पत्र वह अपने पास रखे, ज़मीन जिसकी है उसी की रहे, और चाहे तो उसी ज़मीन पर नागम्मा के साथ बँटाई कर ले।
उसने चौथे महीने बँटाई कर ली।
बँटाई में मालिक को तीसरा हिस्सा मिलता है और जोतने वाले को दो। वह उस खेत का मालिक था, इसलिए उसे तीसरा हिस्सा मिला, और यह उससे कहीं कम था जितना उसे पहले मिलता था। नागम्मा वहाँ चौदह बरस और खेती करती रही।
उस मोरी में एक बात बदली।
पहले उसका एक ही मुँह था। हुक्म वाले बरस में राज्य के मिस्त्रियों ने उसमें दूसरा मुँह भी काट दिया, थोड़ा नीचे, ताकि नहर का तल गिरने पर भी पानी जाता रहे। वह दूसरा मुँह आज भी वहाँ है और नहर की पूरी लंबाई में सिर्फ़ उसी एक मोरी में है, और उस इलाक़े में उसे किसी के नाम से नहीं, बस दो मुँह वाली मोरी कहा जाता है।