बात किसने शुरू की, यह आज तक किसी ने नहीं बताया। पंद्रह दिन में वह पूरे नगर में पहुँच गई। गोपण्णा हम्पी के अनाज बाज़ार का सबसे बड़ा व्यापारी था और उसका गोदाम नदी वाले फाटक के पास था। बरसात से पहले वह हर बरस बड़ा माल उठाता था। नई फ़सल आने तक शहर उसी से चलता था और उसका दाम भी उसी से तय होता था।

उस बरस उसने चार हज़ार बोरी उठाई थीं। अफ़वाह यह थी कि वह माल उन गाँवों से आया है जहाँ पिछले महीने बीमारी फैली थी और जिन्हें ख़ाली कराया गया था। इसमें कुछ भी साबित करने लायक़ नहीं था। किसी ने पर्चा नहीं लगाया, किसी ने दरबार में अर्ज़ी नहीं दी, और कोई गवाह नहीं था। बस लोगों ने ख़रीदना बंद कर दिया।

यही अफ़वाह की सबसे बुरी बात होती है। उसके ख़िलाफ़ खड़ा होना मुमकिन नहीं है, क्योंकि सामने कोई खड़ा ही नहीं है। आठ दिन में गोपण्णा की दुकान पर सन्नाटा हो गया। जो ग्राहक बीस बरस से आ रहे थे, वे भी दूसरी गली से निकलने लगे।

उसने दाम गिराए। कोई नहीं आया। उसने आधे दाम पर दिया। तब भी नहीं आया, और उससे बात और बिगड़ी, क्योंकि लोगों ने कहा कि सस्ता क्यों दे रहा है।

बारहवें दिन वह दरबार में आया।

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उसने वहाँ कोई शिकायत नहीं की, क्योंकि किसके ख़िलाफ़ करता। उसने सिर्फ़ अपना हिसाब रखा। चार हज़ार बोरी, तीन महीने की मियाद, और उसके बाद माल का सड़ना तय। कृष्णदेव राय ने पूछा कि माल कहाँ से आया है। गोपण्णा ने बताया कि नदी के रास्ते, दक्षिण से, और उसके पास ठेकेदारों के नाम और घाटों के नाम सब थे।

दरबार में इस पर बहस हुई।

एक तरफ़ यह था कि आदमी बरबाद हो रहा है और उसका क़ुसूर कुछ नहीं है। दूसरी तरफ़ यह था कि अगर बात सच निकली, और राज्य ने उसे साफ़ बता दिया, तो जो होगा उसका ज़िम्मा राज्य पर आएगा।

एक दरबारी ने मुनादी करा देने की बात रखी, कि अनाज ठीक है। तेनालीराम ने कहा कि मुनादी से यह नहीं मिटेगी। 'क्यों नहीं मिटेगी?' 'महाराज, जो बात किसी ने कही ही नहीं, उसे कोई काटे कैसे। मुनादी करते ही आधे लोग यह समझेंगे कि बात इतनी बड़ी है कि मुनादी करानी पड़ी।'

'तो फिर रास्ता क्या है?' 'बात के बदले बात नहीं चलेगी। कुछ रखना पड़ेगा।' उन्होंने जो माँगा वह यह था कि उन्हें ग्यारह दिन दिए जाएँ और उस दौरान राज्य कुछ न करे, न मुनादी, न ख़रीद, कुछ भी नहीं।

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अगली सुबह तेनालीराम अनाज बाज़ार में गए। उन्होंने गोपण्णा के गोदाम से एक बोरी उठवाई, बाज़ार के बीच वाली खुली जगह पर रखवाई, और उसका मुँह खोल दिया।

फिर उन्होंने वहीं चूल्हा रखवाया।

दोपहर के वक़्त, जब बाज़ार में सबसे ज़्यादा भीड़ होती है, उन्होंने उसी अनाज से बना खाना वहीं बैठकर खाया। अकेले। किसी को खिलाया नहीं और किसी से खाने को कहा भी नहीं।

पहले दिन लोग देखकर निकल गए। दूसरे दिन कुछ लोग रुककर देखने लगे और फिर आगे बढ़ गए। तीसरे दिन तक बाज़ार में यह बात होने लगी कि दरबार का आदमी रोज़ दोपहर को वहाँ बैठता है। यह वह जगह थी जहाँ इस बात का असली फ़ैसला होना था। बीमारी वाला अनाज खाने वाले को छह-सात दिन में पता चल जाता है।

छठे दिन भीड़ ऐसी हो गई कि रास्ता रोकना पड़ा। लोग दूसरी गलियों से भी आ रहे थे और उनमें वे भी थे जिन्होंने बात फैलाई थी। आठवें दिन एक बूढ़ी औरत आगे आई और उसने कहा कि मुझे भी दो। तेनालीराम ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ग्यारह दिन पूरे होने दीजिए।

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ग्यारहवें दिन वे उसी वक़्त, उसी जगह बैठे और उसी अनाज का खाना खाया। उसके बाद वे उठे, हाथ धोए, और चले गए। उन्होंने वहाँ कुछ नहीं कहा। एक शब्द नहीं। बारहवें दिन गोपण्णा की दुकान पर लाइन लग गई और तीन दिन में आधा माल निकल गया।

बाक़ी आधा उसने पहले वाले दाम पर बेचा और उस बरस उसे नुक़सान नहीं हुआ, हालाँकि जो पंद्रह दिन गए वे गए ही रहे। बाद में राय ने तेनालीराम से पूछा कि अगर अनाज सचमुच ख़राब निकलता तो। 'तो मैं ग्यारह दिन नहीं निकाल पाता, महाराज। सातवें दिन ही पता चल जाता।'

'और तब?' 'तब भी बात का फ़ैसला हो जाता, और नगर ने वह अनाज नहीं खाया होता। दोनों तरफ़ जवाब मिलना था।' फिर राय ने यह जानना चाहा कि उन्होंने पहले से जाँच क्यों नहीं करा ली। तेनालीराम ने कहा कि जाँच का काग़ज़ भी एक बात ही होता है, और बात के मुक़ाबले में बात नहीं चलती।

गोपण्णा ने अगले बरस उस खुली जगह पर पत्थर का एक चबूतरा बनवाया।

उस पर कुछ लिखा नहीं है और उसे किसी के नाम भी नहीं किया गया। वह अनाज बाज़ार के बीच में है, आदमी के बैठने भर ऊँचा, और उस पर दिन भर कोई न कोई बैठा रहता है, ज़्यादातर वे लोग जो माल उतारकर सुस्ताने बैठते हैं और जिन्हें यह मालूम भी नहीं कि वह वहाँ क्यों बना है।