हीरा काले कपड़े पर रखा था और उस पर दोपहर की धूप सीधी पड़ रही थी। कृष्णदेव राय उसके सामने बहुत देर तक बैठे रहे।

विजयनगर के बाज़ार में उन दिनों हीरे बोरियों में बिकते थे। हम्पी की सड़क के दोनों तरफ़ चटाइयाँ बिछी रहती थीं और उन पर मोती, माणिक और हीरे ढेर लगाकर रखे जाते थे, जैसे और शहरों में अनाज रखा जाता है। दूर देशों से लोग यही देखने आते थे। जेठ की उन दोपहरों में तुंगभद्रा सबसे नीचे रहती थी और बारिश से पहले के वे हफ़्ते व्यापारियों के सबसे अच्छे हफ़्ते होते थे, क्योंकि रास्ते सूखे रहते थे और घाट पर भीड़ नहीं होती थी।

पर यह पत्थर उस बाज़ार का नहीं था।

इसे वीरण्णा लेकर आया था, जो गोलकुंडा की तरफ़ से आता था और साल में एक बार दरबार तक पहुँचता था। उसके साथ हर बार चार आदमी रहते थे और वह कभी दो रात एक ही सराय में नहीं रुकता था।

उसने दाम बीस हज़ार वराह माँगे। दरबार में यह सुनकर हलचल हुई, क्योंकि उतने में उस बरस पाँच सौ घोड़े आ जाते। 'इतना क्यों?' राय ने कहा।

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वीरण्णा ने हाथ जोड़े और कहा कि पत्थर की चमक की क़ीमत ढाई हज़ार से ज़्यादा नहीं है, और बाक़ी सत्रह हज़ार पाँच सौ इस बात के हैं कि ऐसा दूसरा पत्थर दुनिया में नहीं है।

यही उसकी पूरी दलील थी।

'यह मंदिर के द्वार पर लगेगा,' उसने कहा, 'और आने वाले सौ बरस तक कोई यह नहीं कह सकेगा कि उसने ऐसा एक और देखा है।'

दरबार के जौहरी बुलाए गए।

उन्होंने पत्थर को पानी में डालकर देखा, दीये के सामने रखकर देखा, और कसौटी पर घिसकर देखा। तीनों ने कहा कि पत्थर असली है, साफ़ है, और उसका पानी बहुत अच्छा है। किसी ने यह नहीं कहा कि ऐसा दूसरा है या नहीं, क्योंकि यह जौहरी का काम नहीं है।

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फिर सबकी नज़र तेनालीराम पर गई। 'तुम क्या कहते हो?' 'मैं कहता हूँ कि पत्थर अच्छा है।' 'और दाम?' 'दाम की जाँच जौहरी नहीं कर सकते, महाराज। जौहरी पत्थर देखते हैं।' वीरण्णा ने इसे अपने पक्ष में समझा और झुककर मुस्कुरा दिया।

तेनालीराम ने कहा कि उसे सात दिन चाहिए। राय ने सात दिन दे दिए और वीरण्णा को नगर में ही ठहरा दिया गया, राजकीय ख़र्च पर, जिससे वह और ख़ुश हुआ। उन सात दिनों में तेनालीराम ने पत्थर को हाथ नहीं लगाया।

वह न जौहरियों के पास गया, न उसने कोई और परीक्षा कराई। वह हर सुबह बाज़ार जाता था और शाम को लौट आता था। चटाई वालों के पास बैठकर वह घंटों बातें करता, कभी कुछ ख़रीदता नहीं, और उठते वक़्त एक-दो पत्थर हाथ में लेकर धूप में देख लेता। दो दिन उसने पेनुकोंडा की तरफ़ आदमी भी भेजे।

सातवें दिन दरबार बैठा। वीरण्णा अपना पत्थर लेकर आया और उसे उसी काले कपड़े पर रख दिया। तेनालीराम आगे बढ़े और उन्होंने अपनी अँगोछी की गाँठ खोली। उसमें से उन्होंने एक और पत्थर निकाला और उसे उसी कपड़े पर, पहले वाले के बग़ल में रख दिया।

दरबार में कोई नहीं बोला।

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दोनों पत्थर एक ही नाप के थे, एक ही तरह कटे हुए, और दोनों में धूप एक ही तरह से टूट रही थी। दरबार में जो लोग पीछे खड़े थे वे आगे आ गए और जो आगे बैठे थे वे झुक गए।

'यह कहाँ से आया?' राय की आवाज़ में हैरानी थी। 'यहीं से, महाराज। बाज़ार से। इसके दो हज़ार आठ सौ वराह लगे हैं।' फिर वे वीरण्णा की तरफ़ मुड़े। 'इनमें से आपका कौन-सा है?' वीरण्णा ने दोनों को उठाया। उसने उन्हें रौशनी में देखा, फिर उलटकर देखा, फिर एक को दूसरे पर घिसकर देखा।

वह काफ़ी देर तक देखता रहा। फिर उसने एक उठाकर कहा कि यह मेरा है। तेनालीराम ने दूसरा उठा लिया और अपनी अँगोछी में बाँध लिया। 'ठीक है,' उन्होंने कहा। 'अब इसके ढाई हज़ार दे दीजिए, महाराज। दूसरे वाली बात अब बची नहीं।'

वीरण्णा ने कहना चाहा कि उसने ग़लत उठा लिया होगा। 'तो सही उठा लीजिए,' तेनालीराम ने कहा और दोनों पत्थर वापस कपड़े पर रख दिए। इस बार वीरण्णा ने हाथ नहीं बढ़ाया।

सौदा उसी दिन तीन हज़ार में तय हुआ, और वीरण्णा उसे लेकर चला भी गया, क्योंकि तीन हज़ार भी कम नहीं होते और उसे यह भी पता था कि गोलकुंडा तक यह बात महीने भर में ही पहुँचेगी। जाते वक़्त उसने तेनालीराम से एक ही बात पूछी, कि दूसरा पत्थर आपने कहाँ ढूँढ़ा।

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'ढूँढ़ा नहीं। चटाई पर पड़ा था।'

बाद में राय ने भी यही पूछा और तेनालीराम ने बताया कि हम्पी के बाज़ार में उस तरह के पत्थर उन सात दिनों में उन्हें नौ मिले थे, और उन्होंने सबसे सस्ता उठाया था।

मंदिर के मुख्य द्वार पर दोनों पत्थर लगाए गए, एक चौखट के दाईं तरफ़ और एक बाईं तरफ़, बराबर ऊँचाई पर। सैकड़ों बरस से लोग वहाँ से निकलते हैं और ऊपर देखते हैं, और आज तक कोई यह नहीं बता सका कि उनमें से बीस हज़ार वाला कौन-सा है।