गर्मी में हाथी ज़्यादा खाते हैं, यह बात सच है, और उसी सच पर पूरा हिसाब टिका हुआ था। हाथीख़ाने का चारा उस बरस दुगना हो चुका था।
विजयनगर में हाथी सिर्फ़ लड़ाई के लिए नहीं रखे जाते थे। वे जुलूस में चलते थे, मंदिर के काम आते थे, और पत्थर ढोते थे। राजधानी के हाथीख़ाने में उन दिनों सत्तासी हाथी थे और उनकी कोठरियाँ एक क़तार में बनी हुई थीं, हर एक मेहराबदार, और हर एक में एक खंभा।
एक हाथी दिन भर में डेढ़ से दो सौ किलो खाता है, और वह उसे एक बार में नहीं खाता। वह अठारह घंटे खाता रहता है, और यही वजह है कि हाथीख़ाने में चारा दिन में तीन बार डाला जाता है।
गन्ना, घास, केले के तने, धान का पुआल, और थोड़ा-सा गुड़ और चावल। यह सब बाहर से आता था, बैलगाड़ियों में, और सुबह के फाटक पर उतरता था। ठेका हनुमप्पा के पास था और उसके बाप के पास भी यही ठेका रहा था।
जेठ में उसने बताया कि चारा कम पड़ रहा है।
एरन्ना मुख्य महावत था और उसने भी यही कहा। गर्मी में जानवर ज़्यादा खाता है, पानी ज़्यादा पीता है, और घास सूखी होने से उसका वज़न कम बैठता है, इसलिए उतने ही पेट भरने के लिए ज़्यादा गट्ठर चाहिए।
यह तीनों बातें सही थीं।
कोष से पैसा बढ़ा दिया गया। ऐसा हर गर्मी में होता है और कोई इस पर सवाल नहीं करता, क्योंकि हाथी का भूखा रहना किसी को भारी पड़ सकता है। अगले महीने वह और बढ़ा। तीसरे महीने वह पिछले बरस के मुक़ाबले ठीक दुगना हो गया।
तब दरबार में बात उठी। जाँच बिठाई गई और उसमें वही हुआ जो ऐसी जाँचों में होता है।
गाड़ियाँ गिनी गईं। गट्ठर गिने गए। गट्ठर तौले भी गए और वज़न पूरा निकला। हनुमप्पा के काग़ज़ में हर गाड़ी की तारीख़ लिखी थी और हर तारीख़ पर हाथीख़ाने के मुनीम के दस्तख़त थे। 'तो कहीं गड़बड़ नहीं है,' राय ने कहा।
'गड़बड़ है, महाराज,' तेनालीराम बोले। 'बस उस जगह नहीं है जहाँ हम देख रहे हैं।' 'तो कहाँ है?' 'हम देख रहे हैं कि अंदर कितना गया। यह किसी ने नहीं देखा कि अंदर से कितना निकला।' दरबार में कुछ लोग हँसे और कुछ ने मुँह फेर लिया।
तेनालीराम ने राय से एक ही चीज़ माँगी। हाथीख़ाने के पिछवाड़े एक तराज़ू।
यह वैसी तराज़ू नहीं थी जैसी बाज़ार में होती है। यह ज़मीन में गड़े दो खंभों पर लटकी हुई लोहे की चौकी थी, जिस पर टोकरी रखकर तौला जा सके। लोहार को नाप समझाने में एक दिन लगा और बनाने में तीन।
पाँचवें दिन से हुक्म चालू हो गया।
हर सुबह हर कोठरी की सफ़ाई के बाद जो लीद निकलती, वह उसी कोठरी के नंबर वाली टोकरी में जाती और पिछवाड़े ले जाकर तौली जाती। नंबर मुनीम की किताब में लिखा जाता।
पहले दो दिन महावतों ने इसे मज़ाक़ समझा। नगर में भी इसी की बात हुई और तेनालीराम पर दो-चार फ़िक़रे भी कसे गए, जो उन तक पहुँचे भी और जिन पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
तीसरे दिन तक हाथीख़ाने के पिछवाड़े सुबह-सुबह वैसी ही भीड़ लगने लगी जैसी सामने वाले फाटक पर चारा उतरते वक़्त लगती थी। नगर के लोग भी देखने आने लगे और तेनालीराम ने किसी को रोका नहीं। आठ दिन में हिसाब सामने आ गया।
जो जानवर दो सौ किलो चारा खाता है वह लगभग सौ किलो लीद देता है। यह हर महावत जानता है, क्योंकि यही सबसे पुराना पैमाना है कि जानवर ठीक है या नहीं। सत्तासी हाथियों का चारा उस महीने रोज़ का सत्रह हज़ार किलो लिखा जा रहा था।
पिछवाड़े से रोज़ का चार हज़ार दो सौ किलो निकल रहा था। आधे से भी कम। इसका मतलब एक ही निकलता था और उसे साबित करने के लिए किसी गवाह की ज़रूरत नहीं पड़ी।
फाटक पर चारा पूरा उतरता था। कोठरियों तक आधा पहुँचता था। बाक़ी उसी रात पिछले दरवाज़े से निकलकर नगर के तबेलों में बिक जाता था, जहाँ जेठ में घास का दाम सोने के भाव जाता है। हनुमप्पा और मुनीम, दोनों उसमें थे। एरन्ना उसमें नहीं था।
यह भी उसी तराज़ू से पता चला, क्योंकि जिन चौदह कोठरियों की देखभाल एरन्ना ख़ुद करता था, उनकी टोकरियाँ पूरी बैठ रही थीं। सज़ा सुनाई गई और वसूली का हुक्म हुआ। ठेका उसी हफ़्ते दूसरे आदमी को गया और शर्त यह जुड़ी कि तौल पिछवाड़े वाली तराज़ू से भी होगी।
एरन्ना को हाथीख़ाने का पूरा ज़िम्मा दे दिया गया और उसने पहली माँग यह की कि चारा गिनकर नहीं, कोठरी तक पहुँचाकर लिखा जाए। बाद में एक शाम राय ने तेनालीराम से जानना चाहा कि यह बात सूझी कैसे।
उन्होंने कहा कि जो चीज़ आदमी के हाथ से गुज़रती है उसका हिसाब आदमी बना देता है, और जो चीज़ जानवर के पेट से गुज़रती है उसका हिसाब कोई नहीं बना सकता। वह तराज़ू बाद में भी वहीं रही।
आगे चलकर उसका इस्तेमाल और कामों में भी होने लगा, क्योंकि हाथीख़ाने में तौलने की चीज़ें बहुत होती हैं। पर नाम उसका वही रहा जो पहले आठ दिनों में महावतों ने रखा था, और वह नाम मुनीम की किताब में कभी नहीं लिखा गया, हालाँकि पूछने पर हाथीख़ाने का हर आदमी उसी नाम से जगह बता देता था।